भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २५६
दो० एकादश भागवत में, जाकी यह मति जान ।
दत्तात्रेयी ने कह्यो, राजा यदु सों ज्ञान ॥
अब मैं भाषा कहतहौं, तुम्हीं करौ सहाय ।
ज्योंकी त्यों मुखसे निकसि, पूरी ही ह्वै जाय ॥
सुनियो ज्ञानी सन्तजन, रहन गहन की चाल ।
जो कोई लै हिरदय धरै, होवैं तुरत निहाल ॥
चरणदासहौं कहतहौं, परमारथ के काज ।
जो अँग श्रीभागवतमें, साधु होन के साज ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सों, कहूँ विचार विवेक ।
दत्तात्रेयी ने किये, चौबीसौ गुरु देख ॥
कुण्डलिया ॥
एक दिना यदु भूपही खेलन गये शिकार ।
तहाँ नगर के निकट जो ह्वां थी अधिक उजार ॥
ह्वां थी अधिक उजार एक अवधूता लेटे ।
मूरति पुष्ट प्रसन्न जक्तके भय सबमेटे ॥
राजा देखि प्रणाम करि पूछा शीश नवाय ।
पाये आनँद कहो तुम मोसे कहौ सुनाय ॥
दो० बोले दत्तात्रेय जब, सुनु हो भूप विशाल ।
चौबिस परिक्षा गुरु किये, तासों भये निहाल ॥
कुण्डलिया
पृथ्वी पवन आकाशहै नीर अग्नि शशिभान ।
कपोत गुरू अजगर लखो और सिन्धुको जान ॥
और सिन्धुको जान पतंगा भँवरा कहिये ।