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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो०-वन उपवन अब कहतहौं, मथुरामण्डल माहिं ।
बिना भक्ति ब्रजनाथकी, क्योंहूं दीखत नाहिं ॥
उपवन कदम मंडतंवन दूजा । नंदीसुर नंदवन सूजा ॥
मंगल आनँद वन वहि गायो । जहां महर जा गांव बसायो ॥
संकेत वन सो सब जग जानै । बरसाने सब को पहिंचानै ॥
भोजन थाली वही कहायो । जहाँ बैठि भात हरि खायो ॥
सुगन्ध वन अब सो कहावै । अखण्ड वन पुस्तक दरशावै ॥
खेलन द्रुम वन खेलत रहें । मोहन वन केती वन कहैं ॥
दधि ग्राम वन वही कहायो । लूटि लूटि जहाँ दधि खायो ॥
वत्सहरनवन वही कहायो । ब्रह्मा माया देखि भुलायो ॥
दो०-ग्वाल बाल ब्रह्मा हरे, राखे कहूं दुराय ।
जानि बूझि टारो दियो । लीन्हें और बनाय ॥
जब ब्रह्मा समझो करिज्ञाना । कर्ता कृष्ण सत्य करिजाना ॥
फिरि चेतन है शीश नवायो । आदिपुरुष पुरुषोत्तम पायो ॥
द्वादश उपवन गाय सुनाये । मथुरा मण्डल मध्य बताये ॥
द्वादश वनकी गति सुनि लीजै । जिनमाहीं हरिध्यान करीजै ॥
भद्र वन अति महा सुहायो । श्रीवन लालन के मन भायो ॥
भांडीर वनकी महिमा गाऊं । भिन्न भिन्न कहितोहि समझाऊं ॥
लोहवन महिमा कहियत भारी । महावन सुन्दरता अति धारी ॥
तालर वन वहि दृष्टि निहारो । दानव धेनुक जहँ हरि मारो ॥
दो०-दानौ धेनुक महाबली, भाव भक्ति हरि हेत ।
मुक्तिकाज सेवन कियो, तालरवन को खेत ॥
खदिरवन जानत सब कोई । फूल माल जहँ लालन पोई ॥
बहुलावन घन दुरमन छायो । कुमुदवन तो सो कहिसमुझायो ॥
१ प्रथमपाठ।

ब्रजचरित्रवर्णन । ५
कामावन लालन सुखदाई । मधवन लालन भूमि सुहाई ॥
वृन्दावन की शोभा भारी । रास रच्यो जहाँ श्रीवनवारी ॥
वन उपवन शोभा गति ईशा । शिव ब्रह्मादिक नायो शीशा ।
इन्द्र वरुण - कुबेर विनानी*। इनहूँ गति मति ब्रजकी जानी ॥
बल रावण जहाँ सेवा लाई । ऊंची नवनिधि उनहूँ पाई ॥
सप्तऋषिनं मिलि सेवन कीन्हो । ऊंचो आसन ध्रुवको दीन्हो ॥
दो० बहुतक सुर नर तरिगये, तपकरि ब्रजके बीच ।
जाति पांतिको को गिनै, ऊंचा नीचा नीच ॥
वृन्दांवन सबसों बड़ो, जैसे दूधमें घीव ।
सब धर्मन हरिभक्ति ज्यों, जैसे पिण्डं में जीव ॥
सब तीरथ जगमें बड़े, जिनहूँ में हैं ईश ।
उन तीरथ फलकामना, इहि सेवन जगदीश ॥
बीस कोस के फेर में, वृन्दावन कूं जान ।
कुंजगली अति सोहनी, द्रुमंवेली पहिंचान ॥
कंचनकी जहाँ भूमि है, धरे सतोगुण भेष ।
चरणदास बलिबलि गयो, दिव्यदृष्टि करि देख ॥
फूल जु फूले ऋतु विना, नाना छवि बहुरंग ।
अलि मलकतगुञ्जत फिरें, भँवरी सुतलै संग ॥
ऋतुवसन्त जहँ नितरहत, विहरत नन्दकिशोर
कुहुँकत कोयल मगन होय, बोलत दादुर मोर ॥
तिहिमधि वृन्दावन महा, निज वृन्दावन जान ।
तिरकोणी वर्णन कियो, जोजेंन है प्रमान ॥
१ नारद, वशिष्ठ, भृगु, अंगिरा, कश्यप, विश्वामित्र, पुलस्त्य २ देह ३ लता
४ अमर ५ चारि कोसका नाम ॥
प्रथमपाठ ❀ इन्द्र कुबेर आदि विज्ञानी ॥

६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाकी महिमा सबहुन गाई । रास करें जहाँ कुँवर कन्हाई ॥
जमुना जहाँ परिक्रमा दीन्ही । गुप्तपिया की लीला चीन्ही ॥
गोपसुता जहाँ नित उठि न्हाई । वर पूरण पायो कुँवर कन्हाई ॥
श्यामरङ्ग निर्मल जल गहरी । वृन्दावनके ढिगढिग लहरी ॥
आसा मनसाकरि कोइ न्हावै । सहस सुरसुरी को फल पावै ॥
दिव्य वृन्दावन दिव्य कलिन्द्री । देखे सो जीतै मन इन्द्री ॥
किनार निकट वृक्षनकी छाहीं । आयपरी जमुनाजल माहीं ॥
दो० भक्ति बिना पावै नहीं, वृन्दावन की संध ।
बिन पाये निन्दा करै, भोंदू मूरुख अंध ॥
मिलमिल शुभकी उठत तरंगा । बोलत दादुर अरु सुरभंगा ॥
कालीदह महिमा सुनु भ्राता । सहस गंगके फलकी दाता ॥
विहार* घाट बसि भजन करीजै । जेहिसेवन जमजवाब न दीजै ॥
वंशीवट बसि हठ इमि कीजै । तजै देह जब दर्शन लीजै ॥
अब सुनु वृन्दावन की बतियां । शीतल करी हमारी छतियां ॥
वनघन कुञ्जलता छबिछाई । झुक टहनी धरणी पर आई ॥
करत मंद समीर पयाना । बसत सुगन्ध सबै अरघाना ॥
बरसत अमृत फूही सुहाई । निकसत कोमल गोभगुहाई ॥
दो० वृन्दावन में रहत हैं, ज्ञानी गुणी अतीत ।
वृन्दावन को ना मिलें, कोऊ लहत जगजीत ॥
नित बसन्त जहँ सुगन्ध सुरारी । चलतमन्द जहाँ पवनसुखारी ॥
पुहुप विकसि रहे रङ्ग बिरङ्गा । लेत वास गुंजत सुरभृङ्गा ॥
बोलत भँवर महाध्वनि गाजें । मानो अनहदकी गति साजें ॥
जुगुनू दमकि चमकि चक्रावैं । समय जानिकर हर्ष बढ़ावैं ॥
प्रथमपाठ * विहर ।

ब्रजचरित्रवर्णन । ७
नाचत मोर करत चतुराई । पंख पसारि मुदित मगनाई ॥
कैइक' उचक वोल निज बोलैं । कैइक कुञ्जन ऊपर डोलैं ॥
जुगल नामलैं कीर पुकारैं । बार बार वनओर निहारैं ॥
वृन्दावन चारौ जुग¹ माहीं । गोपरहैं शुकदेव बताहीं ॥
दो० वृन्दावनकी साधुगति, कापै वरणी जाय ।
जैसी जाकूं दृष्टि है, जैसोही दरशाय ॥
जैसे हरि मथुरा गये, सबन विलोको आय ।
काल कंसकी दृष्टि में, साधुन प्रभू लखाय ॥
मथुरा में जोधा बड़े, जिन्हें मल्ल दरशाय ।
नारिन दरशै कामसम, प्रीतिरीति अधिकाय ॥
वृन्दावन सोइ देखिहै, जिन देख्यो हरि रूप ।
दुर्लभ देवन कूं भयो, महागूप' ² सों गूप ॥
वृन्दावन सेवन करै, अमरलोक कूं जाय ।
इन्द्रीजीते हरि भजैं, प्रेम प्रीति के भाय ॥
रसिककेलि वृन्दावन माहीं । अमरलोक की भांति कराहीं ॥
अमरलोक तिहुँलोकसों न्यारो । मथुरामण्डल अंश विचारो ॥
अमरलोक विचहै निजधामा । जाको अंश वृन्दावन नामा ॥
पुरुषोत्तम निज धामा माहीं । कारण प्रेमरहै ब्रज आई ॥
पुरुषोत्तम प्रभु लीला धारी । वृन्दावन में सदा विहारी ॥
निजधामा की कहियत शोभा । वृन्दावन में रहें अलोपा ॥
दिव्य दृष्टि बिन दृष्टि न आवै । सकल पुराण वेद यों गावै ॥
गोल चौतरो निज वृन्दावन । तापरवारौं अपनो तनमन ॥
रहो चौतरो छिपि वहिठाहीं । जैसे अग्नि काष्ठके माहीं ॥
१ सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग २ छिपाहुआ
३

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गले धुकधुकी सुन्दर झमकै । तामधिकौस्तुभमणिअतिदमकै ॥ - yes, the headline is completely unbroken!

  • Line 19:
    अधिक सुघर पहिरे हिमचौकी । वनमाला कहियत नौनिधिकी ॥

  • Line 20:
    गोल भुजनपर बाजू सोहैं । पहुँची कड़ा कनक करिदोहैं ॥
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  • Line 21:
    पहुंचीढिग पहिरे जहाँगीरी । रतन चौक छविलगीजँजीरी ॥
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    And it's joined: पहुंचीढिग.
    Then पहिरे जहाँगीरी ।
    Then `रतन चौक छविलगीजँजी

ब्रजचरित्रवर्णन । ६
रतन चौकहै पीठ हथेली । लगी जँजीर मुँदरियन भेली ॥
सोहैं छाप छला अरु मुँदरी । नुहसत पहिरे सुन्दर अंगुरी ॥
इकीस चिह्न चरणनमें धारे । झुनुक झुनुक पैंजनिझनकारे ॥
मन्द मन्द विहँसत मुसकाई । रणजीत* मीतछविकहीनजाई ॥
नितकिशोर अरुनित्तकिशोरी । द्वादश वरष अवस्था भोरी ॥
राधे भूषण छवि कह गाऊं । नाव लेत मनमें शरमाऊं ॥
हूं मैं दास नाव रणजीत । भक्तिदान मोहिं दीजैरीत ॥
बहुत सखी जिनके निजसंगा । रासकेलि खेलें बहुरंगा ॥
वनके चौंसठि खम्भे माहीं । होत अखण्ड रास वहि ठाहीं ॥
झुनुक झुनुक सखियन पगबाजैं । घुँघुरू अधिकमहाध्वनिगाजैं ॥
दिव्य भूषण पहिरे पियप्यारी । शशिव१दनी तिरगुणते न्यारी ॥
नवल किशोरी गोरी सारी । सुघर सयानी चतुर नारी ॥
दिव्यवस्त्र अरु मधुर शरीरा । अधिक रूप छवि गहर गंभीरा ॥
कजरारी कच२ लटकैं बेनी । अंजन नैन सैन पियदेनी ॥
चूड़ामणि गहनो छवि नीको । शीशफूल अरु वेनीटीको ॥
नथबुलाक अरु बन्दी झलकें । घूंघुरवाली लटकैं अलकैं ॥
मुखऊपर अलकैं छवि ऐसी । चन्दचढ़ी दो नागिनि जैसी ॥
करणफूल सँग झुमके मलकें । सब सखियनके भूषण झलकें ॥
चम्पाकली नौलड़ी माला । चन्दनहार सुपहिरे वाला ॥
कठुला जैसे गले जनेऊ । अरु हिय चौकी महा अभेऊ ॥
फूलमाल सखियां सब पहिरे । गुंजनकी माला हिय लहिरे ॥
बांहन में बाजूबंद बांधे । वंकबला बांहन पर साधे ॥
सदा सुहागिनि पहिरे चूरी । सुवक पछैली वँगरी रूरी ॥
१ चन्द्रमाकासा वदन २ बाल ॥
प्रथम पाठ * रणजित मित ॥

१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
॰कँगनी अरु पहिरे जहँगीरी। रतनन चौक आरसी धीरी॥
छाप छला अरु पहिरे गूंठी। नुहसत पहिरे अजब अनूठी॥
पांवनमें पग वेवर बाजैं। नखशिखलों आभूषण साजैं॥
झुनुक झुनुक नाचै अरु गावैं। ठुमुक ठुमुक निरतैं अरु धावैं॥
कबहूं थइथइ थइथइ करें। कबहुँ कर ऊपर कर धरैं॥
कबहूं घिनन घिनन अँग मोरैं। भाव बताय तान बहु तोरैं॥
कबहूं कर उठाय गति चालैं। साँग उपांग¹ बतावत हालैं॥
हो अनुराग राग बहु गावैं। घुँघुरूकीगतिअधिक बजावैं॥
कोइ नाचै कोई गावै। कोइमृदंग कोइ ताल बजावै॥
बैन सरू काहू कर राजै। कोउ तँबूरा नारी साजै॥
उपँग लिये कर कोउ सहेली। अमृत कुण्डली² कोउअलबेली॥
कोइ बीन कोइ लिये मुहचङ्गा। मगनरूप सबही निज सङ्गा॥
दो० कहा बुद्धि कहा कहसकूं, रासकेलि को साज।
बाजे हैं बहुभांति के, वर्णत आवै लाज॥
कबहूं करसों कर मिला, नृत्यत श्रीगोपाल॥
कबहुं बैठे सांवरो, नृत्यत सुन्दरबाल॥
कबहूं हँसिकरि निकट बुलावैं। कबहूं फूलमाल पहिरावैं॥
कबहूं मन्द मन्द मुसकावैं। बैन सैन दै नृत्य बतावैं॥
वृन्दावन में ऐसी लीला। चरणदासको जहां वसीला॥
जो कोइ इनको ध्यान लगावै। अमर लोक निहचै करिपावै॥
सिमिटो मन कबहूं नहिं फूटै। सोवत जागत ध्यान न छूटै॥
जो कोइ इनको ध्यान न करिहै। भरमि भरमि चौरासी परिहै॥
सुरनर मुनिसबही मिलि ध्यावैं। शिव ब्रह्मादिक अन्त न पावैं॥
वेद विना यह भेद न पावै। आप भरमि अरु जग भरमावै॥
१ सब विधियों सहित २ द्वारा॥

ब्रजचरित्रवर्णन । ११
वेद पुराण संहिता गावैं । चारोंयुग हरिभक्ति बतावैं ॥
दो० इत उत भटको जग फिरै, कीन्हों नाहिं विचार ।
सत्य पुरुष जानों नहीं, कैसे उतरै पार ॥
द्वापर बीतो कलियुग आयो । राजाको शुकदेव सुनायो ॥
कलियुगकी दुर्बुद्धि बताऊं । सुनहुपरीक्षित कहि समुझाऊं ॥
ओछी बुद्धि मनुज की होगी । सकलविकल अरु मनके रोगी ॥
सूक्ष्म ज्ञान महाअभिमानी । नहीं मानिहैं वेद पुरानी ॥
परमेश्वर की निन्दा करि हैं । भूत मसानी चित में धरि हैं ॥
खेतरपाल १ भूमिया मानैं । कुत्रिमको कर्ता करिजानैं ॥
परमेश्वर की बात न भावै । एसो उत्तर तुरत बतावै ॥
कहैं राम् कहां है भाई । हमहूँ को तु देहु दिखाई ॥
दो० चहूँओर हरिको विभव, सातद्वीप नौखण्ड ।
चरणदास* कहैं सुन अधिर, किन रच्यो ब्रह्माण्ड ॥
भक्ति विना दीखै नहीं, इन नयनन हरिरूप ।
साधुन को परगट भयो, विना भक्ति हरिरूप ॥
साधुसन्तकी निन्दा करिहैं । भजन करै तासों वहु अरि हैं ॥
करि अभिमान आपमें जरिहैं । गुरुको कहो नेक नहिं करिहैं ॥
पंथ खड़े करि हैं छत्तीसा २ । भरमपूजि तजिहैं हरि ईसा ॥
दम्भ झूठ की सेवा करिहैं । झूठे पंथन में जा लरिहैं ॥
गऊ ब्राह्मण भ्रष्टल होई । बाप पूत में परिहै दोई ॥
विद्या दान कपट व्यवहारा । राजा दुष्ट दुखित संसारा ॥
वेद पढ़े करि हैं अभिमाना । हम पंडित अरु सब अज्ञाना ॥
१गांव का चौकीदार २ छत्तीस प्रकारके पंथ ॥
प्रथमपाठ * चरण दाससुन

॰ १२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पढ़ पुराण भेद नहिं जानैं । साधुनसों झगड़ो बहु ठानै ॥
ग्रंथ पुजाय हरि कूं विसरावैं । झूठे वाद विवाद बढ़ावैं ॥
व्यभिचारिणिहोइहैं बहुनारी । बोलैं झूठ बहुत परकारी ॥
शुकदेव कहे राजासूं बैना । सो अब देखे अपने नैना ॥
राजा डांड़ि बांधि करि लूटैं । पूजैं भूत रामसों छूटैं ॥
गऊ विष्ठा सो खाती जानी । पंडित देखे बहु अभिमानी ॥
दम्भ कपट बहु पूजा दौरी । कलुवा जाहर पूजैं बौरी ॥
पण्डित वेद पढ़े बिसरावैं । स्याने भोपे को शिर नावैं ॥
हरि के साधुन को विसरावैं । तजैं राम औरन को ध्यावैं ॥
हरिकी भक्ति सदा चलिआई । वेद पुराणन में जो गाई ॥
इनको समझि भये जो ज्ञानी । नाभा जिनकी भक्ति बखानी ॥
जिनकी महिमासबजगज्ञानी । सबजानत हैं चतुरा ज्ञानी ॥
पीपा सदना सैना नाई । धना जाट अरु मीराबाई ॥
नामदेव रैदास चमारा । तुलसी माधो मीर विचारा ॥
कूंबा कुम्हरा फत्तू सका । सेऊ सम्मन रङ्का वङ्का ॥
करमैती अरु करमा वाई । दास कवीरा वाणीगाई ॥
जैदेवा अरु नरसी महता । दास मलूक कड़ा में रहता ॥
अन्तानन्द कील अरु जंगी । देव मुरारि निपट सरवंगी ॥
नरहरि लालदास हरिवंसा । रंगनाथ बनवारी हंसा ॥
नानक सूरदास और दादू । सनक सनन्दन कहिये आदू ॥
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण शवरी । हनूमान शङ्कर और गवरी ॥
बाल्मीकि अँबरीष सुदामा । मोरध्वज राजा संग्रामा ॥
बहुतक भक्त और जो भये । नाम न जानूं जात न कहे ॥
कई कोटि वैष्णवों बाके । सबही गये मुक्ति के नाके ॥
चरणदास हरिभक्ति विचारी । सुमिरिसुमिरि पहुँचेनरनारी ॥

ब्रजचरित्रवर्णन । १३
दो०-लिखिपढ़ि समझि विचार करि, सदा करौ हरिध्यान ।
कृष्णभक्ति दृढ़ करि गहौ, मिटै सकल अज्ञान ॥
कविच साङ्गीत ॥
मुकुट जटित शिर अधिक विराजत गहे बँसुरिया अधर धरन् ।
शंख चक्र गदा पद्म विराजत कोटि मदन छवि चरणन् ॥
गिरिवर नखधारे असुरन मारे सन्तन के दुख हरनन् ।
जन चरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
कुमकुम बिन्दी दीपित भालं उदधिजात की द्युति हरनं ।
मकराकृत कुण्डल अति राजत झुमक दामिनी छवि धरनं ॥
कटि किंकिणि पैंजनि पग बजत मुक्तमाल सुरसुर वरनं ।
जनचरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
सुन्दर बाल लाल सँग लीन्हे रासकरत अति मनमगनं ।
घुमिरि घुमिरि झुकि झुकि कर निरतत खुटर खुटर नाटकवरनं ॥
मधुर मधुर ध्वनि बजत गजत घन झनक झनक झांझा झरनं ।
जनचरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
रास रचावैं सब सचुपावैं सांवरे वदन छवि वर्णनं ।
धुक धुक धूधूकरि नृत्यत तकृत तकृत ताधिननननं ॥
झुनुक झुनुक नूपुर झनकारत झनक झनक झनझनझननं ।
जनचरणदास चरणन को चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
क०-नन्दके कुमार हौं तो कहौं बार बार मोहिं लीजिये
उबारि ओट अपनी में कीजिये । काम अरु क्रोध को काटो
जम बेड़ा प्रभु मांगौं एकनाम मोहिं भक्तिदान दीजिये ॥ और
की छुटायो आश सन्तनको दीज साथ वृन्दावन निवास*
मोहिं फेरिहू पतीजिये । कहै चरणदास मेरि होय नाहि हास
प्रथमपाठ '* बास ॥'

१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्याम कहूं मैं पुकारि मेरी श्रवन* सुनि लीजिये ६४ ऊहीं हाथ
कुचगहि† पूतना के प्राण सोखे पाय ऊंची‡ पदवी निज धाम
को सिधारी है। ऊहीं हाथ श्रीधरको मुखमाड़ो दहीसेती
छातीपर पांव दै मरोरि जीभ डारी है ॥ ऊहीं हाथ कूबरी के
कूबकाड़ सीधो कियो ऊहीं हाथ मस्तक+ गज खैंचि मूठ मारी
है। ऊहीं हाथ बांह चरणदास कहै आय गहो ऊहीं हाथ
जमुना में नाथ्यो नागकारी है ॥
इति श्रीचरणदासजीकृतव्रजचरित्रसम्पूर्णम् ॥
प्रथमपाठ * श्रौन † गहि ‡ ऊंचो पद + मत्त ॥

अथ अमरलोकअखण्डधामवर्णन ॥
दो०-प्रणमों श्री शुकदेव को, सो हैं गुरू दयाल ।
काम क्रोध मोह लोभ से, काढ़े मेरे साल ॥
वाणी विमल प्रकाश दी, बुधि निर्मल की तात ।
मोहि मूरख अज्ञानको, नहिं आवत ही बात ॥
अमरलोक वर्णन करों, वेही करं सहाय ।
दृष्टिहिये मम खोलिकरि, सबही देहिं दिखाय ॥
भेद लियो गुरुदेव सों, अद्भुत रचौं ग्रन्थ ।
साखी वेद पुराण मैं, जानी सुनियो सन्त* ॥
भेद अगोचर कोइकोइ जानै । गुरू दिखावै तौ पहिंचानै ॥
पता कहैं कछु वेद पुराना । ज्योंका त्यों उनहूं न बखाना ॥
कछु कछु मत मारगहू भाखैं । फिरि भूलैं समुझैं नहिं साखैं ॥
हरि कृपा प्रकट मैं गाया । किया उजागर खोलिदिखाया ॥
दो०-महा कठिन दुर्लभ हुता, अमरलोक का भेद ।
ताको मैं बीजक कियो, भाषो भेद अभेद ॥
निराकार तौ ब्रह्म है, माया है आकार ।
दोनों पदही को लिये, ऐसा पुरुष निहार ॥
माया जीव दोउ ते न्यारा । सो निज कहिये पीव हमारा ॥
क्षर अक्षर निहअक्षर तीनो । गीता पढ़ि सुनि इनको चीन्हौं ॥
गीता अक्षर जीव बतावै । क्षरमाया सोइ दृष्टि दिखावै ॥
निहअक्षर है पुरुष अपारा । ज्ञानी पण्डित ल्योह विचारा ॥
जीवआतम परमातम दोऊ । परमातम जानत हैं कोऊ ॥
आतम चीन्हि परमातम चीन्हो । गीतामध्य कृष्ण कहि दीन्हो ॥
प्रथमपाठ *- सत्य ।

१६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माया उपजै विनशै अतिही । चेतन ब्रह्म अमरहै नितही ॥
पारब्रह्म पुरुषोत्तम जानो । चरणदास के सो मन मानो ॥
दो०-अमरलोक बिच पुरुषहै, ब्रह्म जु सबके माहिं ।
माया दरशत है सबै, ब्रह्म दीखतै नाहिं ॥
अब सुन अमरलोक की वानी । त्रैगुण रहित परम सुखदानी ॥
तेज पुंजके ऊपर राजै । अहंविराट सो बाहर गाजै ॥
ताको ज्योति कहत नरलोई । तेजपुंज कहियत है मोई ॥
सूरज मण्डल ताहि बतावै । जोगी जोग जुगत सों पावै ॥
सूरज मण्डल जैहैं चीरा । वालोकै कोइ पैहैं वीरा ॥
कोटिभानु कोसो उजियारो । तेज पुंजको रूप विचारो ॥
तीनि लोकसों बाहर होई । सात भवन सों बाहर सोई ॥
ताके ऊपर अविचल लोका । पापपुण्य दुख सुख नहिं शोका ॥
काल न ज्वाल अवधि नहिं होई । रनजीतदास जहाँ सुरतिसमोई ॥
महाअगोचर¹ गुप्तसों गुप्ता । जहां विराजत हैं भगवंता ॥
अमरलोक गौ लोक कहावै । चौथा पद निर्वान बतावै ॥
अगमपुरी बेगमपुर ठाऊं । कहा बुद्धिसों सब गति गाऊं ॥
कंछुइक वरणि बताऊं वाको । ब्रह्मासुत सतजुग में भाषो ॥
पुहुपद्वीप है श्वेत अकारा । सब ब्रह्माण्डनसूं है न्यारा ॥
जो कोइ जाय बहुरि नहिं आवै । आवागमन सकल बिसरावै ॥
जो कोइ गयो बहुरि नहिं आयो । देही दिव्यरूप अति पायो ॥
सोलह बरष उमर नित रहै । अजर अमर निधि आनँद लहै ॥
बूढ़ा बाला होय न तरुणा । षोड़श भानुरूप जहाँ धरणा ॥
तत्त्वस्वरूपी काया पावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
१ देखने में न आवै ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १७
पांचतत्त्व विनहै थिरथायो । ना वह वन्यो न कृत्यवनायो ॥
ओर छोर कछु दीखत नाहीं । कवसौं है और कवसों नाहीं ॥
है अडोल मर्जाद न ताकी । वेपरमान वेद यों भाषी ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । कछू कछू धरिध्यान वतावै ॥
अनन्तभानु के सो उजियारो । पिण्ड ब्रह्माण्ड दोउते न्यारो ॥
लोकमध्य अविचल निजधामा । श्वेतरूप अगमपुर नामा ॥
अगमपुरी निरधारा सूची । हंसलहैं जिनकी मति ऊंची ॥
वेहद लोक वन्यो अतिभारी । असंख्यभानु कीसी उजियारी ॥
दो० हद्दकहूँ तौ है नहीं, वेहद कहूँ तौ नाहिं ।
ध्यान स्वरूपी कहतहौं, वैन सैन के माहि ॥
अतिउज्ज्वल रवि दृष्टिन ठहरे । मणि हीरा लागे जहाँ गहरे ॥
कई रङ्गके हीरा भाखे । कलश कँगूरा स्थिरराखे ॥
ताभीतर वहु द्रुम* अशोगा । अक्षयवृक्ष फललगे

१६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माया उपजै बिनशै अतिही । चेतन ब्रह्म अमरहै नितही ॥
पारब्रह्म पुरुषोत्तम जानो । चरणदास के सो मन मानो ॥
दो०-अमरलोक बिच पुरुषहै, ब्रह्म जु सबके माहिं ।
माया दरशत है सबै, ब्रह्म दीखतै नाहिं ॥
अब सुन अमरलोक की बानी । त्रैगुण रहित परम सुखदानी ॥
तेज पुंजके ऊपर राजै । अहंविराट सो बाहर गाजै ॥
ताको ज्योति कहत नरलोई । तेजपुंज कहियत है सोई ॥
सूरज मण्डल ताहि बतावै । जोगी जोग जुगत सों पावै ॥
सूरज मण्डल जैहैं चीरा । वालोकै कोइ पैहैं वीरा ॥
कोटिभानु कोसो उजियारो । तेज पुंजको रूप विचारो ॥
तीनि लोकसों बाहर होई । सात भवन सों बाहर सोई ॥
ताके ऊपर अविचल लोका । पापपुण्य दुख सुख नहिं शोका ॥
काल न ज्वाल अवधि नहिं होई । रनजीतदास जहाँ सुरतिसमोई ॥
महाअगोचर¹ गुप्तसों गुप्ता । जहां विराजत हैं भगवंता ॥
अमरलोक गौ लोक कहावै । चौथा पद निर्वान बतावै ॥
अगमपुरी बेगमपुर ठाऊं । कहा बुद्धिसों सब गति गाऊं ॥
कछुइक बरणि बताऊं वाको । ब्रह्मसुत सतजुग में भाषो ॥
पुहुपद्वीप है श्वेत अकारा । सब ब्रह्माण्डनसूं है न्यारा ॥
जो कोइ जाय बहुरि नहिं आवै । आवागमन सकल बिसरावै ॥
जो कोइ गयो बहुरि नहिं आयो । देही दिव्यरूप अति पायो ॥
सोलह बरष उमर नित रहै । अजर अमर निधि आनँद लहै ॥
बूढ़ा बाला होय न तरुणा । षोडश भानुरूप जहाँ धरणा ॥
तत्त्वस्वरूपी काया पावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
१ देखने में न आवै ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १७
पांचतत्त्व विनहै थिरथायो । ना वह बन्यो न कृत्यबनायो ॥
ओर छोर कछु दीखत नाहीं । कबसों है और कबसों नाहीं ॥
है अडोल मर्याद न ताकी । वेपरमान वेद यों भाषी ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । कछू कछू धरिध्यान बतावै ॥
अनन्तभानु के सो उजियारो । पिण्ड ब्रह्मण्ड दोउते न्यारो ॥
लोकमध्य अविचल निजधामा । श्वेतरूप अगमपुर नामा ॥
अगमपुरी निरधारा सूची । हंसलहैं जिनकी मति ऊंची ॥
बेहद लोक बन्यो अतिभारी । असंख्यभानु कीसी उजियारी ॥
दो० हदकहूँ तौ है नहीं, बेहद कहूँ तौ नाहिं ।
ध्यान स्वरूपी कहतहौं, बैन सैन के माहि ॥
अतिउज्ज्वल रवि दृष्टिन ठहरे । मणि हीरा लागे जहाँ गहरे ॥
कई रङ्गके हीरा भाखे । कलश कँगूरा स्थिरराखे ॥
ताभीतर बहु द्रुम* अशोगा । अक्षयवृक्ष फललगे निरोगा ॥
कल्पवृक्ष बहुरंग विरङ्गा । फल ओर पात फूल इक सङ्गा ॥
कोमलदल शोभा अतिभारी । अजर पुरुप दर्शन अधिकारी ॥
चेतनरूप गहर अतिछाहीं । साधु रहत तिनकी परछाहीं ॥
षोड़श भानु सम देह स्वरूपा । हरिरस मदमाते निधिरूपा ॥
उन वृक्सनके निचनिच मंदिर । अनगिन महल महामठ सुन्दर ॥
महलमहलपर ध्वजा पताका । पुरुपोत्तमपुरुप†नामलिखिराखा॥
ध्वजा पाताका लहरत ऐसे । खिमत वीजुरी बहुतक जैसे ॥
रतन जटिल तिनकी अँगनाई । बैठत उठत चलत हरषाई ॥
काम क्रोध नहिं लोभ अधीरा । निर्मल दिशा शील गुणधीरा ॥
जहां न आलस नींद जँभाई । भूखप्यास मलता नहिं भाई ॥
मैल पसीना आंसू नाईं । दिव्य देहधरि रहे गुमाईं ॥
प्रथमपाठ* द्रुम बहुत †सु ॥

१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
एक रूप एकै गति पाई । एक बरण एकै सबदाई ॥
संशय शोक रोग नहिं दहै । मगनरूप मन आनँद लहै ॥
षोड़शवर्ष अवस्था नितही । गुण पौरुषहरिजनके अतिही ॥
दिव्यभूषण दिव्यवस्त्र अङ्गा । श्यामगात सुन्दर छवि अङ्गा ॥
जुलफैं लटकिरहीं कजियारी । कुण्डलछविसोहत अधिकारी ॥
नासामोती सुब्रक सुढारा । सुन्दरतिलक लगतअति प्यारा ॥
दीरघ दृग कछूक अरुणाई । माथे मुकुट जटित ललिताई ॥
घरघर दिव्य आसन सिंहासन । और महासुखहैं हरिदासन ॥
दो० भौ मेटन अरुतिम हरण, तुमहिं नवाऊं शीस ।
चरणदास चरणन पर्यो, भक्तिकरो बकसीस ॥
शुकदेव गुरु कृपाकरी, दीन्हो भेद लखाय ।
साधुनके पग पूजतैं, सकलव्याधि मिटिजाय ॥
आस पास हरिजन रहें, मध्य ईश दरबार ॥
रसिक केलि बहु कुंजहैं, ललित द्वारहैं चार ॥
राजमहल जनपति रहें, कापै बरण्यो जाय ।
गिनत शारदाछविअधिक, गौरीसुत थकिजाय ॥
अनन्त भानु* कोसोउजियारो । वा 'मण्डल को रूप विचारो ॥
समतुल और कास को लाऊं । बैन सैन दै ताहि बताऊं ॥
चन्द सूर² वह ठौर न चीन्हो । दृष्टान्त देन†को पटतर दीन्हो ॥
आदि अनादि पुरातम धामा । जैसे आदिपुरुष घनश्यामा ॥
श्वेत‡रूप स्वरूप सुगन्धा । सहज महक जहँ उठत सुगन्धा ॥
चार द्वार बहु बाजन बाजैं । अनहद शब्द महाध्वनिगाजैं ॥
दिव्यरूप जो लगे किवाँरा । तिनके आगे बाग सुढारा ॥
१ सुन्दर २ सूर्य ॥
*प्रथम पाठ भानु अनन्त भानुसरिस।हितदृष्टान्त सो।श्वेतहि रूप ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १६
हरो बाग अद्भूत है भाई । दूजे द्वार महा अरुणाई ॥
तीजे द्वार बाग पियराई । चौथे ऊदो है थिरथाई ॥
उन बागन के आसा पासा । बहुत भवन जहाँ साधुनिवासा ॥
मैड़ी* मण्डप बहुत सुढारी । श्वेत वरण सुन्दर अधिकारी ॥
साधु सन्त जहाँ हरिजन पूरे । दास भाव भावना झूरे ॥
षोड़श भानु की‡ सुन्दरताई । जगत जीति पहुँचै जो जाई ॥
सखाभाव पहुँचत वहि ठांई । सखीभाव भीतर को जांई ॥
धरै स्वरूप अनूपम भारी । सदा सुहागिनिहरिपिय प्यारी ॥
परमपुरुष पुरुषोत्तम पावैं । निकटरहैं नित केलि बढ़ावैं ॥
चारौ मुक्ति¹ जहां कर जोरैं । भाव बताय तान बहु तोरैं ॥
दरशन, कारणकी सुखदाई । धरे स्वरूप रहैं हरपाई ॥
रतनजटित जहँ भूमि सुहाई । कोटि भानु छवि रहतलजाई ॥
एकसमय नित ऋतु छवि पावत । शीत उष्ण पावस नहिंआवत ॥
ऋतु वसन्त पीरी छवि सोहैं । वनघन कुंजलता मनमोहैं ॥
निज वृन्दावन है वह ठाहीं । सदा बसो मेरे मनमाहीं ॥
दिव्य फूल फूले बहुरंगा । बिन ऋतु फूले रंगविरंगा ॥
सकल सखी विचरत हरिसंगा । गोरी सखी श्याम हरी अंगा ॥
दो०-पुहुप जु फूले नित रहें, मोरैं ना कुम्हिलायँ ।
कई वरण कइरंगसों, अति सुगन्ध हरपायँ ॥
उन पुहुपन को नाम न जानौं । कहा नाम लै ताहि बखानौं ।
बहुत वृक्ष कुंजन घनछाहीं । फल अरु फूल लगे उनमाहीं ॥
काहू द्रुम न फल नहिं फूला । पुहुपरूप ह्वै आपहि झूला ॥
कोऊ लाल रूप ह्वै छायो । कोऊ श्वेत रूप मन भायो ॥
१ सायुज्य सारूप्य सामीप्य सालोक्य ॥
प्रथमपाठ * मन्दिर † दाससुभाव ‡ कि ॥

२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रंग रंग के वृक्ष बखाने । सो पुरुषोत्तम के मनमाने ॥
वनके माहिं बहुत जहाँ क्यारी । पुहुप रंग छवि न्यारी न्यारी ॥
कई भांति को बास तरंगा । मगनरूप बोलत सुरभंगा ॥
वनबिच श्वेतरूप छविनाना । गोल चौतरो रूपनिधाना ॥
इकरस चेतन परम सढोला । कोटि भानु छवि अमरअडोला ॥
जहाँ परिकर्मा सखी सहेली । बारह भानु रूप अलबेली ॥
दिव्य दमक जहाँ हीरा लागे । सात रंगके झिलमिल ताके ॥
ऊदा लाल श्वेत अरु पीरा । हरित श्याम लहरी अतिधीरा ॥
तापर चौसठ खम्भा दमकै । मानों कोटि भानु छाव झमकैं ॥
खम्भन लगे लाल ओर मुक्ता । पन्ना लगे बेलि की जुगता ॥
मूंगा लाल फिरोजा भारी । ध्यान धरो ताको नर नारी ॥
ये सब लगे बखानों ऐमे । जैसी जुगत लगे हैं जैसे ॥
जड़ लालनको विद्रुम डारी । पन्ना पात वृक्ष गतिधारी ॥
चुन्नी पँचरँग फूल सुहाये । फल मुक्ताहल झुकत झुकाये ॥
और बनी बहु चित्तरकारी । बेलि बड़ बूटा अधिकारी ॥
हीरा मोती चेतन होई । जानै साधू बिरला कोई ॥
दो०-ताकी छवि अति ललित है, शोभा सरस सुजान ।
लगो चंदोवा दिव्य अति, चेतन करो बखान ॥
लगे चंदोवा झालरि मोती । मानौ उडुगणै झिलमिलज्योती ॥
झालर बनी चंदोवा केरी । दिव्य दृष्टि करि साधुन हेरी ॥
तापर रंगमहल की शोभा । चेतन आनँद सुखकी गोभा ॥
स्थिर इकरस भीत सुढारी । बने झरोखा अद्भुत बारी ॥
अजब कँगूरा सुबक सुढारे । चौंसठ कलश लगै अतिप्यारे ॥
१ आदित्य, दिवाकर, भास्कर, प्रभाकर, सहंसांशु, त्रैलोक्यलोचन,
हरिदश्व, विभावसु, दिनकर, द्वादशात्मक, त्रिमूर्ति, सूर्य. २ नक्षत्र ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । २१
रतनजटितकी खिड़की सोहैं। ताके आगे दिनकर कोहैं ॥
भीत झरोखा कलशन माहीं। नग पन्ना लागे सब ठाहीं ॥
दो० मणि हीरा माणिक लगे, रंगमहल के माहिं ।
बिन पहुंचे निज धामके, क्योंहूँ दीखत नाहिं ॥
आसपास बहु कुंज हैं, बीच लालको धाम ।
चरणदास को दीजिये, सखियन में विश्राम ॥
जैसे चौसठ खम्भ हैं, तैसे करों बखान ।
छत्र सिंहासन वर्णहूँ, ओर सखियन की आन ॥
तीस खम्भमें खम्भा बीस । तामें चौदह खम्भा ईस ॥
परम बिछौना है थिरथाये । मानौ सूरज लक्ष छवि छाये ॥
तापर सिंहासन बड़भागी । श्वेतरूप चेतन अनुरागी ॥
सिंहासन पर कछू बिछायो । शोभा ताकी कहत न लजायो ॥
धरो गेंदवा तकिया नीके। छत्तर सोहै ऊपर पियके ॥
पियकी शोभा कहा बखानूं । आदि अन्त ताको नहिं जानूं ॥
अक्षर पुरुष पुरुषोत्तम स्वामी । सब जीवनको अन्तरयामी ॥
पारब्रह्म अविचल अविनाशी । वायें अङ्ग रूपकी राशी ॥
गोरी राधा कृष्ण श्यामघन । सिंहासन पर ललितमुदितमन ॥
आसन जहाँ अखिलजगदीशा । मुकुट चन्द्रिका सोहै शीशा ॥
मकराकृत कुण्डल छवि ऐसी । जग में कहा बखानूं जैसी ॥
जुलफें श्याम भुवङ्गम कारी । कजियारी अरु घुंघुरवारी ॥
सहज सुगन्ध रहे महकाई । लांबी चिकनी अरु बलखाई ॥
बांकी भौंह कुटिल अनियारी । तिरछी पलकें लागें प्यारी ॥
रस के माते घूम घुमारे । ललचौंहैं दृग हैं कजरारे ॥
१ जो कभी जूदा न हो ॥
प्रथमपाठ
जल ॥