भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६५
अपनीही होव नाहिं विचारीही धनी ॥
मूरख जानै नाहिं सुयाही भेद को ।
होव ना चरणदास सहै बहु खेद को ॥
दो० बालपने अरु तरुणमें, और बुढ़ापे माहिं ।
तीनो पनमें देह यह, कबहुँ अपनी नाहिं ॥
अष्टपदी ॥
बालकपनमें हाथ बाप अरु मायकै ।
तरुणापन में फँसै त्रिया कर जायकै ॥
वृद्ध अवस्था माहिं पुत्रके हाथहीं ।
पुनि जब मृतकहोय अगिनि जारै तहीं ॥
जो थोंहीं रहिजाय पशू आदिक भखैं ।
देह न अपनी होय ज्ञान मांही लखैं ॥
वादिन ते सुखकाज नहीं श्रमधारिया ।
परालब्ध जो आय उदरमें डारिया ॥
कायाते इककाज भलो पुनि होत है ।
हरि की प्रापत होय जु ज्ञान उदोत है ॥
मृत्यु जबहिं होयजाय य काया ना रहै ।
भारे कैसो गेह जीव काया लहै ॥
जबहीं आवै काल नहीं ठहरायगो ।
खर्चे जो बहु द्रव्य न क्षण रहि जायगो ॥
जबहीं समुझो ज्ञान देहको जीय में ।
भयो विरक्त विचार आपने हीय में ॥
लई सीख चौबीस देहहित त्यागिकै ।
कीन्हो हरिको ध्यान बहुत अनुरागिकै ॥
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