भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 331, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
तनकी सुधि बिसराय कछू सुधि ना रहे ।
या विधिसे जो करै ध्यान ताको कहै ॥
हलचल ध्यान जो करै सो हरिसों ना मिलै ।
अफल ध्यान सोइहोय जो मनक्षणक्षणचलै ॥
तीर बनावनहार गुरू हमने कियो ।
ताते यह उपदेश हिये माहीं लियो ॥
ऐसे मन को साधि प्रभू चरणन धरै ।
ह्वांहीं रहै चितलाय जु इतउत ना फिरै ॥
बाइसवों गुरु सांप हमारो जानिये ।
ताते लीन्ही सीख यही पहिचानिये ॥
सदा अकेलो रहै कबौं घर ना करै ।
रैनि जहाँ कहुँ होय वहीं वह बसि रहै ॥
वाकी देखी रहनि जु मनमें लाइया ।
सदारहूँ निर्बंध न मन्दिर छाइया ॥
उपजो मोह न लोभ लगे नहिं दाग है ।
चरणहिंदासा भयो द्वेष नहिं राग है ॥
दो० बँधा जु पानी गांदला, चलता निर्मल होय ।
दोनों रीति विचारिकै, भलो होय सो लोय ॥
तेइसवों मकरी गुरू, उगलि तार भखि जाय ।
ऐसे जग परकाश करि, प्रभुले आप लुकाय ॥
अष्टपदी ॥
तेइसवों गुरु जान हमारो माकरी ।
आप सों काढै तार रहै वामो खरी ॥
फिरि वह तार समेटि लेय उरमें धरै ।