भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६१
वाको कीन्हो गुरू हियेमें धारिकै ।
मन हरिचरणन पास रखूं निर्धारिकै ॥
दृष्टि मना अरु बुद्धि जहां जु लगाइया ।
ऐसो कहिये ध्यान विरल कहूँ पाइया ॥
दो० ध्यान करै दृग मूंदि करि, जो कोई नर नार ।
खटका सुनि पलकैं खुलैं, मन चल वारंवार ॥
अष्टपदी ॥
वह नहिं कहियत ध्यान जु खुलि खुलि जात है ।
निश्चल लागै ध्यानजु पूरी बात है ॥
ध्याता ध्यान के बीच ध्यान ध्येय माहिं है ।
तीनौ एकहि होहिं विघ्न कछु नाहिं है ॥
मन हरिचरणन पास कायाकी सुधि नहीं ।
भूखप्यास कछु नाहिं ध्यान लागत तहीं ॥
मन गयो औरै ठावैँ ध्यान जो लाइये ।
सो वह डिगि डिगि जाय न थिरता पाइये ॥
जब नारायण साथ मगन मन है-गयो ।
सबकारज गयो भूलि कछू सुधि ना रह्यो ॥
जैसे भाषत लोय समाधी पुरुष को ।
दिन बीतैं दश बीस नहीं सुधि बुधि कहूँ ॥
कहिये यही समाधि वासना सब जरैं ।
कोटिन मध्ये एक ध्यान एसो धरैं ॥
सोई चरणको दास सोई योगीश है ।
सोइ साधक सोइ सिद्ध जु विस्वेबीस है ॥
दो० ध्यानी ध्यान लगायकै, रहै राम लवलाय ।
आपा बिसरै हरिमिलैं, बहुरि न उपज आय ॥