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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
पिछली करणी करम जुलाये । जैसे जैसेही सुख पाये ॥
काहू मिली तुरंग सवारी । काहू पालकी झालरदारी ॥
काहू गज पाये बहुतेरे । लाखों पुरुष रहत हैं चेरे ॥
श्रीशुकदेव कहै ये बैना । चरणदास लखु अपने नैना ॥
दो० लाखों पगसों लगिरहे, रहैं जीविका आस ।
ईश्वर तिनके जेइहैं, वे हैं चरणहिं दास ॥
ऐसी ईश्वर पदवी पाई । पुण्य प्रताप कहा नहिं जाई ॥
सुनिकै शुभकर मनको कीजो । खोंटे कर्म सभी तजि दीजो ॥
इनहीं आंखिनसों सब सूझै । बुद्धिमान प्रत्यक्ष जु बूझै ॥
कोई चढ़े जाहिं रथमाहीं । सूरज१मुखी तासुकी छाहीं ॥
कोइ किरोड़पति लाखन वारा । कोई हजारनको व्यवहारा ॥
कोई थोड़े में सुख पावै । ह्वैकर सुखी बहुत हरषावै ॥
पिछली जैसी करी कमाई । तैसी तैसीही निधि पाई ॥
शुकदेव कहियों आलस हरियो । चरणदास शुभकरणी करियो ॥
दो० सुर दानव अरु अप्सरा, मनुष यक्ष गण प्रेत ।
कर्मोंहीं से होत है, पाप पुण्य का हेत ॥
नहिंतो हरि द्वैद्रष्टा नाहीं । एक दृष्टि सब ऊपर छाहीं ॥
जो जैसी करणी करि लेवै । हरि तैसाही बदला देवै ॥
अपना किया आपही पावै । परालब्ध वह नाम कहावै ॥
घटै बढ़ै वह नेकु न क्योंहीं । पावै वही जु करणी ज्योंहीं ।
नारिपुरुष मिलिकरि व्यवहारा । करणी सों उपजै संसारा ॥
बाहे बोवै खेत किसाना । भांतिभांतिके उपजैं दाना ॥
बाग लगावै सींचै माली । जब फल लागैं डाली डाली ॥
पक्षी अरु मानुष सुख पावै । चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
१ घटाटोप