भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 332, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंयों हरिलीला जानिय कौतुक सो करै ॥
वसुधाको उपजाय करै पालन जभी ।
फिरि सब लेय मिलाय आप माहीं तभी ॥
जैसे मकरी तारसों जाल बनाइया ।
फिरि आपन वा बीचमें सहज समाइया ॥
जब चाहै वह जाल उदरमें लै धरै ।
मच्छी जाल में फँसै सो नहीं ऊबरै ॥
भाषैं दत्तात्रेय मुक्ति जो चाहिये ।
हरि उतपति क्षय करन शरनमें आइये ॥
जन्म मरण भयमानि भक्ति में पागिये ।
जगके जालसों छूटि वेगिही भागिये ॥
लीजै त्यागि वैराग चरणहीं दास हो ।
हरियश हरिगुण गाय तजो जग वासहो ॥
दो० भृङ्गी मिलि भृङ्गी भवै, सुनो हतो यह बैन ।
अब मन आई सांचही, देखा अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
चौबिसवों गुरु कियो जु भृङ्गी जानिकै ।
वासों निश्चय भई हिये में आनिकै ॥
सुनीहती यह बात जु कोई हरिभजै ।
निशिदिन मन ह्वां लायकै प्रभुसेवा सजै ॥
सो नारायणरूप आप ह्वै जात है ।
यामें संशय नाहिं सांच यह बात है ॥
मन ठहरत ना हुती ये बात सुहावनी ।
सेवक जो कोइ होय सो क्यों होवै धनी ॥
भृङ्गी को हम लखो कीट इक आनिकै ।