भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७७
अंकुश शिरके माहि जु बेड़ी पायँकै ॥
शीश धुनै पछिताय वै आनँद कितगये ।
जो सुख वनके माहिं सभी स्वप्ना भये ॥
सदाहुतो निर्बन्ध आय बंधन बँधो ।
कहैं चरणहींदास काम फंदन फँधो ॥
दो० सपरशकी इच्छा किये, भया जु ऐसा हाल ।
पशु पक्षी नर नारिही, फँसे कामके जाल ॥
अष्टपदी ॥
भाषत दत्तात्रेय जु साधूजन कभी ।
कामिनि ओर निहारि करै सपरश तभी ॥
हस्ती कैसो हाल साधुको होय है ।
सुमिरण ज्ञानरुध्यान जु सबही खोय है ॥
जो कहै हमहैं साधु जु कोई भार्या ।
चूमै हमरे चरण तासु होयहै कहा ॥
चरणन चूमै आय हाथ धरि पायँ पै ।
साधूमन चलिजाय स्पर्श सुख पायकै ॥
वाको सुख उरधारि करै इक कामिनी ।
वाते पुत्र कलत्र बहुतही यामिनी ॥
वनमें तप अरु योग जु करतो निशदिना ।
सो सबही गयो भूलि नहीं सुख इकछना ॥
ताते हस्ती गुरू हिये में धारिया ।
कामिनि को परसंग सकल निवारिया ॥
काठ कि पुतली होय कै कागज में रंची ।
चरणहिंदासाहोय सोभी देखन तजी ॥
॥७३॥
२७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० पन्द्रहवों गुरु मृग कियो, ताकी गति सुनिलेहु ।
औगुणहीं को छोड़िकरि, गुणहीं में चितदेहु ॥
अष्टपदी ॥
मृग देखो वन माहिं तासु मति आनियां ।
जीव दियो वहि ठौर सोई हम जानियां ॥
वधिक बजाई बीण राग गावनलगो ।
सरवण सुनि वह हिरण रीझि आयो भगो ॥
पहुँचेा पारधि पास बाण उन मारिया ।
ता दिन रागको चाव सकल निवारिया ॥
जो विरक्त सुनै राग जु रस शृङ्गारको ।
ऐसहि होवै ख्वार नरकमें जायसो ॥
सुनिये गुण गोपाल चरित कर्त्तारको ।
जासों दुख छुटिजाय ये मायाजारको ॥
तासों उपजै ज्ञान ध्यान दृढ़ करि गहै ।
पावै पद निर्वाण जहां सुखसों रहै ॥
निश्चयही तू जान जु मैंने यह कही ।
चंचलता गह छूटि जु बुधि निश्चल भई ॥
ताना रीरी राग नाच बिसराइया ।
चरणहिंदासा होय चरण चित लाइया ॥
दो० कहूं सोलवीं मीनकी, बुरी जीभ की स्वाद ।
जो कोई यामें फँसै, लगै बहुत उठि व्याध ॥
अष्टपदी ॥
सोलहौं गुरु सुन मीन जो ऐसे देखिया ।
वा मच्छी को एक वधिक अवरेखिया ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७६
थोरो मांस लगाय जु बंशी साथही ।
जलमें दी छुटकाय डोर गहि हाथही ॥
जिह्या स्वाद के काज मीन वह खाइया ।
गई उदर के माहिं हिये अटकाइया ॥
तीक्ष्ण कांटा लोह उदरको फारिया ।
ताहीक्षण वह मीन प्राण तजि डारिया ॥
ताते मच्छी गुरू हिये माहीं करो ।
जिह्याको कछु स्वाद नहीं मनमें धरो ॥
जो विरक्त को स्वाद जीभको चाहिये ।
बहुत भांति दुख होय नहीं सुख पाइये ॥
जिह्या स्वाद के काज गृही घर जायहै ।
आछो भोजन पाय तौ रुचिसों खायहै ॥
भोंड़ो भोजन होंय तौ नाक चढ़ावई ।
हरि सुमिरण को त्यागिकै जिततित जावई ॥
ताते साधूलोग नहीं घर घर फिरैं ।
जिह्या को कछु स्वाद नहीं चितमें धरैं ॥
ऐसे भोजन खाय लखै ज्यों औषधी ।
सबही रोग नशाहिं रहै काया शुधी ॥
चीकन भोजन खाय नींद बहु आवई ।
ध्यान भजनकी रीति सकल बिसरावई ॥
सब इन्द्रिन के माहिं जो जिह्यावशकरै ।
जो आवै सोइ खाय कभूं भूखो रहै ॥
जो जिह्यावश होय तौ इन्द्री वश सबै ।
जो रसना वश नाहिं तौ सब परबल तबै ॥
चीकन भोजन खाय तौ इन्द्री सब जहां ।
२०
२८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अतिही है बलवन्त करें औगुण तहां ॥
षटरसही के स्वाद सों नारी वशभये ।
जग माहीं दुखपाय मुये नरकैगये ॥
मन्में देखि विचारि गुरू कियो मीनहूं ।
जासों लीनी सीख इन्द्रिभइ क्षीनहूं ॥
सबही स्वाद भुलाय शरण हरिकी लई ।
चरणहिंदासा होय सुरति निर्मल भई ॥
दो० सत्रहवों गुरु पिंगला, लीन्हों जासों ज्ञान ।
आशातजिनिर्मलभयो, लगो रहूं हरिध्यान ॥
अष्टपदी ॥
गुरु सत्रहवों जान हमारो पिंगला ।
पर आशा दइ छांड़ि रहूं आनँद मिला ॥
इक दिन राजा जनक विदेही के नगर ।
गयो अचानक लख्यो पिंगला को बगर ॥
पिंगला उठि परभात भली विधि न्हाइया ।
भूषण बस्तर पहिरि सुगन्ध लगाइया ॥
घरके द्वारे बैठि जु बाट निहारई ।
कोऊ दे बहु द्रव्य सु ह्वां पग धारई ॥
मारग में नर देखि यही आशा करै ।
आवतजानै ताहि खुशी हियमें धरै ॥
जब वह आयो नाहिं दुखी मनमें भई ।
कबहूं आश निराश ऐसही निशि अई ॥
ऐसे सब दिन बीतिगयो यहि भांतिही ।
मनमें भई मलीन आइ पुनि रातिही ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन २८१
काया आलस धारि जु घर भीतर गई ।
पलका बैठी जाय जहां भलि सेजही ॥
बिछे बिछौना श्वेत फूल तापर धरे ।
लेटी तहां मग जोय नैन निद्राभरे ॥
कबहूं उठिजा द्वार कभूं जा भीतरै ।
कहै चरणहींदास नींद नाहीं परै ॥
दो० आशाकी डोरी बँधी, क्षण घर में क्षण द्वार ।
थिरताना संतोषबिन, दुखी पिंगलानार ॥
अष्टपदी ॥
ऐसे आधीराति गई जब बीति कै ।
कोऊ आयो नाहिं सुहां कछु प्रीतिकै ॥
पिंगला उपजो ज्ञान हिये परकाशही ।
उदयभयो संतोष लोभ गयो नाशही ॥
वर्ष सहसदश माहिं जु तप कोऊ करै ।
हिरदै निर्मल होय सभी कलिमल हरै ॥
ऐसो ज्ञान उजास पिंगला को भयो ।
तब उन हिरदै माहिं वचन ऐसो कह्यो ॥
हीन हमारे भाग जन्म योंहीं गयो ।
मनुष रूपसों काम क्रोध लोभै छयो ॥
ताते जिविका आप हिये में चाहिया ।
परमातम भगवान सों प्रीति न लाइया ॥
सदा विराजत निकट दूरि नहिं होतहै ।
सबविधि पूरणकाम सकल जग ज्योतिहै ॥
सबहीको नित देतु खान अरु पानई ।
चरणहिंदासा होय सोई यह जानई ॥
२८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० लख चौरासी योनि में, सवको भोजन देय ।
सदा वही पालन करै, अपनो नाम न लेय ॥
अष्टपदी ॥
मनुषरूप जो देय एकदिन खानको ।
दूजे दिन वह बहुत घटावै मानको ॥
नारायण सों भक्ति जो जगको सुख चहै ।
ऐसे वाको देय सदा एकरस रहै ॥
जाके लीन्हे नाम सकल पातक नसैं ।
कथा जु उनकी सुनै हिये आनँद लसैं ॥
ऐसो हरि विसराय मनुषको चाहिया ।
विरथा जन्म गवाँयकै सुख नहिं पाइया ॥
काया है इक गेह हाड़ अरु मांस को ।
नाड़ी गुणसों बांधि रखो है तासु को ॥
चामरु लोहू पीब तहां नव द्वारहैं ।
सदा बहतही रहत यही जु विचारहैं ॥
विष्ठा मूत जो होय या गेहके माहिंहीं ।
ऐसे घरसों भोग मुदित मन चाहहीं ॥
ऐसे विरथा आयु सकल जु गवाँइया ।
हरि के चरणनदास नहीं जु कहाइया ॥
दो० अब उरमें ऐसी उठी, करूं भक्ति चितलाय ।
चरणकमल में मन धरूं, जगसों नेह उठाय ॥
अष्टपदी ॥
• अब करूं भक्ति उपाय जु हरि मनभाइया ।
ताते लेहुं रिझाय परमगुण गाइया ॥
जैसे लछमी सेव करी मन लायकै ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८३
कीन्हे महाप्रसन्न श्रीपति धायकै ॥
ऐसे मन भगवान सों अपनौ लायलौं ।
पावों पुरुष निधान प्रीतिके भायहौं ॥
लछमी करी जु भक्ति पुराणन में कहैं ।
नारायण दई ठौर सदा हियमें रहें ॥
मैंहूं ऐसी भक्ति करूं अतिप्रेम सों ।
करूं महापरसन्न अधिकही नेमसों ॥
आज के दिनसे आश पुरुष की त्यागिकै ।
राखूं प्रभुकी चाह चरणहीं लागिकै ॥
जो कछु हरि मोहिं देयँ सोई निर्दोषहै ।
करूं भजन भगवन्त तासु सों मोपहै ॥
मनुष रूप कह वस्तु जु आशा कीजिये ।
बहुत वहाँलों देत जहाँलों जीजिये ॥
दो० दुख में काम न आवई, मुये न संगी कोय ।
चरणदास यों कहत हैं, ये संसारी लोय ॥
अष्टपदी ॥
जब वह मृतक होय नहा कछु हेत है ।
हरि जु सदाही संग सभी सुधिलेत है ॥
मनुष आपनी नाहिं जु इच्छा करिसकै ।
औरन को कहा देय मूर्ख योंहीं तकै ॥
पिंगला कहो यह ज्ञान मुझे क्यों आइया ।
नीके काजन माहिं न चित्त लगाइया ॥
तीरथ बर्त्त न साधू दर्शन देखिया ।
हौं तिरिया बुरे कर्म कि चाल विशेषिया ॥
पुरुषोत्तम की दया मों यह पहिचानिये ।
२८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और बात कछु नाहिं हिये में आनिये ॥
जो कोई कहै आज कछू धन ना लयो ।
कोई आयो नाहिं ज्ञान ताते भयो ॥
आगेहू बहुदिवस कोई नहिं आइया ।
कीन्हे लंघन बहुत द्रव्य नहिं पाइया ॥
ज्ञान कबहु नहिं भयो आज जानत नहीं ।
कौन भाग बड़ मोर भयो परगट अभी ॥
कहैं गुरू शुकदेव जु उन नहिं जानियाँ ।
दत्तात्रेय के दर्शसों कुमति भुलानियाँ ॥
दो० पिंगला आई घर बिषे, छोड़ि मनुषकी आश ।
सुखी होय सोवन लगी, जब वह भई निराश ॥
अष्टपदी ॥
मनमें किय सन्तोष सकल दुख मिटिगये ।
छोड़ी जग की आश हिये आनंद छये ॥
यों कहैं दत्तात्रेय राजासों यही ।
वाकी मैं लइ सीख सोई दृढ़ करि गही ॥
गृही द्वार नहिं जावँ न मांगौं कछु कहूं ।
ताते सुखी अरु शान्त सदा बैठोरहूं ॥
उद्यम करूं कछु नाहिं वासना त्यागिकै ।
आनंद तन मन मोहिं बहुत अनुरागकै ॥
मनुष दुखी वहि होय रहै आशा लिये ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह उतपति किये ॥
जो आशा मन आय कबहु वह नाभई ।
क्रोध भयो उत्पत्ति यही मनसा ठई ॥
काहूते इकवस्तु कभू जु मँगाइया ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८५
वाने दीन्हीं नहिं क्रोध उपजाइया ॥
वाते कीन्हों वैर अधिक रिस ठानिया ।
नारायणके ध्यान सुरति नहिं आनिया ॥
यह शिक्षा लइ मानि पिंगलासे तभी ।
जगकी छोड़ी आश भये कारज सभी ॥
दो० चील्ह अठरहों गुरु कियो, मिटो सकल सन्देह ।
रहौं अकेलो संग तजि, करौं न कछु संग्रह ॥
अष्टपदी ॥
जब गृहसेती निकसि वैरागी हम भये ।
तब हमरे मनमाहिं जु ये कारज छये ॥
दो भाजन सँग होहिं एक जल पीजिये ।
दूजे भाजन माहिं खानको लीजिये ॥
इक चादर कोपीन दोय यह चाहिये ।
ताते ओढ़ि नहान किं युक्ति बनाइये ॥
करिकै जब अस्नान ध्यान करने लगो ।
मनमें चिन्ता कोऊ कोपीनहिं लै भगो ॥
समझो यह मनमाहिं बहुत अधिकारते ।
अन्त महादुख होय मोह उरधार ते ॥
ऊंची पदवी पाय बहुरि नीचे परै ।
जब वह संपत जाय घनो मनमें झुरै ॥
जो कोइ रहै इकन्त अकेलोई सहै ।
ताहि उदर को शोच कछू नाहीं रहै ॥
दशबिस सौ जो साथ अधिक दुख लहत है ।
आप अकेलो रहै परमसुख सहत है ॥
२८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सकल विकल बिसराय जु आनँद पावई ।
चरणहिंदासा होयकै बोझ बगावई ।
दो० उड़ती देखी चील्ह को, पंजे माहीं मांस ।
बहु पक्षी घेरे फिरैं, लेन न देवैं श्वास ॥
अष्टपदी ॥
पक्षी सभी लुभाहि मांसको देखिकै ।
वाको मारै चोंच जु लोभ विशेषिकै ॥
कोई नोचै पंख कोई मस्तक भनै ।
वह दुख पावै बहुत समझि मूड़ी धुनै ॥
मैं काहूसे वैर प्रीति नहिं मानिया ।
या भक्षण के काज कष्टही जानिया ॥
मांस दियो छिटकाय जुदे पक्षी भये ।
वा भक्षण के पास सभी दौरे गये ॥
वह बैठी मन मुदित जु पंख पसारिकै ।
दीन्ह्यो दुख बिसराय जु व्याधा टारिकै ॥
वा दिनते लइ सीख जु संग्रह ना करौं ।
कछू न राखौं पास नग्न तन मैं फिरौं ॥
जहँ चाहूँ तहँ जावँ भजन आनन्द में ।
कछु मन चिन्ता नाहिं छुटो सब बन्धते ॥
काहू वस्तु न शोच कोई लैजायगो ।
चरणहिंदासा होय ध्यान हरिपाय को ॥
दो० बालक गुरु उन्नीसवों, ताके लिये स्वभाव ।
नहीं मान अपमान है, लोभ न कछू उपाव ॥
अष्टपदी ॥
बालक माहीं नहीं मान अपमानहूं ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८७
लोभ जु वामें नाहिं रहै अनजानहूं ॥
मारै कोई वाहि रोष वह ना करै ।
करै जु फिरि वह प्यार बाल हँसि हँसि परै ॥
निन्दा अस्तुति दोय कभी नहिं धारई ।
वैर प्रीतिको अङ्ग कछू न विचारई ॥
जो मणि बहुतै मोल कि वासे लीजिये ।
खेल खिलौना फूलको पलटे दीजिये ॥
मणिको लोभ न करत कछू नहिं भाषई ।
चितको अपने खेलके माहीं राखई ॥
जो कोउ नारी पकरि हिये सों लागई ।
बालक अरु वा नारिको काम न जागई ॥
नग्न जु बालक फिरत लाज नहिं आवई ।
ज्यों भावै त्यों रहै कोई न चलावई ॥
क्रिया कर्म अरु सकुच कछू वाके नहीं ।
ठाकुर अरु चरणदास कछू जानै नहीं ॥
दो० बोले दत्तात्रेय जी, राजासों यह बैन ।
इकदिन बालक की सबै, देखी अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
भाषैं दत्तात्रेय बालगति देखिकै ।
वाकेलिये स्वभाव सभी जु विशेषिकै ॥
जो कहुँ हमसों प्रीति बहुत आदर कियो ।
काहूं गारी काढ़ि बहुत झड़को दियो ॥
दोनों एक समान और नहिं व्यापई ।
बैठूं सहज स्वभाव उठूं फिर आपई ॥
जो किन्हूं भोजन दियो चाटिहाई लियो ।
२८८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
करही को करपत्र पानी तामें पियो ॥
अष्टधातु कों लोभत्याग सबही कियो ।
कैसोहि बस्तरदेहु छांड़ि तितही दियो ॥
ज्यों बालक निज खेलमें आनँदसों रहै ।
त्यों परमातम संग कछू दुखहू न भै ॥
तुरिया पद निर्वाण मातु समहीं कहूँ ।
ताकी गोदी माहिं सदा सुखसों रहूँ ॥
चरणहिंदासा होयकै गर्व नशाइया ।
छोटापन के अंग सबै तब आइया ॥
दो० कन्या गुरु कियो बीसवों, समझि विचारिकै देखि ।
रहौ अकेलो तभीसों, पायौ यही विवेक ॥
अष्टपदी ॥
पुण्य तू बिसवों जान गुरू कन्या कियो ।
वाको मत अनुराग हिये माहीं लियो ॥
इक नगरी के माहिं एक दिन हम गये ।
इक गृहचारी के गेह जाय ठाढ़े भये ॥
स्यानी कन्या तासु जु घरमाहीं हुती ।
मात पिता केहु काज गवन कीन्हों तभी ॥
करन सगाई आय लोग बैठे तहीं ।
या कन्याकी करें सगाई आजहीं ॥
कन्या कीन्हों सोच यही कैसे कहूँ ।
मात पिता कहिं गये अकेली मैं अहूँ ॥
ऐहैं मातरु पिता चिन्त मनमें करैं ।
भोजन को कछु नाहिं जु हम आगे धरैं ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८६
कन्याकरिकै शोच ये वचन उचारिया ।
मात पिता गये कहीं अभी पगधारिया ॥
आवो बैठौ खाट रसोई खाइये ।
भोजन होत सवार कहों नहिं जाइये ॥
वाके गृह कछु नाहिं धान थोरे हुते ।
कूटनलागीं ताहि सोई अपने मते ॥
चूरी हाथके माहिं बहुत खरकन लगीं ।
फिरि समझि मनमाहिं शोचमाहीं पगीं ॥
यों समझैं ये लोग कछू गृहमें नहीं ।
भोजन कारन धानजु कूटति है तहीं ॥
चूरीडारी फोरि दोय तहँ राखिया ।
तऊ न खरको गयो शब्दही भाषिया ॥
दूजी दइ बिगसाय एकही रहगई ।
तब खरका नहिं होय कुटत निर्भय भई ॥
वादिन कन्या गुरू जु हमने चितधरा ।
साधु अकेलों रहै सदा आनँद भरा ॥
धर्मशाला ते निकसि शिष्य को साथलै ।
कबहुँ उपजै क्रोध शिष्य भाषै यहै ॥
आपनहीं लियो बहुत हमें थोरो दियो ।
गुरूको चहिये टहल शिष्य रूठै गयो ॥
गुरू कहै कछु और शिष्य औरै कहै ।
झगड़ै आपस माहिं प्रीति थिर ना रहै ॥
दोउमें कलकल होय शान्ति नहिं आवई ।
विना अकेलेरहे चैन नहिं पावई ॥
पशु पक्षी नर नारि संग नहिं लीजिये ।
२६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दूजेही को साथ सभी तजि दीजिये ॥
छूटैं सकल कलेश ध्यानलागै भलो ।
चरणहिं दासा होय रहै हरिसों मिलो ॥
दो० गुरु कीन्हो इक्कीसवों, ताहि तीरगर जान ।
चरणदास यों कहतहैं, वासों सीखो ध्यान ॥
अष्टपदी ॥
पुनि इक्कीसवों गुरू तीरगर हमकियो ।
ताते ध्यानको भेद सीखि हिय में लियो ॥
इकदिन नगरीमाहिं तीरगर हाट में ।
ठाढ़भयो तहँजाय चलतही वाट में ॥
वह तौ बनावत तीर अपनी जानमें ।
और कछू सुधि नाहिं पगो वा ध्यानमें ॥
वाके आगे होय भूप इक आइया ।
हस्ती अरु दल साज निशान बजाइया ॥
भयो मुहूरत एक मनुष तहँ आइकै ।
भूप गयो इस राह बुझो जु सुनायकै ॥
वह तौ साजत तीर यही उत्तर दियो ।
हम तौ जानत नाहिं नहीं दरशन कियो ॥
भाषत दत्तात्रेय जु हम वासों कह्यो ।
राजा सँग बहु भीर शब्द दुन्दुभि भयो ॥
बहुत कटक लिये साथ जु भूप सिधारिया ।
तैं काहे नहिं सुनो न दृष्टि निहारिया ॥
उन यों उत्तर, दियो तीरके ध्यानहीं ।
सुरतिरही तेहि माहिं याते नहिं जानहीं ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६१
वाको कीन्हो गुरू हियेमें धारिकै ।
मन हरिचरणन पास रखूं निर्धारिकै ॥
दृष्टि मना अरु बुद्धि जहां जु लगाइया ।
ऐसो कहिये ध्यान विरल कहूँ पाइया ॥
दो० ध्यान करै दृग मूंदि करि, जो कोई नर नार ।
खटका सुनि पलकैं खुलैं, मन चल वारंवार ॥
अष्टपदी ॥
वह नहिं कहियत ध्यान जु खुलि खुलि जात है ।
निश्चल लागै ध्यानजु पूरी बात है ॥
ध्याता ध्यान के बीच ध्यान ध्येय माहिं है ।
तीनौ एकहि होहिं विघ्न कछु नाहिं है ॥
मन हरिचरणन पास कायाकी सुधि नहीं ।
भूखप्यास कछु नाहिं ध्यान लागत तहीं ॥
मन गयो औरै ठावैँ ध्यान जो लाइये ।
सो वह डिगि डिगि जाय न थिरता पाइये ॥
जब नारायण साथ मगन मन है-गयो ।
सबकारज गयो भूलि कछू सुधि ना रह्यो ॥
जैसे भाषत लोय समाधी पुरुष को ।
दिन बीतैं दश बीस नहीं सुधि बुधि कहूँ ॥
कहिये यही समाधि वासना सब जरैं ।
कोटिन मध्ये एक ध्यान एसो धरैं ॥
सोई चरणको दास सोई योगीश है ।
सोइ साधक सोइ सिद्ध जु विस्वेबीस है ॥
दो० ध्यानी ध्यान लगायकै, रहै राम लवलाय ।
आपा बिसरै हरिमिलैं, बहुरि न उपज आय ॥
२६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
तनकी सुधि बिसराय कछू सुधि ना रहे ।
या विधिसे जो करै ध्यान ताको कहै ॥
हलचल ध्यान जो करै सो हरिसों ना मिलै ।
अफल ध्यान सोइहोय जो मनक्षणक्षणचलै ॥
तीर बनावनहार गुरू हमने कियो ।
ताते यह उपदेश हिये माहीं लियो ॥
ऐसे मन को साधि प्रभू चरणन धरै ।
ह्वांहीं रहै चितलाय जु इतउत ना फिरै ॥
बाइसवों गुरु सांप हमारो जानिये ।
ताते लीन्ही सीख यही पहिचानिये ॥
सदा अकेलो रहै कबौं घर ना करै ।
रैनि जहाँ कहुँ होय वहीं वह बसि रहै ॥
वाकी देखी रहनि जु मनमें लाइया ।
सदारहूँ निर्बंध न मन्दिर छाइया ॥
उपजो मोह न लोभ लगे नहिं दाग है ।
चरणहिंदासा भयो द्वेष नहिं राग है ॥
दो० बँधा जु पानी गांदला, चलता निर्मल होय ।
दोनों रीति विचारिकै, भलो होय सो लोय ॥
तेइसवों मकरी गुरू, उगलि तार भखि जाय ।
ऐसे जग परकाश करि, प्रभुले आप लुकाय ॥
अष्टपदी ॥
तेइसवों गुरु जान हमारो माकरी ।
आप सों काढै तार रहै वामो खरी ॥
फिरि वह तार समेटि लेय उरमें धरै ।
यों हरिलीला जानिय कौतुक सो करै ॥
वसुधाको उपजाय करै पालन जभी ।
फिरि सब लेय मिलाय आप माहीं तभी ॥
जैसे मकरी तारसों जाल बनाइया ।
फिरि आपन वा बीचमें सहज समाइया ॥
जब चाहै वह जाल उदरमें लै धरै ।
मच्छी जाल में फँसै सो नहीं ऊबरै ॥
भाषैं दत्तात्रेय मुक्ति जो चाहिये ।
हरि उतपति क्षय करन शरनमें आइये ॥
जन्म मरण भयमानि भक्ति में पागिये ।
जगके जालसों छूटि वेगिही भागिये ॥
लीजै त्यागि वैराग चरणहीं दास हो ।
हरियश हरिगुण गाय तजो जग वासहो ॥
दो० भृङ्गी मिलि भृङ्गी भवै, सुनो हतो यह बैन ।
अब मन आई सांचही, देखा अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
चौबिसवों गुरु कियो जु भृङ्गी जानिकै ।
वासों निश्चय भई हिये में आनिकै ॥
सुनीहती यह बात जु कोई हरिभजै ।
निशिदिन मन ह्वां लायकै प्रभुसेवा सजै ॥
सो नारायणरूप आप ह्वै जात है ।
यामें संशय नाहिं सांच यह बात है ॥
मन ठहरत ना हुती ये बात सुहावनी ।
सेवक जो कोइ होय सो क्यों होवै धनी ॥
भृङ्गी को हम लखो कीट इक आनिकै ।
२६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राखो उन गृह माहिं आपनो जानिकै ॥
आपन बाहर बैठि ताहि सम्मुख कियो ।
केतक दिवसन माहिं व भृङ्गी करि लियो ॥
भृङ्गी रूपको देखिकै भृङ्गी ह्वै गयो ।
ताते भृङ्गी गुरू हमारे मल छयो ॥
जैसे करै कोइू ध्यान सो वा सम होतहै ।
नहींरहै चरणदास रहै ब्रह्मज्योतिहै ॥
दो० चौबीसौ पूरेकिये, समझिसमझिकरि देखि ।
विरक्त ह्वै जग में रहूं, लगै न माया रेखि ॥
फिरि अपनी कायालखी, रही न जासों प्रीति ।
थके जु इन्द्री स्वाद ही, सहज गई सबरीति ॥
अष्टपदी ॥
भाषैं दत्तात्रेय गुरू इक देह है।
पहिले मोको होतो अधिक सनेहमै ॥
देखो क्षण क्षण देह क्षीण ह्वै जातही ।
नित उठि सुखके काज भला कुछ खातही ॥
बहुत चाव करि आप भलो भोजन कियो ।
दूजे दिन वहि भांति घनोही दुख दियो ॥
इकदिन बस्तर विमल बनाये लायकै ।
फिरि बस्तरके काज फिरूं दुख पायकै ॥
जितनो कियो उपाय काया सुखकाजही ।
कबहूं सुख ना भयो फिरत बेलाजही ॥
इकदिन एक उपाय जु सुखको धारिया ।
दूजेदिन वहि दुःख बहुत विस्तारिया ॥
और लखी यह बात यह काया आपनी ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६५
अपनीही होव नाहिं विचारीही धनी ॥
मूरख जानै नाहिं सुयाही भेद को ।
होव ना चरणदास सहै बहु खेद को ॥
दो० बालपने अरु तरुणमें, और बुढ़ापे माहिं ।
तीनो पनमें देह यह, कबहुँ अपनी नाहिं ॥
अष्टपदी ॥
बालकपनमें हाथ बाप अरु मायकै ।
तरुणापन में फँसै त्रिया कर जायकै ॥
वृद्ध अवस्था माहिं पुत्रके हाथहीं ।
पुनि जब मृतकहोय अगिनि जारै तहीं ॥
जो थोंहीं रहिजाय पशू आदिक भखैं ।
देह न अपनी होय ज्ञान मांही लखैं ॥
वादिन ते सुखकाज नहीं श्रमधारिया ।
परालब्ध जो आय उदरमें डारिया ॥
कायाते इककाज भलो पुनि होत है ।
हरि की प्रापत होय जु ज्ञान उदोत है ॥
मृत्यु जबहिं होयजाय य काया ना रहै ।
भारे कैसो गेह जीव काया लहै ॥
जबहीं आवै काल नहीं ठहरायगो ।
खर्चे जो बहु द्रव्य न क्षण रहि जायगो ॥
जबहीं समुझो ज्ञान देहको जीय में ।
भयो विरक्त विचार आपने हीय में ॥
लई सीख चौबीस देहहित त्यागिकै ।
कीन्हो हरिको ध्यान बहुत अनुरागिकै ॥
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३८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दत्तात्रेय ये बचन कहे बहु चावसों ।
पुनि तीर्थन को गये भक्तके भावसों ॥
राजा सुनि यह ज्ञान हिये में धारिया ।
हरिसों सुरति लगाय सकल दुख टारिया ॥
चरणहिं दासा होय परमसुखही लियो ।
तन को जगमें राखि जु मन हरिको दियो ॥
दो० दत्तात्रेयी ने कहे, जो राजा से वैन ।
सो मैं भाषा में कियो, समझो पावो चैन ॥
अष्टपदी ॥
चौबीसों के माहिं होय उपदेशदै ।
सतगुरु वाहि उबारि किये सब दूरि भै ॥
उन्हीं के परताप चौबीसौ समझही ।
आई घटके माहिं जु उज्ज्वल बुद्धिही ॥
चौबीसौ तनधारि जु अंग बताइया ।
जासों भयो कल्याण अधिक सुख पाइया ॥
ऐसे हैं गुरुदेव ये निश्चय जानिये ।
सकल विकल सब छोड़ि गुरुही मानिये ॥
गुरुही के परसाद मिलैं नारायणा ।
जन्म मरण बँध छूटि होय पारायणा ॥
समरथ श्री गुरुदेव शीशपर राखिये ।
भवसागर की व्याधि सकलही नाखिये ॥
कहैं मुनी शुकदेव चरणहींदास को ।
वही जु पावै चौथे परमनिवास को ॥
दो० गुरु समान तिहुँलोक में, और न दीखै कोय ।
नाम लिये पातक नशैं, ध्यान किये हरिहोय ॥