भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दूजेही को साथ सभी तजि दीजिये ॥
छूटैं सकल कलेश ध्यानलागै भलो ।
चरणहिं दासा होय रहै हरिसों मिलो ॥
दो० गुरु कीन्हो इक्कीसवों, ताहि तीरगर जान ।
चरणदास यों कहतहैं, वासों सीखो ध्यान ॥
अष्टपदी ॥
पुनि इक्कीसवों गुरू तीरगर हमकियो ।
ताते ध्यानको भेद सीखि हिय में लियो ॥
इकदिन नगरीमाहिं तीरगर हाट में ।
ठाढ़भयो तहँजाय चलतही वाट में ॥
वह तौ बनावत तीर अपनी जानमें ।
और कछू सुधि नाहिं पगो वा ध्यानमें ॥
वाके आगे होय भूप इक आइया ।
हस्ती अरु दल साज निशान बजाइया ॥
भयो मुहूरत एक मनुष तहँ आइकै ।
भूप गयो इस राह बुझो जु सुनायकै ॥
वह तौ साजत तीर यही उत्तर दियो ।
हम तौ जानत नाहिं नहीं दरशन कियो ॥
भाषत दत्तात्रेय जु हम वासों कह्यो ।
राजा सँग बहु भीर शब्द दुन्दुभि भयो ॥
बहुत कटक लिये साथ जु भूप सिधारिया ।
तैं काहे नहिं सुनो न दृष्टि निहारिया ॥
उन यों उत्तर, दियो तीरके ध्यानहीं ।
सुरतिरही तेहि माहिं याते नहिं जानहीं ॥