भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणहिं दासा होयकै, तुम्हें करूं परणाम ॥
आदि पुरुष किरपा करौ, सबअवगुण छुटिजाहिं ।
साधहोन लक्षण मिलैं, चरणकमलकी छाहिं ॥
तुम्हरी शक्ति अपार है, लीला को नहिं अंत ।
चरणदास यों कहत हैं, ऐसे तुम भगवंत ॥
छप्पै ॥
रच्यो आप में जगत रूप नारायण कीन्हो ।
दूजे लक्ष्मी भई बहुरि पानी रँग भीन्हो ॥
नाभि कमल फिरि भयो जहां ब्रह्माजी उपजे ।
विधिकी त्रिकुटि माहिं तहां शंकरजी निपजे ॥
चारि वेदअरु विष्णुहै सकल जगत छिनमें कियो ।
निराकार आकार सों चरणदासजिहिमनदियो ॥
कवित्त ॥
वहीतौ अडिग्ग राम चौथे पदवास जाको वही तौ अडिग्ग
राम मथुरा में आयो है । वही तौ अडिग्ग राम योगी जाको
ध्यान धरैं वही तौ अडिग्ग राम सीतापति पायो है ॥ वही तौ
अडिग्ग राम सभी ठाम रमि रह्यो वही तौ अडिग्ग राम संतन
सहायो है । वही तौ अडिग्ग राम चरणदास चेरो जाको वही
तौ अडिग्ग राम काया खोजि पायो है ॥
माया भ्रम फंद देख साधनको संगपेख रामजूको पहिरि भेख
कंचन तनतावरे । मनकूं पहिंचान ज्ञान एकाएकी सबै जान
नादके गहेते तू अनाहद बजावरे ॥ उलटि पलटि काया बीच
चारो कर दूर नीच ऐसी विधि मेरुपै समीर कूं चढ़ावरे । कहैं
चरणदासा गगनमध्य करौ वासा जहां नहीं शीत उष्ण निर-
' : पद धावरे ॥