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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

२५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सो खर कूकर शूकरा, अरु जंगल कारोझ ॥
पेट भरे भर सोइया, ते नर पशू समान ।
परनारी कै आपनी, तिनका नाहीं ज्ञान ॥
जैसा तैसा खाय करि, पेट भरे भरि लेह ।
पड़कर सोवै भोरलों, सो शूकर की देह ॥
हरिचरचा बिन जो बकै, सो कूकर की भूस ।
कहिरणजीत वह साँझलों, खाय धूसही धूंस ॥
जो पावै सोई चरै, करै नहीं पहिंचान ।
पीठ लदै हरि ना जपै, ताकूं खरही जान ॥
रोझ जान वा देहकूं, ताकूं नहिं विचार ।
फिरै विना मर्यादही, बहुता करै अहार ॥
बहुता किये अहारही, मैली रहै जु बुद्धि ।
हरि के निर्मल नामकी, कैसे आवै शुद्धि ॥
सूक्ष्म भोजन खाइये, रहिये ना परि सोय ।
ऐसी मानुष देह कूं, भक्ति विनामत खोय ॥
जन्म चलोही जात है, ज्यों कवे सैलाव ।
दौरत मृगकी छाँह को, नेक नहीं ठहराव ॥
समझ शिताबी भक्तिले, नेक न ढील लगाव ।
आपा हरिकूं दे चुको, याकों यही उपाव ॥
जगका कहा न मानिये, सतगुरु सों लै बुद्धि ।
ताकूँ हिय में राखिये, करो शिताबी शुद्धि ॥
गुरु सेती सतगुरु बड़े, परमेश्वर के रूप ।
मुक्ति छाँह पहुंचाय दें, जक्त छुटावैं धूप ॥

भक्तिपदार्थवर्णन । २५३
कुण्डलिया
पहिला गुरु दाई कहूँ दूजे माई जान ।
तीजा गुरू खिलावड़ी चौथा पिता पिछान ॥
चौथा पिता पिछान पाँचवें पाधा जानौ ।
कनफूका गुरु छठा तास पूजा दे मानौ ॥
सतवां सतगुरु जानिये जगसूं करें उदास ।
मुक्तिधाम सोइ देतहैं कहैं चरणहींदास ॥
दो० गुरु मिलते ऐसे कहै, कछू लाय मोहिं देह ।
सतगुरु मिल ऐसे कहै, नाम धनी कालेह ॥
कनफूका गुरु जगतका, राम मिलावन और ।
सो सतगुरु को जोनिये, मुक्तिदिखावन ठौर ॥
गलियारे गुरु फिरतहैं, घर घर कंठी देत ।
और काज उनकूं नहीं, द्रव्य कमावन हेत ॥
सतगुरु डंका देत हैं, भक्ति रामकी लेहु ।
पहिले हमकूं भेंटही, शीश आपनो देहु ॥
सो सतगुरु शुकदेव हैं, समझि हिये में राखि ।
तिनके शरणै आवमन, चरणदास कहैं भाखि ॥
यह सिगरो उपदेशही, मैं आपन कूं कीन ।
मो मन कूं आपाघना, कहीं होय आधीन ॥
सतगुरुसूं मांगौं यही, मोहिं गरीबी देहु ।
दूर बड़प्पन कीजिये, नान्हाहीं करिलेहु ॥
जनक परम गुरुदेवजी, सुनु सतगुरु शुकदेव ।
यही अर्ज मैं करतहूँ, मोहिं साधु करिलेव ॥
चारौयुग के भक्तजन, तुमहौ सुख के धाम ।

२५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणहिं दासा होयकै, तुम्हें करूं परणाम ॥
आदि पुरुष किरपा करौ, सबअवगुण छुटिजाहिं ।
साधहोन लक्षण मिलैं, चरणकमलकी छाहिं ॥
तुम्हरी शक्ति अपार है, लीला को नहिं अंत ।
चरणदास यों कहत हैं, ऐसे तुम भगवंत ॥
छप्पै ॥
रच्यो आप में जगत रूप नारायण कीन्हो ।
दूजे लक्ष्मी भई बहुरि पानी रँग भीन्हो ॥
नाभि कमल फिरि भयो जहां ब्रह्माजी उपजे ।
विधिकी त्रिकुटि माहिं तहां शंकरजी निपजे ॥
चारि वेदअरु विष्णुहै सकल जगत छिनमें कियो ।
निराकार आकार सों चरणदासजिहिमनदियो ॥
कवित्त ॥
वहीतौ अडिग्ग राम चौथे पदवास जाको वही तौ अडिग्ग
राम मथुरा में आयो है । वही तौ अडिग्ग राम योगी जाको
ध्यान धरैं वही तौ अडिग्ग राम सीतापति पायो है ॥ वही तौ
अडिग्ग राम सभी ठाम रमि रह्यो वही तौ अडिग्ग राम संतन
सहायो है । वही तौ अडिग्ग राम चरणदास चेरो जाको वही
तौ अडिग्ग राम काया खोजि पायो है ॥
माया भ्रम फंद देख साधनको संगपेख रामजूको पहिरि भेख
कंचन तनतावरे । मनकूं पहिंचान ज्ञान एकाएकी सबै जान
नादके गहेते तू अनाहद बजावरे ॥ उलटि पलटि काया बीच
चारो कर दूर नीच ऐसी विधि मेरुपै समीर कूं चढ़ावरे । कहैं
चरणदासा गगनमध्य करौ वासा जहां नहीं शीत उष्ण निर-
' : पद धावरे ॥

भक्तिपदार्थवर्णन । २५५
दो० दुर्योधन रावण गये, अरु यादव परिवार ।
चरणदास थिरको नहीं, होय मिटै संसार ॥
कवित्त ॥
भोरसो बिहानो जात ढरैगी दुपहरीसी समझिकै विचारि
देखि चली आवे रातहै । अचैतहै शुचा१न काल तेरेपर तकिरहो
छिन पलकी खबर नाहिंकैरै आय घातहै ॥ दारासुत सम्पति
सब सुपने को सुख भयो जानौगे जभी जब छूटिजाय गातहै ।
कहैं चरणदास अब तजै क्यों न विषय वास पानीहूं में नाव
जैसे आयु चलीजातहै ॥
कुमारगसूं भाज और लाज खोटे करमन सूं चौरासी के
त्रासनसूं मूढ़ क्यों न लजरे । साधुन के संग बैठी धर्महूकी
नाव लेटि गुरूहूको ज्ञान राखि प्रेम भक्ति सजरे ॥ छूटै जब
नारी यम देवैं दुखभारी डारैं नरकहू मँझारी आवागमन क्यों
न तजरे । कहैं चरणदास अब तजै क्यों न विषय वास रामके
सँवारे तू राम राम भजरे ॥
सवैया ॥
भूलिरहो जगमें जड़ता वश दारा सुता सुत प्रीति बढ़ावै ।
इनसूं मन बांटिरहो गृहबीच सो अन्तसमै कोइ पास न जावै ॥
आनि गहै यमराज जबै सबही मिलि प्रीतम राम बतावै ।
चरणदास कहैं चेतो नर मूरख रामबिना कोइ काम न आवै ॥
कवित्त ॥
धावै भरम देवनकूं भीतनके लेवन कूं कोई संग साथी नाहिं
भीरपरे तेराहै। परसताहै चंडकी भूत अरु शीतला कूं भजै क्यों
न रामनाम कटै यमबेराहै ॥ भैरों अरु वराही पाखंड पूजा
१ बाज ॥

२५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सभी करैं लगीहै बहीर किन्हूं नैनन न हेराहै । चरणदास कूर
सब सन्तनको चेरो कहै ऐसो जग अन्धा जानि कर्मनने घेराहै ॥
दो० यंतर टोना मूड़हलावन, और कीमियाँ झूठ ।
चरणदास कहैंसव भगल है, यह जग लीन्हा लूट ॥
कवित्त ॥
भूतनकूं सेवै सो भूतनमें जाय मिलै जादुको सेवै सो चमार
ताकी माईसूं । देवतोंकूं सेवै तौ देवलोक वास लहै औषधी कूं
सेवै तौ मिलाप रावराईसूं ॥ कीमियां कूं सेवै तौ खराब होय
दुनियां में ऐसे धन खोवै जो सुनावै नहिं भाईसूं । कहैं चरण-
दास हम इतने कूं मानैं नाहिं देखि सबी छांड़ि मन लगो है
कन्हाई सूं ॥
कुण्डलिया ॥
पारा मारा ना मरै गंधक होय न तेल ।
केते पचिपचि मरि गये शिरमें मिट्टी मेल ॥
शिरमें मिट्टीमेल भटककरि जन्म सिरायो ।
जड़ी बूटि कूं फिरे कहीं कुछ हाथ न आयो ॥
बौरै हरि क्यों न भजै काहेको जन्म गवायो ।
चरणदास कीमियां झूठी मोको गुरूशुकदेव सुनायो ॥
अरिल्ल ॥
सात पांचकी सेव तजो लगि एकसूं ।
साधनकी करि सेव मुड़ोमत भेषसूं ॥
भेषी माहिं अलेख यही तू जानियो ।
चरणदासकी सीख निहचै करि मानियो ॥
दो० आप भजन करैं नहीं, औरे मने करैं ।
चरणदास कहैं वे दुष्टनर, भर्म भर्म नरकै परैं ॥

भक्तिपदार्थवर्णन । २५७
औरनकूं उपदेश करि, भजन करैं निहकाम ।
चरणदास कहैं वे साधुजन, पहुँचैं हरि के धाम ॥
शून्य शहर हम बसतहैं, अनहद है कुलदेव ।
अजपा गोत विचारिले, चरणदास यहि भेव ॥
भक्तिपदारथ उदयसूं, होय सभी कल्याण ।
पढ़ै सुनै सेवन करैं, पावै पद निरबाण ॥
भक्तिपदारथ में कही, कछु इक भेद बखान ।
जौं कोइ समझै प्रीतिसूं, छूटै यमदुख सान ॥
पाठ करै मन में धरै, बहुरूं करै विचार ।
कहैं गुरू शुकदेवजी, उतरै भवजल पार ॥
जय जय श्रीशुकदेवजी, तुम्हें करूं परणाम ।
तुम प्रसाद पोथी कही, भये जो पूरणकाम ॥
हिरदय में शीतल हुये, तपन गई सब दूर ।
या वाणी के कहेते, कायर मन भयो शूर ॥
चन्दन चरचै पुहुपधरि, बहुरि करै परणाम ।
कथावांचि सबही सुनी, कहा पुरुष कहा बाम ॥
कहै सुनै जो प्रेमसूं, वाकूं राखै याद ।
चरणदास यों कहतहैं, बनिहौ पूरे साध ॥
इति श्रीचरणदासजीकृतभक्तिपदार्थसंपूर्णम् ८ ॥

अथ मनविरक्तकरणगुटकासार
प्रारम्भः ॥
दो० नमो नमो श्रीव्यासजी, सतगुरु परमदयाल ।
ध्यान किये आशा नशै, लगै न जगत बयाल ॥
अष्टपदी ॥
नमो नमो शुकदेव तुम्हें परणाम है।
तुमकिरपासों आय मिलैं घनश्याम है॥
तुम्हरी दयासों होय जु पूरण योग है।
तनकी व्याधा छुटै मिटै मन रोगहै॥
तुव किरपासों ज्ञान पदारथ पावई।
उपजै सार विचार असार छुटावई॥
तुम्हरी दयासों होय भक्ति निसभोरहै।
हिये सरोवर उठत जु प्रेम हिलोरहै॥
तुम किरपा वैराग दूरलगि आवई।
सकल वासना छूटि परमपद पावई॥
सब गुणदायक लायक परमदयालहौ।
मम हिरदय में आय भेद सबही कहौ॥
मोंसे कछु नहिं होय जु मेरे नाथजू।
नितहि रहै तुव हाथ जु मेरे माथजू॥
अरजकरै रणजीत सुनो गुरुदेवजी।
मोमुख सेती भाषि कहौ सब भेवजी॥

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २५६
दो० एकादश भागवत में, जाकी यह मति जान ।
दत्तात्रेयी ने कह्यो, राजा यदु सों ज्ञान ॥
अब मैं भाषा कहतहौं, तुम्हीं करौ सहाय ।
ज्योंकी त्यों मुखसे निकसि, पूरी ही ह्वै जाय ॥
सुनियो ज्ञानी सन्तजन, रहन गहन की चाल ।
जो कोई लै हिरदय धरै, होवैं तुरत निहाल ॥
चरणदासहौं कहतहौं, परमारथ के काज ।
जो अँग श्रीभागवतमें, साधु होन के साज ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सों, कहूँ विचार विवेक ।
दत्तात्रेयी ने किये, चौबीसौ गुरु देख ॥
कुण्डलिया ॥
एक दिना यदु भूपही खेलन गये शिकार ।
तहाँ नगर के निकट जो ह्वां थी अधिक उजार ॥
ह्वां थी अधिक उजार एक अवधूता लेटे ।
मूरति पुष्ट प्रसन्न जक्तके भय सबमेटे ॥
राजा देखि प्रणाम करि पूछा शीश नवाय ।
पाये आनँद कहो तुम मोसे कहौ सुनाय ॥
दो० बोले दत्तात्रेय जब, सुनु हो भूप विशाल ।
चौबिस परिक्षा गुरु किये, तासों भये निहाल ॥
कुण्डलिया
पृथ्वी पवन आकाशहै नीर अग्नि शशिभान ।
कपोत गुरू अजगर लखो और सिन्धुको जान ॥
और सिन्धुको जान पतंगा भँवरा कहिये ।

२६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माखी हाथी मृगा मीन अरु पिंगला लहिये ॥
चील्ह बाल कन्या कहूं तीर बनावनहार ।
सांप माकरी भृंग जो चौबीसौं उरधार ॥
दो० भिन्न भिन्न अब कहतहों, जुदो जुदो विस्तारि ।
ताको सुनि करि चेतियो, चरणदास नरनारि ॥
अष्टपदी ॥
दत्तात्रेय कि बात सकल अब गायहौं ।
बीसचारि गुरु किये ताहि समुझायहौं ॥
जिसकारण जिसहेतु जु उन ऐसी करी ।
जो जो शिक्षालई समझ हिरदयधरी ॥
जासों भजै मन रोग जक्त ब्याधानसी ।
उपजि परम संतोष क्षमा हिय आ बसी ॥
परम भये आनंद परमपद पाइया ।
जीवन्मुक्ता होय कि चाह उठाइया ॥
सोइ कहूं अब साध सबै सुनि लीजिये ।
शुकदेव परीक्षित सों कहो सांच पतीजिये ॥
दत्तात्रेय अवतार श्री भगवान के ।
राजा यदुसों बोलि वचन भाषत भये ॥
हमने गुरू चौबीस करे संसार में ।
तिनको ज्ञान विचार कहूं निरधारमें ॥
पहिले गुरुकी शरणगही बहुप्रीति सों ।
उन दीनो उपदेश मंत्र जौ रीतिसों ॥
दो० सतगुरु ने किरपा करी, धरो हाथ मम शीश ।
यही कही सुमिरण करो, ध्यान करो जगदीश ॥

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६१
अष्टपदी ॥
काया छीजत देखि यही मनमें धरो ।
बिरथा खोवत आयु नेम तप को करो ॥
गहि विरक्तकी रीति तभी गृहको तजो ।
रामभक्ति को चाव हमारे मन रचो ॥
जगसों रहो उदास वास हरिपद जहां ।
छुटि छुटि जावै ध्यान न मन लागे जहां ॥
बालक गारी देइ कोई बेलानहीं ।
शिरपै डारै खेह सोई बेकाजहीं ॥
हँसि हँसि ताली पीट जु हमरे सँगलगेँ ।
मैंहूं चलो उठाय तौ वे आगे भगेँ ॥
ताते निशिदिन क्रोध आपने मनधरूं ।
हरि सुमिरण गो भूलि जक्तमें यों फिरूं ॥
अब शिक्षा गुरु किये चौबीसौ भेदही ।
सो अब वर्णन करूं छुटै सब खेदही ॥
तिनसों सीखी चाल सभी उरमें धरी ।
चरणहिं दासा होय सुरति आनँद भरी ॥
दो० पहिले गुरु पृथ्वी किया, तीन सीख लइ तास ।
गिरिवर तरुवर मही जो, भयो चरण की दास ॥
अष्टपदी ॥
पहिले पृथ्वी गुरू हमारो जानिये ।
ताते लइ मति तीन साच हिय आनिये ॥
पहिले पर्वत एक मही ऊपर लखा ।
जाके निकटै जाय जु चढ़ि बैठा शिखा ॥

२६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोइ ऊपर चढ़ि जाय कोई आवै तले ।
जल बरषै ना बहै पवन सों ना हिलै ॥
वा पर्वतकी सीख बुद्धि में मानियां ।
देह लोभ दियो त्याग जुथिरता आनियां ॥
क्रोध दियो बिसराय जो तामस डारई ।
कोउ कहौ दुर्वचन कोउ क्यों न मारई ॥
क्रोध लोभ जो होय करै मन भंग है ।
कैसे सुमिरण होय लगे हरिरंग है ॥
क्रोध लोभ छुटिजाय रहन ये अगाध है ।
पर्वत की सम होय जो निश्चल साधहै ।
वृक्ष कहूँ अब जान जासु मति पाइया ॥
कहै चरणको दास जो चित्त लगाइया ।
दो० तरुवर ने काया धरी, परमारथ के हेत ।
कोऊ बैठे छाहँ में, कोऊ कारज लेत ॥
अष्टपदी ॥
दूजे देखे वृक्ष धरणि ऊपर भले ।
उनहूँकी लइ सीख गयो उनके तले ॥
मननहुती यह बात जु परकारज करूं ।
या प्राणी के काज नहीं करतो फिरूं ॥
जब आई यह रीति वृक्षकी दृष्टिमें ।
मैं लीन्हीं सोइ धारि भलीविधि सृष्टिमें ॥
कोई बैठे छाहँ कोई डारी हनै ।
कोई ले फल फूल वृक्ष कछु ना भनै ॥
परमारथ के काज वृक्षदेही धरी ।

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६३
सकल जीव ब्योसाय यही मनसा करी ॥
जो विरक्तसों काज कोई अपनो कहै।
वाको नाटै नाहिं सभी शिर पर सहै ॥
काहुको कछु काज जो काया सों सरै ।
यह शिक्षा भलिभांति वृक्षकी मनधरै ॥
तीजे शिक्षा और मही की धारिया ।
चरणहिंदासा होय अहूँ को मारिया ॥
दो० कोई खोदै नीवको, कोई खोदै कूप ।
अरु ऐसे कारज किये, ऐसो धरो स्वरूप ॥
अष्टपदी ॥
काहूको वह भलो बुरोहू ना कहै ।
ऐसे विरकत रहै सभी दुख सुख सहै ॥
हरि सुमिरण में मगन सदा आनँद रहै ।
भलो बुरो नहिं मान एकता दृढ़ गहै ॥
दूजे गुरु किंयो पवन सीख लह जासुकी ।
दोय भांति पहिंचान हिये धरि तासुकी ॥
इक दिन बाग के माहिं सहजही मैं गयो
देखन लाग्यों फूल जाय ठाढ़ो भयो ॥
पुष्पन सों लगि पवन वास मोहिं आइया ।
जबहीं कीन्हों ज्ञान बात सब पाइया ॥
वह तौ अतिहि सुगन्ध हरष उपजावई ।
फिर आई दुर्गन्ध बहुत अनखावई ॥
गन्धहि सों लगि पवन आप गन्धहि भई ।
पुनि आई बिन गन्ध शुद्ध निर्मल वही ॥
३९

२६४ ' श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वाको देखि स्वभाव यही मन आइया ।
चरणहिं दासा होय अंग उपजाइया ॥
दो० 'एक दिना इच्छा करी, भिक्षा मांगी जाय ।
अपनी श्रद्धा उन दियो, भोजन करमें लाय ॥
अष्टपदी ॥
वाकी अस्तुति नाहिं कछू मुखते कही ।
फिरि गयो दूजे द्वार दई भिक्षा नहीं ॥
जाकी निंदा नाहिं कछूक उचारिया ।
अस्तुति निन्दा त्याग यही जु विचारिया ॥
जिन कछु दीन्हो नाहिं नहीं औगुण धरो ।
जो कछु पहिले आयो सोई भोजन करो ॥
जो कहु अपने काज गयो भलि ठांवहीं ।
गिरहण कीन्हो नाहिं रंग नहिं लावहीं ॥
जो गयो भोंड़ी ठौर बुरो नहिं जानियां ।
आतमरूप सँभाल जहाँ मन आनियां ॥
सबही सों निर्लेप सबन के माहिंहूं ।
सहज भवन में आय सहज कहि जाहिंहूं ॥
परालब्ध जो पाय ताहि भोजन कियो ।
नातौ करि प्रणाम बैठि योंही रह्यो ॥
जिद्धालौहीं जान स्वाद भोजन सभी ।
इकसम सबही होयँ उदर जावैं जभी ॥
अब आयो सन्तोष कल्पना सब गई ।
चरणहिंदासा भयो जभी यह मति लई ॥

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६५
दो० तीजे गुरु आकाश को, कीन्हो समझ सँभार ।
जाकी मति के लेतही, पायो ब्रह्म विचार ॥
अष्टपदी ॥
तामें बरसै मेह और आंधी चलै ।
बिजली चमक वामाहिं और पावक जलै ॥
सदा रहै निर्लेप और निर्मल रहै ।
सबही जग वामाहिं आप निर्लम्भ है ॥
पवन हलावै नाहिं अग्नि जारै नहीं ।
ताहि न भिजवै नीर मरै मारै नहीं ॥
लघुदीरघ नहिं होय पुरुष नहिं नार है ।
नहिं सूक्ष्म नहिं भार वार नहिं पार है ॥
शब्द उठै बहु भांति वही जो अबोल है ।
उतपति परलय माहिं सदा जो अडोल है ॥
यह नभ ब्रह्मसमान लखो दृष्टान्त है ।
निरखि हिये की आंखि गयो सब भ्रान्त है ॥
भाँड़े कनक के होहिं चाँदी के देखिया ।
कांसी पितल के होयँ मट्टी के पेखिया ॥
सब माहीं आकाश एकही जानिया ।
यों घट घट में ब्रह्म सकल पहिंचानिया ॥
थिर चरही के माहिं जु थावर जंगमें ।
न्यारा अरु सब बीच भली विधि रंगमें ॥
जो बर्तन गयो फूटि रहो आकाशहूं ।
ऐसेहि काया बिनशि रहै नित ब्रह्मजू ॥
नित्य अनित्य विचार जभी निश्चय भई ।

२६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सदा गुप्तही रहै प्रगट किये होत है ।
ऐसे साधूभेद छिपावै जोत है ॥
षष्ठहु गुरु कियो चंद सदा इक समवहै ।
कला घटै अरु बढ़ै मावस लगना रहै ॥
पूनोको सब होहिं कला भरपूरही ।
चांदनि सब जगमाहिं विराजत नूरही ॥
शशिमण्डल इकभांति रहै नाहीं घटै ।
योंही आतम रूप चरणदासा रटै ॥
दो० उतपति परलय देहको, घटै बढ़ दुख होय ।
आतम इकरस जानिये, अविनाशी है सोय ॥
अष्टपदी ॥
ताते कियो विचार ये काया ना रहै ।
जन्म मरणही होय कलाके ज्योंयहै ॥
परमातम इकभांति सदाही जानिये ।
घटै बढ़ै वह नाहिं यों मनमें आनिये ॥
कायाछोटी होय बड़ी पुनि होत है ।
कवहूँ हो मनमगन कबौं रोवै वहै ॥
आतमहीं नित जानि जु कायामें रहै ।
वही सदा इकभांति कोई ज्ञानी लहै ॥
ताते श्रीभगवानको सबठां पेखिकै ।
मनमाहीं गहिराखि फिरतहूँ भेखिकै ॥
सतवें गुरुकिया सूर जु शिच्छा दोलई ।
आठमहीने किरणि नीर सोखतवही ॥

मनविरक्तकरणगुटकांसारवर्णन । २६६
चारमास वह आप फेरि बरषा करै ।
वा जलको कछु लोभ नहीं मनमें धरै ॥
ऐसे साधू होय जु कछु कोइ देतहै।
वाको आछी भांति सोई वह लेत है॥
मोह न कबहूँ करै जु कोई कछु चहै।
चरणहिंदासा जानि सोई यह गति लहै॥
दो० लेते कछु हरपै नहीं, देते दुख नहिं होय।
ऐसे निर्लोभी रहै, चरणदास है सोय ॥
अष्टपदी ॥
दूजे जो प्रतिबिम्ब सूर को देखिये ।
जल भांडौं के माहिं सबन अवरेखिये ॥
खोजिकै देखौ वाहि सूर तौ एकहै ।
घट घटमें प्रतिबिम्ब विचारि अनेकहै ॥
ना काहूसे वैर प्रीतिहू ना करै ।
सूरज एक निहारि सकल घट छवि धरै ॥
ऐसेही निर्मोह सदा निर्लेप है।
वाको साधूजान सो ऐसी विधिरहै ॥
अठवेंकियो कपोत गुरू मैं विचारिकै ।
निर्मोहित मन भयो तभी जु निहारिकै ॥
उठी एक मनमाहिं नारि सुत कीजिये ।
जगमें ह्वै निश्चिन्त बहुत सुख लीजिये ॥
सहज बागके माहिं जाय ठाढ़ो भयो ।
वृक्षपै एक कपोत कपोतिनि को लह्यो ॥
ता ऊपर उन गेह आपनो साजिया ।
बहुत प्रीति सुखमानि सकल दुख भाजिया ॥

२६६ ः श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पायो आतमज्ञान सभी दुबिधा गई ॥
ना काहू से वैर नहीं कहुँ प्रीति है ।
ना काहू दुख देहुं नहीं सुख रीति है ॥
काहूसे नहिं डरूं न काहू सँग लगूं ।
काहु कि शरण न जावँ न काहूसे भगूं ॥
कहैं श्रीशुकदेव विवेक विचार सों ।
दत्तात्रेयी कह्यो यथा यदुराज सों ॥
यह शिक्षा आकाशसों लीन्हीं जानिकै ।
चरणहिंदासा भयो यही मत मानिकै ॥
दो० चौथे गुरु कियो नीरहीं, जाको सुनिय प्रसंग ।
आप महा उज्ज्वल रहै, मिलिजावै सब रंग ॥
अष्टपदी ॥
जल ज्यों निर्मल होय सदा विरकत वही ।
तजै न शीतल अंग बसै नितही मही ॥
गृही संग जो चलै बाट कबहूं कहीं ।
मनसों न्यारा रहै लेह लागै नहीं ॥
ऐसो रखै विचार यथा बरषा समै ।
जल मैला है जाय खेह सँगही रमै ॥
संगति गुण सों होय जु गँदला आपही ।
जाड़े में है शुद्ध लगै नहिं पापहीं ॥
समझो यों चितमाहिं संगको गुण यहै ।
निर्म्मल नीर स्वभाव सदा उज्ज्वल रहै ॥
संसारी के संगसों जब मन फिरगयो ।
तब नारायण रूप ध्यान आनँद लयो ॥
कछू मैल, मनमाहिं कबहूँ व्यापै नहीं ।

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६७
जल अरु साधू भांति एक जानौ तहीं ॥
जो कुचील कछु होय सो जलसों धोइये ।
वाको कीजै शुद्ध मैल सब खोइये ॥
साधू ऐसा होय ज्ञान मुख उच्चरै ।
श्रोताके सब पाप ताप ब्याधा हरै ॥
तातेही उपदेश भक्तिका कीजिये ।
नीच ऊंच मतदेख वृक्ष ज्यों सींचिये ॥
मीठे शीतल नीरको यह गुण लीजिये ।
मीठा सबसों बोलि परमसुख दीजिये ॥
गुरु शुकदेव प्रतापसों जल गुण गाइया ।
चरणहिंदासा होय न मनता आइया ॥
दो० पंचमगुरुकियो अग्निको, समझ निहारि निहारि ।
उत्तम मध्यम जारदे, राखै कछुन विचारि ॥
अष्टपदी ॥
ब्राह्मणहूँ करै होम शूद्र जोपै करै ।
दोउपवित्र करि देइ दोऊ के अघ हरै ॥
ऐसे साधूलोग जहां भोजन करैं ।
वाको पावन करैं पाप सबही हरैं ॥
गृही जु सेवा करैं आश ऐसी धरै ।
विरकत भोजन किये पाप निश्चय जरै ॥
धान्य हमारी खाय जु साधूजन कभी ।
हमरे पाछतजाहिं और ब्याधा सभी ॥
साधूजन जो होय अग्नि के भांतिही ।
सकल पाप करै क्षार जु वाकी क्रांतिही ॥

२६८ ˙ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सदा गुप्तही रहै प्रगट किये होत है।
ऐसे साधूभेद छिपावै जोत है॥
षष्ठहु गुरु कियो चंद सदा इक समवहै।
कला घटै अरू बढ़ै मावस लगना रहै॥
पूनोको सब होहिं कला भरपूरही।
चांदनि सब जगमाहिं विराजत नूरहीं॥
शशिमण्डल इकभांति रहै नाहीं घटै।
योंही आतम रूप चरणदासा रटै॥
दो० उतपति परलय देहको, घटै बढ़ दुख होय।
आतम इकरस जानिये, अविनाशी है सोय॥
अष्टपदी॥
ताते कियो विचार ये काया ना रहै।
जन्म मरणही होय कलाके ज्योंयहै॥
परमातम इकभांति सदाही जानिये।
घटै बढ़ै वह नाहिं यों मनमें आनिये॥
कायाछोटी होय बड़ी पुनि होत है।
कबहूँ हो मनमगन कबौं रोवै वहै॥
आतमहीं नित जानि जु कायामें रहै।
वही सदा इकभांति कोई ज्ञानी लहै॥
ताते श्रीभगवानको सबठां पेखिकै।
मनमाहीं गहिराखि फिरतहूँ भेखिकै॥
सतवें गुरुकिया सूर जु शिक्षा दोलई।
आठमहीने किरणि नीर सोखतवही॥

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६६
चारमास वह आप फेरि बरषा करै ।
वा जलको कछु लोभ नहीं मनमें धरै ॥
ऐसे साधू होय जु कछु कोइ देतहै ।
वाको आछी भांति सोई वह लेत है ॥
मोह न कवहूँ करै जु कोई कछु चहै ।
चरणहिंदासा जानि सोई यह गति लहै ॥
दो० लेते कछु हरषै नहीं, देते दुख नहिं होय ।
ऐसे निलोभी रहै, चरणदास है सोय ॥
अष्टपदी ॥
दूजे जो प्रतिबिम्ब सूर को देखिये ।
जल भांडौं के माहिं सबन अवरेखिये ॥
खोजिकै देखौ वाहि सूर तौ एकहै ।
घट घटमें प्रतिबिम्ब विचारि अनेकहै ॥
ना काहूसे वैर प्रीतिहू ना करै ।
सूरज एक निहारि सकल घट छवि धरै ॥
ऐसेही निर्मोह सदा निर्लेप है ।
वाको साधूजान सो ऐसी विधिरहै ॥
अठवैंकियो कपोत गुरू मैं विचारिकै ।
निर्मोहित मन भयो तभी जु निहारिकै ॥
उठी एक मनमाहिं नारि सुत कीजिये ।
जगमें ह्वै निश्चिन्त बहुत सुख लीजिये ॥
सहज बागके माहिं जाय ठाढ़ो भयो ।
वृक्षपै एक कपोत कपोतिनि को लह्यो ॥
ता ऊपर उन गेह आपनो साजिया ।
बहुत प्रीति सुखमानि सकल दुख भाजिया ॥