भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दत्तात्रेय ये बचन कहे बहु चावसों ।
पुनि तीर्थन को गये भक्तके भावसों ॥
राजा सुनि यह ज्ञान हिये में धारिया ।
हरिसों सुरति लगाय सकल दुख टारिया ॥
चरणहिं दासा होय परमसुखही लियो ।
तन को जगमें राखि जु मन हरिको दियो ॥
दो० दत्तात्रेयी ने कहे, जो राजा से वैन ।
सो मैं भाषा में कियो, समझो पावो चैन ॥
अष्टपदी ॥
चौबीसों के माहिं होय उपदेशदै ।
सतगुरु वाहि उबारि किये सब दूरि भै ॥
उन्हीं के परताप चौबीसौ समझही ।
आई घटके माहिं जु उज्ज्वल बुद्धिही ॥
चौबीसौ तनधारि जु अंग बताइया ।
जासों भयो कल्याण अधिक सुख पाइया ॥
ऐसे हैं गुरुदेव ये निश्चय जानिये ।
सकल विकल सब छोड़ि गुरुही मानिये ॥
गुरुही के परसाद मिलैं नारायणा ।
जन्म मरण बँध छूटि होय पारायणा ॥
समरथ श्री गुरुदेव शीशपर राखिये ।
भवसागर की व्याधि सकलही नाखिये ॥
कहैं मुनी शुकदेव चरणहींदास को ।
वही जु पावै चौथे परमनिवास को ॥
दो० गुरु समान तिहुँलोक में, और न दीखै कोय ।
नाम लिये पातक नशैं, ध्यान किये हरिहोय ॥