भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २५७
औरनकूं उपदेश करि, भजन करैं निहकाम ।
चरणदास कहैं वे साधुजन, पहुँचैं हरि के धाम ॥
शून्य शहर हम बसतहैं, अनहद है कुलदेव ।
अजपा गोत विचारिले, चरणदास यहि भेव ॥
भक्तिपदारथ उदयसूं, होय सभी कल्याण ।
पढ़ै सुनै सेवन करैं, पावै पद निरबाण ॥
भक्तिपदारथ में कही, कछु इक भेद बखान ।
जौं कोइ समझै प्रीतिसूं, छूटै यमदुख सान ॥
पाठ करै मन में धरै, बहुरूं करै विचार ।
कहैं गुरू शुकदेवजी, उतरै भवजल पार ॥
जय जय श्रीशुकदेवजी, तुम्हें करूं परणाम ।
तुम प्रसाद पोथी कही, भये जो पूरणकाम ॥
हिरदय में शीतल हुये, तपन गई सब दूर ।
या वाणी के कहेते, कायर मन भयो शूर ॥
चन्दन चरचै पुहुपधरि, बहुरि करै परणाम ।
कथावांचि सबही सुनी, कहा पुरुष कहा बाम ॥
कहै सुनै जो प्रेमसूं, वाकूं राखै याद ।
चरणदास यों कहतहैं, बनिहौ पूरे साध ॥
इति श्रीचरणदासजीकृतभक्तिपदार्थसंपूर्णम् ८ ॥