भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २५५
दो० दुर्योधन रावण गये, अरु यादव परिवार ।
चरणदास थिरको नहीं, होय मिटै संसार ॥
कवित्त ॥
भोरसो बिहानो जात ढरैगी दुपहरीसी समझिकै विचारि
देखि चली आवे रातहै । अचैतहै शुचा१न काल तेरेपर तकिरहो
छिन पलकी खबर नाहिंकैरै आय घातहै ॥ दारासुत सम्पति
सब सुपने को सुख भयो जानौगे जभी जब छूटिजाय गातहै ।
कहैं चरणदास अब तजै क्यों न विषय वास पानीहूं में नाव
जैसे आयु चलीजातहै ॥
कुमारगसूं भाज और लाज खोटे करमन सूं चौरासी के
त्रासनसूं मूढ़ क्यों न लजरे । साधुन के संग बैठी धर्महूकी
नाव लेटि गुरूहूको ज्ञान राखि प्रेम भक्ति सजरे ॥ छूटै जब
नारी यम देवैं दुखभारी डारैं नरकहू मँझारी आवागमन क्यों
न तजरे । कहैं चरणदास अब तजै क्यों न विषय वास रामके
सँवारे तू राम राम भजरे ॥
सवैया ॥
भूलिरहो जगमें जड़ता वश दारा सुता सुत प्रीति बढ़ावै ।
इनसूं मन बांटिरहो गृहबीच सो अन्तसमै कोइ पास न जावै ॥
आनि गहै यमराज जबै सबही मिलि प्रीतम राम बतावै ।
चरणदास कहैं चेतो नर मूरख रामबिना कोइ काम न आवै ॥
कवित्त ॥
धावै भरम देवनकूं भीतनके लेवन कूं कोई संग साथी नाहिं
भीरपरे तेराहै। परसताहै चंडकी भूत अरु शीतला कूं भजै क्यों
न रामनाम कटै यमबेराहै ॥ भैरों अरु वराही पाखंड पूजा
१ बाज ॥