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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 290

भक्तिपदार्थवर्णन । २५३
कुण्डलिया
पहिला गुरु दाई कहूँ दूजे माई जान ।
तीजा गुरू खिलावड़ी चौथा पिता पिछान ॥
चौथा पिता पिछान पाँचवें पाधा जानौ ।
कनफूका गुरु छठा तास पूजा दे मानौ ॥
सतवां सतगुरु जानिये जगसूं करें उदास ।
मुक्तिधाम सोइ देतहैं कहैं चरणहींदास ॥
दो० गुरु मिलते ऐसे कहै, कछू लाय मोहिं देह ।
सतगुरु मिल ऐसे कहै, नाम धनी कालेह ॥
कनफूका गुरु जगतका, राम मिलावन और ।
सो सतगुरु को जोनिये, मुक्तिदिखावन ठौर ॥
गलियारे गुरु फिरतहैं, घर घर कंठी देत ।
और काज उनकूं नहीं, द्रव्य कमावन हेत ॥
सतगुरु डंका देत हैं, भक्ति रामकी लेहु ।
पहिले हमकूं भेंटही, शीश आपनो देहु ॥
सो सतगुरु शुकदेव हैं, समझि हिये में राखि ।
तिनके शरणै आवमन, चरणदास कहैं भाखि ॥
यह सिगरो उपदेशही, मैं आपन कूं कीन ।
मो मन कूं आपाघना, कहीं होय आधीन ॥
सतगुरुसूं मांगौं यही, मोहिं गरीबी देहु ।
दूर बड़प्पन कीजिये, नान्हाहीं करिलेहु ॥
जनक परम गुरुदेवजी, सुनु सतगुरु शुकदेव ।
यही अर्ज मैं करतहूँ, मोहिं साधु करिलेव ॥
चारौयुग के भक्तजन, तुमहौ सुख के धाम ।