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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 690 में से

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पृष्ठ 289

२५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सो खर कूकर शूकरा, अरु जंगल कारोझ ॥
पेट भरे भर सोइया, ते नर पशू समान ।
परनारी कै आपनी, तिनका नाहीं ज्ञान ॥
जैसा तैसा खाय करि, पेट भरे भरि लेह ।
पड़कर सोवै भोरलों, सो शूकर की देह ॥
हरिचरचा बिन जो बकै, सो कूकर की भूस ।
कहिरणजीत वह साँझलों, खाय धूसही धूंस ॥
जो पावै सोई चरै, करै नहीं पहिंचान ।
पीठ लदै हरि ना जपै, ताकूं खरही जान ॥
रोझ जान वा देहकूं, ताकूं नहिं विचार ।
फिरै विना मर्यादही, बहुता करै अहार ॥
बहुता किये अहारही, मैली रहै जु बुद्धि ।
हरि के निर्मल नामकी, कैसे आवै शुद्धि ॥
सूक्ष्म भोजन खाइये, रहिये ना परि सोय ।
ऐसी मानुष देह कूं, भक्ति विनामत खोय ॥
जन्म चलोही जात है, ज्यों कवे सैलाव ।
दौरत मृगकी छाँह को, नेक नहीं ठहराव ॥
समझ शिताबी भक्तिले, नेक न ढील लगाव ।
आपा हरिकूं दे चुको, याकों यही उपाव ॥
जगका कहा न मानिये, सतगुरु सों लै बुद्धि ।
ताकूँ हिय में राखिये, करो शिताबी शुद्धि ॥
गुरु सेती सतगुरु बड़े, परमेश्वर के रूप ।
मुक्ति छाँह पहुंचाय दें, जक्त छुटावैं धूप ॥