भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
पृष्ठ 295, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 295
अथ मनविरक्तकरणगुटकासार
प्रारम्भः ॥
दो० नमो नमो श्रीव्यासजी, सतगुरु परमदयाल ।
ध्यान किये आशा नशै, लगै न जगत बयाल ॥
अष्टपदी ॥
नमो नमो शुकदेव तुम्हें परणाम है।
तुमकिरपासों आय मिलैं घनश्याम है॥
तुम्हरी दयासों होय जु पूरण योग है।
तनकी व्याधा छुटै मिटै मन रोगहै॥
तुव किरपासों ज्ञान पदारथ पावई।
उपजै सार विचार असार छुटावई॥
तुम्हरी दयासों होय भक्ति निसभोरहै।
हिये सरोवर उठत जु प्रेम हिलोरहै॥
तुम किरपा वैराग दूरलगि आवई।
सकल वासना छूटि परमपद पावई॥
सब गुणदायक लायक परमदयालहौ।
मम हिरदय में आय भेद सबही कहौ॥
मोंसे कछु नहिं होय जु मेरे नाथजू।
नितहि रहै तुव हाथ जु मेरे माथजू॥
अरजकरै रणजीत सुनो गुरुदेवजी।
मोमुख सेती भाषि कहौ सब भेवजी॥