भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 293, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें२५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सभी करैं लगीहै बहीर किन्हूं नैनन न हेराहै । चरणदास कूर
सब सन्तनको चेरो कहै ऐसो जग अन्धा जानि कर्मनने घेराहै ॥
दो० यंतर टोना मूड़हलावन, और कीमियाँ झूठ ।
चरणदास कहैंसव भगल है, यह जग लीन्हा लूट ॥
कवित्त ॥
भूतनकूं सेवै सो भूतनमें जाय मिलै जादुको सेवै सो चमार
ताकी माईसूं । देवतोंकूं सेवै तौ देवलोक वास लहै औषधी कूं
सेवै तौ मिलाप रावराईसूं ॥ कीमियां कूं सेवै तौ खराब होय
दुनियां में ऐसे धन खोवै जो सुनावै नहिं भाईसूं । कहैं चरण-
दास हम इतने कूं मानैं नाहिं देखि सबी छांड़ि मन लगो है
कन्हाई सूं ॥
कुण्डलिया ॥
पारा मारा ना मरै गंधक होय न तेल ।
केते पचिपचि मरि गये शिरमें मिट्टी मेल ॥
शिरमें मिट्टीमेल भटककरि जन्म सिरायो ।
जड़ी बूटि कूं फिरे कहीं कुछ हाथ न आयो ॥
बौरै हरि क्यों न भजै काहेको जन्म गवायो ।
चरणदास कीमियां झूठी मोको गुरूशुकदेव सुनायो ॥
अरिल्ल ॥
सात पांचकी सेव तजो लगि एकसूं ।
साधनकी करि सेव मुड़ोमत भेषसूं ॥
भेषी माहिं अलेख यही तू जानियो ।
चरणदासकी सीख निहचै करि मानियो ॥
दो० आप भजन करैं नहीं, औरे मने करैं ।
चरणदास कहैं वे दुष्टनर, भर्म भर्म नरकै परैं ॥