भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८६
कन्याकरिकै शोच ये वचन उचारिया ।
मात पिता गये कहीं अभी पगधारिया ॥
आवो बैठौ खाट रसोई खाइये ।
भोजन होत सवार कहों नहिं जाइये ॥
वाके गृह कछु नाहिं धान थोरे हुते ।
कूटनलागीं ताहि सोई अपने मते ॥
चूरी हाथके माहिं बहुत खरकन लगीं ।
फिरि समझि मनमाहिं शोचमाहीं पगीं ॥
यों समझैं ये लोग कछू गृहमें नहीं ।
भोजन कारन धानजु कूटति है तहीं ॥
चूरीडारी फोरि दोय तहँ राखिया ।
तऊ न खरको गयो शब्दही भाषिया ॥
दूजी दइ बिगसाय एकही रहगई ।
तब खरका नहिं होय कुटत निर्भय भई ॥
वादिन कन्या गुरू जु हमने चितधरा ।
साधु अकेलों रहै सदा आनँद भरा ॥
धर्मशाला ते निकसि शिष्य को साथलै ।
कबहुँ उपजै क्रोध शिष्य भाषै यहै ॥
आपनहीं लियो बहुत हमें थोरो दियो ।
गुरूको चहिये टहल शिष्य रूठै गयो ॥
गुरू कहै कछु और शिष्य औरै कहै ।
झगड़ै आपस माहिं प्रीति थिर ना रहै ॥
दोउमें कलकल होय शान्ति नहिं आवई ।
विना अकेलेरहे चैन नहिं पावई ॥
पशु पक्षी नर नारि संग नहिं लीजिये ।