भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निरखत छवि रस माधुरी, हर्ष न हृदय समाय ११०
लेत स्वल्पगति लाड़लो, बहुबिधि भाव बताय ।
नैन नचा लचकाय कटि, ताथेइया मुख गाय १११
अंग संग दै अधर रस, प्यावत प्रेम बढ़ाय ।
चरणदासि को श्यामघन, लेत भुजन भर धाय ११२
मुकट लटक मन को हरत, अलक रही बलखाय ।
छुटी कपोलन लाल के, चित को लेत चुराय ११३
मकराकृत कुंडल श्रवन, नाक बुलाक सुढार ।
मोती मटकत अधर पर, अजब सुराहीदार ११४
पाजामा कछनी ललित, पीत रंग मनहार ।
नख शिख लो भूषन सजे, गल फूलन के हार ११५
रंग रँगीली लाड़िली, मदन मनोहर लाल ।
नटवर गति ले ले नई, रस बस कीनी बाल ११६
श्री राधे रासेश्वरी, सखियन की सरदार ।
दरसायो चरनंदासि को, नित नवरास बिहार ११७
पुनि राजे दम्पति तबहि, सिंहासन पर जाय ।
चरणदासि को कर कृपा, लइनिज निकटबुलाय ११८
हँसि बोले श्री हरि बचन, करके प्रेम अपार ।
चरणदासि जा जक्त में, भक्ति करो विस्तार ११६
तबहि दासि दोउ जोर कर, आज्ञा सिर धर लीन ।
परिक्रमा करके बहुर, चरण प्रणाम सुकीन १२०
नैन मूंदि निज लीजिये, कही कृष्ण भगवान ।
दृग मूंदे तब दास ने, ताही समय पिछान १२१
पुनि आकाशबानी भई, चक्षु खोल चरनदास ।
दृग खोलतही आ गये, बंशीवट के पास १२२
संतरूप आपन लखो, श्याम चरन के दास ।
श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १६
बिछुरन दम्पति मन समझ, अतिशय भये उदास १२३
धरनि गिरे व्याकुल विरह, देह दशा विसराय ।
नैनन जल धारा बही, करत हाय हरि हाय १२४
इसी भांति बीतो दिवस, होय गई पुनि रैन ।
प्रगट भये शुकदेव मुनि, निजशिष्यको सुखदैन १२५
श्री सतगुरु नैनन निरखि, उठ करि चरण प्रणाम ।
व्याकुल हो बिलपन लगे, बिनश्रीश्यामाश्याम १२६
विनय करी कर जोर के, दम्पति दरस कराय ।
नाहीं तो तन त्यागि के, जीव निकस यहजाय १२७
श्री शुक मेस्तक शिष्य के, धरो कृपा कर हाथ ।
बंशीवट नीचे लखे, श्याम राधिका साथ १२८
गलबैंयां दीने युगल, नवल लाड़िली लाल ।
मंद मंद मुसकात मुख, रूप राशि छवि जाल १२६
श्री दम्पति के दरस कर, छके श्याम चरनदास ।
रोम रोम में प्रगट भयो, परमानंद हुलास १३०
शिष्य के मस्तक से तभी, मुनि लियो हाथ उठाय ।
दृष्टि परे दम्पति न तब, अचरजभयोअधिकाय १३१
श्री शुक मुनिचरनन परे, श्यामचरन के दास ।
धन्यवाद श्री गुरुन को, कीनो सहित हुलास १३२
पुनि गुरु शिष्य दोऊन में, ज्ञान गोष्टि सम्वाद ।
रह्यो रैन में रंग अति, उर उपजो आह्लाद १३३
प्रात होत शुक मुनि कही, सुनो श्याम चरनदास ।
दिल्ली जाके तुम करो, श्री हरि भक्ति प्रकास १३४
शिष्य करी तब दंडवत, श्री गुरुचरनों माहिं ।
शीश उठा देखन लगे, शुक मुनि दरसे नाहिं १३५
श्रीशुक मुनि धर ध्यानउर, श्यामचरन के दास ।
२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बृन्दाबन से गवन कर, दिल्ली कियो निवास १३६
रहन लगे आनन्द सों, कृष्ण ध्यान गलतान ।
नर नारिन उपदेश दे, भजन करें भगवान १३७
दूर देश रमत करन, जावें श्री महाराज ।
भक्ति प्रचारें जक्त में, परमारथ के काज १३८
रूप अनेकन धार के, भक्तन करी सहाय ।
जल थल देश बिदेश में, चरणदास प्रगटाय १३६
बैष्णव नागरिदास को, जगन्नाथ निज रूप ।
दरसायो करि के कृपा, सुंदर अधिक अनूप १४०
बैजनाथ विप्रने लखे, श्री महाराज सुजान ।
चरण प्रछाले गंगजल, शिष्य ह्वगए अस्थान १४१
बैष्णव परमानंद की, मनसा पूरन कीन ।
कृष्ण रूप निज है प्रभो, दर्श दयानिधि दीन १४२
जोग जीत गुरु छोन कों, दरसायो निज धाम ।
अमर लोक सँग ले गये, जहां श्री राधे-श्याम १४३
राम सखी सह वपु गई, श्याम सुँदर के संग ।
जा पहुँची निज धाम में, जहां रास रस रंग १४४
श्री मति कुंजो मात कों, दरस कराये श्याम ।
तन को तज के फिर गई, अमरलोक निजधाम १४५
बिबिचारी जय करन को, कियो कृतारथ जाय ।
अमर लोक में ले गये, दम्पति दरस कराय १४६
स्वर्ग प्रवाही गंगजल, सेवक दिये न्हवाय ।
जय जय श्रीमहाराज की, सकल उठे मुख गाय १४७
साधू परमानंद को, डसो सर्प ने आय ।
श्यामचरण के दास प्रभु, लीनो तुरत जिवाय १४८
दो कन्या पैदा हुई, सेवक के घर आन ।
श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । २१
निज प्रभुता सों पुत्र किए, चरणदास भगवान १४९
रक्षा कीनी बैल सों, शिष्य प्रेम गलतान ।
घोड़े से लीनो बचा, निरमलदास सुजान १५०
जमुना में न्हावत हुते, मुक्तानंद सु संत ।
ग्राह ग्रसे लीने छुड़ा, चरनहि दास तुरंत १५१
दूसर आतम राम को, दीने नर्क दिखाय ।
भय मानो यमदूत लखि, चरण शरणलइ आय १५२
बैठे जमुना नाव में, डूबन लागे संत ।
ध्यान धरो महाराज को, दिये उवार तुरंत १५३
छै महिने पहिले कह्यो, आवन नादिरशाह ।
परचय पा चरनन परे, शाह मुहम्मदशाह १५४
माना नादिरशाह ने, भक्त राज इर्शाद ।
मुरशद पीर पिछान के, कीना निज दिलशाद १५५
गिलचे आये क़तल को, कियो तरवार प्रहार ।
हाथ हुवे जड़ सबन के, तब मन मानी हार १५६
नौधा प्रेमा - पराको, निशिदिन बरसे रंग ।
सदा होइ हरिकीरतन, बाजत बीन मृदंग १५७
सेवक साधू सन्त सब, रहें ध्यान लवलीन ।
युगल लगन में मग्ननित, प्रेम सिंधु मन मीन १५८
भक्ति हरी को कर दियो, श्री महाराज प्रचार ।
भारत में करने लगे, प्रेम भक्ति नर नार १५९
सर्परूप श्री हरी ने, पार्षद दिया पठाय ।
आवो प्यारे धाम अब, दियो संकेत जनाय १६०
तब निज सन्तनको बुला, बोले श्री महाराज ।
हमजावें हरिधाम को, कर मन वांछित काज १६१
भक्ति भजन करते रहो, सुमरो श्री हरिनाम ।
२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हरि गुरु उर विश्वासरख, रहो सदा निष्काम १६२
तुम सब तन तजि आयहो, निश्चय मेरे धाम ।
प्रेम प्रीति कर प्यारसों, बोले गुरु गुण ग्राम १६३
श्री हरि आज्ञा सिरधरी, करी तयारी धाम ।
दशम द्वार निज पुरगये, जहाँ श्रीराधे श्याम १६४
-सम्बत अठारह सौ हुते, ऊपर उन्तालीस ।
देहत्याग चरनदास प्रभु, गये धाम जगदीस १६५
अस्सी बर्ष भूतल बिषे, राजे श्री महाराज ।
सरसमाधुरी भक्ति हरि, जक्त प्रचारन काज १६६
✱ श्रीमत्श्यामचरणदासाचार्यमहिमा ✱
चरणदास के चरण में, जो जन आये धाय ।
सूरज मण्डल बेधकर, बसे अमरपुर जाय १६७
भेजे श्यामा श्याम ने, करन जगत उद्धार ।
चरनदास ने कृपाकर, किये पतित भवपार १६८
चार पदारथ प्रेम सो, सबको कीने दान ।
चरणदास ने दयाकर, कियो जक्त कल्यान १६६
नवधा प्रेमा अरु परा, दियो भक्ति उपदेश ।
किये कृतारथ जीवजग, पार न पावत शेष १७०
ज्ञान दियो ज्ञानीन को, जोगिन को दियो जोग ।
भक्तनको दइ भक्ति हरि, मेटे भव दुख रोग १७१
ज्ञानी विज्ञानी बड़े, जोगिन के सिरताज ।
रसिका चारज मुकुटमणि, चरणदास महाराज १७२
दयावान दाता बड़े, परदुख भंजन हार ।
पतितन के पावन करन, चरणदास अवतार १७३
सब सद्गुण सम्पन्न हैं, सब लायक महाराज ।
श्रीमत्श्यामचरणदासाचार्यमहिमा । २३
सदा सहायक जनन के, मण्डन सन्त समाज १७४
लोक और परलोक के, सुखदायक सिरमौर ।
व्यापिरहै सब विश्व में, भीतर बाहर ठौर १७५
भक्तन के मन भावने, रसिकन के रिझवार ।
प्रेमिन के प्रभु प्राण प्रिय, चरणदास सरकार १७६
शिष्यन के संशय हरन, सेवक जन प्रतपाल ।
आश्रित जन रक्षा करन, श्री रणजीत दयाल १७७
प्रगट भये संसार में, दूर करन भुव भार ।
धर्म सनातन भागवत, चहूँ दिशिकरन प्रचार १७८
जिज्ञासू जन मुमुक्षु, चरण शरण लइ आय ।
चरणदास प्रभु कृपाकर, श्रीहरि दिये मिलाय १७६
सेवा में ठाड़ी सदा, अष्टसिद्धि नव निधि ।
चरणदास दाता बड़े, जग में भए प्रसिद्धि १८०
रंकन को राजा किये, दिये मुल्क अरु माल ।
चरणदास चरणन परे, सो सब हुवे निहाल १८१
भूत भविष्य वर्तमान के, त्रिकालज्ञ महाराज ।
चरणदास की दयासों, सुधरे सब के काज १८२
दै दै परचय विविधिविधि, कलिजिय किये सचेत ।
चरणदास विश्वास दे, प्रगटायो हरि हेत १८३
भगवत धर्म प्रचार हित, लियो अवनि अवतार ।
चरणदास तारण तरण, अधम उधारण हार १८४
चार धाम सातोंपुरी, तीरथ क्षेत्र सुठौर ।
चरणदास बहु रूपधर, रमें रसिक सिर मौर १८५
घर घर सेवा श्याम की, राग भोग रसखान ।
चरणदास की दया सो, भक्ति करी भगवान १८६
पुरुषोत्तम परमात्मा, अवतारी जगदीश ।
२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास दृढ़ उपासना, थापी बिश्वा बीश १८७
रसिक अनन्यन की रहनि, रस उपासना भाव ।
चरणदास सबही कहै, सुन उपजै चितचाव १८८
पापी अधम अनेक को, कियो जक्तसों पार ।
चरणदास सन्मुख हरी, पहुँचा ये कर प्यार १८६
बहु जीवनको वपु सहित, कृष्ण ले गये धाम ।
चरणदास की दया सों, मिलो महल बिश्राम १६०
बहुतन को संसार में, श्री हरि दिये मिलाय ।
चरणदास ने सबन की, बिगरी दई बनाय १६१
आचारज को रूप धर, जग में प्रगटे आय ।
चरणदास निज कृष्णहो, दरसन दिये कराय १६२
निर्धन जनको धन दियो, पुत्र हीन सन्तान ।
सबको मन वांछित कियो, चरणदास भगवान १६३
बंधन में जो जन परे, तिनको दिये छुड़ाय ।
मृतक जिवाये बहुत से, महिमा कही न जाय १६४
ज्ञान योग वैराग को, जग में कियो प्रचार ।
कीनो भगवत् धर्म को, चरणदास बिस्तार १६५
ग्रन्थ भक्तिसागर सरस, बानी पांच हजार ।
महाराज बरनन करी, प्रेम भक्ति भंडार- १६६
जोग ज्ञान वैराग को, वरनो विविधि प्रकार ।
अरु गायो निज धामको, अनुपम नित्य बिहार १६७
खंडन मंडन मतन को, कियो न श्री महाराज ।
गीता अरु भागवत मत, बिरचो धर्म जहाज १६८
जो बांचै नित नेमसों, बानी परम पुनीत ।
पावे परमानन्द सुख, धाम् जाय जग जीत १६६
सुन समझे दृढ़ उरधरे, करनी करे जु कोय ।
श्रीमत्श्यामाचरणदासाचार्यमहिमा । २५
लहै पदारथ चार सो, श्री हरि वल्लभ होय २००
बानी रससानी सुनत, नास्तिकता होइ दूर ।
आस्तिकता उपजे अधिक, हरि गुन हिय भरपूर २०१
संप्रदाय शुकदेव मुनि, इष्ट राधिका श्याम ।
चरणदास वृन्दा विपिन, वरणन कीनो धाम २०२
नवनिकुंज ब्रजकी अमित, लीला के रस भेद ।
दिय जनाय निज जननको, कियो सकल भ्रम छेद २०३
दिव्य मानसी महल की, टहल करन की रीत ।
श्यामचरण के दास ने, प्रगट करी सह प्रीत २०४
अली मंजरी सहचरी, सखी सहेली भाव ।
ग्रन्थ भक्ति रस मंजरी, कहे तहां चितचाव २०५
दम्पति सेवा सुख मई, सब को दई बताय ।
श्यामचरण के दासहो, सहचरि पद लियो पाय २०६
रंगमहल युग टहल में, पहुँच लह्यो आनन्द ।
चरणदास चरणन परसि, पायो परमानन्द २०७
चरणदास के चरण की, लई शरण जिन आय ।
तिनको श्री प्रीतमप्रिया, लीने हैं अपनाय २०८
चरणदास के चरणको, जिनके लागो रंग ।
प्रेम पगे प्रीतम प्रिया, तजे न तिनको संग २०६
चरणदास के चरण में, जो दृढ़ लगे सनेह ।
रीझ तिन्हे राधे रसिक, महल खवासी देह २१०
चरणदास के चरण में, जो नवाय निज माथ ।
कुवँरि किशोरी राधिका, रीझ गहे तिहि हाथ २११
श्यामचरण के दास को, जपे प्रेमकर नाम ।
तिनको दम्पतिभुजन भर, हँसि भेटे सुख धाम २१२
चरणदास के ध्यान में, जो जनहो गलतान ।
२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उज्वल नवल निकुंजरस, करे निरन्तर पान २१३
भजे भावकर जिन्होंने, श्याम चरण के दास ।
पहुँचे सोइ निकुंज में, जहाँ नित्य रस रास २१४
होत रहत जहां परस्पर, दम्पति विविध विलास ।
रहत निकटवर्ती तहां, श्याम चरण के दास २१५
गुस प्रगट लीला ललित, करत राधिका श्याम ।
चरणदास चरणन परसि, पाय तहां बिश्राम २१६
दृढ़ करगहे अनन्य व्रत, चरणदास प्रभु . इष्ट ।
सरसमाधुरी रस मिले, महा मधुर अति मिष्ट २१७
जो जन मन वच कर्मकर, भजे श्याम चरनदास ।
रिधिसिधि सम्पति प्राप्तहो, अशुभ अमंगल नास २१८
लोक और परलोक के, रक्षक श्री महाराज ।
सरस माधुरी शरण की, सबविधि उनको लाज २१६
स्वामी रामहि रूपजी, जोग जीतजी जान ।
दोउनने अनुपम कह्यो, जीवन चरित बखान २२०
तिन दोउनको सार यह, सूक्ष्म रचना कीन ।
पढ़ौ सुनौ सब प्रेमसों, साधू रसिक प्रवीन २२१
जैसे सुन्दर सुमन की, लई सुगन्धि निकार ।
सरस माधुरी ने रचो, यह चरितामृत सार २२२
चरितामृत का। प्रीतकर, पठन करे नित जोय ।
सुफल होहिं सब मनोरथ, गुरुभक्ति दृढ़ होय २२३
शुभ सम्बत उन्नीससौ, और तिहत्तर जान ।
चैत्र कृष्ण तिथि द्वादशी, भयो समाप्त सुखदान २२४
जयपुर शहर सुहावनो, जहां दरीबा पान ।
सरसमाधुरी ने कह्यो, चरितामृत रसखान २२५
इति ॥
श्रीमन्निकुंजविहारिणे नमः ॥
मङ्गलाचरणम् ॥
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीकव्यासाम्बरीषशुक-
शौनकभीष्मकाद्याः । रुक्माङ्गदार्जुनवसिष्ठाविभी-
षणाद्या एतानहं परमभागवतान्नमामि ॥ १ ॥
( षोडशाक्षरमहामन्त्रः )
हरेराम हरेराम रामराम हरेहरे ।
हरेकृष्ण हरेकृष्ण कृष्णकृष्ण हरेहरे ॥
( अथ श्रीस्वामी चरणदास रचितग्रन्थ )
॰श्रीभक्तिसागर प्रारम्भ ॥
दो०-मथुरा मण्डल परमशुचि, वृन्दावन रसरास ।
रच्यो शुकमुनी शिष्यने, नाम श्यामचरनदास ॥
२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ ब्रजचरित्रवर्णन ॥
दो०-दीनानाथ अनाथ का, विनती यह सुनिलेहु ।
मम हिरदय में आयकर, ब्रज कथा१ कहदेहु ॥
चारिवेद२ तुमकूं रटैं, शिव शारदा गणेश ।
और न शीश निवायहूं, श्रीकृष्ण करो उपदेश ॥
कै गुरु कै गोविन्द कूं, भक्ता कै हरिदास ।
सबहुँनको एकै गिनौ, जैसे पुहुप३ और बास४ ॥
नारदमुनि अरु व्यासजू, कृपा करहु दयाल ।
अक्षर भूलौं जो कहीं, कहौ मोहिं ततकाल ॥
श्रीशुकदेव दयाल गुरु, मम मस्तक पर ईश ।
ब्रजचरित्र कहत हौं, तुमहिं नवाऊँ शीश ॥
सबसाधुन प्रणाम करि, कर जोरूं शिरनाय ।
चरणदास बिनती करै, वाणी द्योह बनाय ॥
सदा शिव ब्रज में रहैं, करि गोपी को रूप ।
मूरति तौ परगट भई, आप रहत हैं गूप ॥
वंशीवट ढिग रहत हैं, करत रहत हैं ध्यान ।
वक्ता५ वेद पुराण के, परम उत्तम ज्ञान ॥
ब्रह्मादिक कलपत रहें, वृन्दाबन के हेत ।
सुधि आये ब्रजभूमिकी, बिसरिजाय सब वेद ॥
अब ब्रजकी गति गाय सुनाऊं । बुद्धि शुद्धि हरि भक्ति जु पाऊं ॥
चिन्ता मेटन भूमि बखानी । रण जीतमीत जहँदुर्म विनानी॥
कमलापति को चक्र सुदर्शन । चरणदास ताकोकरै वन्दन ॥
मथुरामण्डल तापर रहै । व्यासदेव मुनि ऐसे कहै ॥
१ सम्पूर्णहाल २ सामवेद ऋग्वेद यजुर्वेद अथर्वण ३ फूल ४ सुगन्ध ५ कहने
वाला ॥
[Header] ब्रजचरित्रवर्णन ३
वाराहसंहिता में जो गायो । सो मैं भाषा बीच बनायो ॥
गोवर्धन महिमा अति भारी । चरणदास ताके बलिहारी ॥
जाकी महिमा सबनैं गाई । जहां कृष्ण नित गऊचराई ॥
खरिकै बनाय धेनु जहाँ राखी । अजहूं चिह्न देत हैं साखी ॥
दो०—गोवर्धन बिनती करूं, मो बिनती सुनिलेहु ।
जगतफांस सों काढ़िकरि, भक्तिदान मोहिं देहु ॥
हाटकरूप अडोल खरारी । जाकी शरण रही ब्रज सारी ॥
तादिन इन्द्र कोप पठायो । सकल मेघ झुकि ब्रजपर आयो ॥
करपल्लवैं पर गिरि हरि धारो । तबहीं शरण रहो ब्रज सारो ॥
दिव्यदृष्टि बिन दृष्टि न आवै । कञ्चनरूप पुराण बतावै ॥
मथुरामण्डल में गिरि सोई । मथुरामण्डल अब सुनिलोई ॥
चौरासी कोशी परमाना । मथुरामण्डल ब्यास बखाना ॥
हरिके चरण सदा जो परसै । कृष्णरूप में निशि दिन सरसै ॥
सखासंग लीये हरि डोलैं । सखियन के सँग करत कलोलैं ॥
दो०—सदा कृष्ण ब्रजमें रहें, मोहिं मिलत हैं नाहिं ।
लहर महर कबहूं करें, आनि गहैं मोरी बाहिं ॥
जामें बारह वन बड़भागी । बारह उपवन हैं अनुरागी ॥
जिनमाहीं हरि वेणु बजावैं । मधुर मधुर बाँके सुरगावैं ॥
चौथै पदको है वह स्वामी । सब जीवन को अन्तरयामी ॥
भक्तन हेतु रहें ब्रजमाहीं । गुप्त रहें वृन्दावन ठाहीं ॥
फिरत रहें सबही वन सुन्दर । अन्तर बन्यो रास को मन्दर ॥
जगत दृष्टि सों रहें अलोपा । मिलिहैं ताहि ध्यान जिनरोपा ॥
मथुरामण्डल परगट नाहीं । परगट है सो मथुरा नाहीं ॥
मथुरामण्डल यही कहावै । दिव्य दृष्टि बिन दृष्टि न आवै ॥
१ गौओंके रहनेका स्थान २ अंगुली ॥
४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो०-वन उपवन अब कहतहौं, मथुरामण्डल माहिं ।
बिना भक्ति ब्रजनाथकी, क्योंहूं दीखत नाहिं ॥
उपवन कदम मंडतंवन दूजा । नंदीसुर नंदवन सूजा ॥
मंगल आनँद वन वहि गायो । जहां महर जा गांव बसायो ॥
संकेत वन सो सब जग जानै । बरसाने सब को पहिंचानै ॥
भोजन थाली वही कहायो । जहाँ बैठि भात हरि खायो ॥
सुगन्ध वन अब सो कहावै । अखण्ड वन पुस्तक दरशावै ॥
खेलन द्रुम वन खेलत रहें । मोहन वन केती वन कहैं ॥
दधि ग्राम वन वही कहायो । लूटि लूटि जहाँ दधि खायो ॥
वत्सहरनवन वही कहायो । ब्रह्मा माया देखि भुलायो ॥
दो०-ग्वाल बाल ब्रह्मा हरे, राखे कहूं दुराय ।
जानि बूझि टारो दियो । लीन्हें और बनाय ॥
जब ब्रह्मा समझो करिज्ञाना । कर्ता कृष्ण सत्य करिजाना ॥
फिरि चेतन है शीश नवायो । आदिपुरुष पुरुषोत्तम पायो ॥
द्वादश उपवन गाय सुनाये । मथुरा मण्डल मध्य बताये ॥
द्वादश वनकी गति सुनि लीजै । जिनमाहीं हरिध्यान करीजै ॥
भद्र वन अति महा सुहायो । श्रीवन लालन के मन भायो ॥
भांडीर वनकी महिमा गाऊं । भिन्न भिन्न कहितोहि समझाऊं ॥
लोहवन महिमा कहियत भारी । महावन सुन्दरता अति धारी ॥
तालर वन वहि दृष्टि निहारो । दानव धेनुक जहँ हरि मारो ॥
दो०-दानौ धेनुक महाबली, भाव भक्ति हरि हेत ।
मुक्तिकाज सेवन कियो, तालरवन को खेत ॥
खदिरवन जानत सब कोई । फूल माल जहँ लालन पोई ॥
बहुलावन घन दुरमन छायो । कुमुदवन तो सो कहिसमुझायो ॥
१ प्रथमपाठ।
ब्रजचरित्रवर्णन । ५
कामावन लालन सुखदाई । मधवन लालन भूमि सुहाई ॥
वृन्दावन की शोभा भारी । रास रच्यो जहाँ श्रीवनवारी ॥
वन उपवन शोभा गति ईशा । शिव ब्रह्मादिक नायो शीशा ।
इन्द्र वरुण - कुबेर विनानी*। इनहूँ गति मति ब्रजकी जानी ॥
बल रावण जहाँ सेवा लाई । ऊंची नवनिधि उनहूँ पाई ॥
सप्तऋषिनं मिलि सेवन कीन्हो । ऊंचो आसन ध्रुवको दीन्हो ॥
दो० बहुतक सुर नर तरिगये, तपकरि ब्रजके बीच ।
जाति पांतिको को गिनै, ऊंचा नीचा नीच ॥
वृन्दांवन सबसों बड़ो, जैसे दूधमें घीव ।
सब धर्मन हरिभक्ति ज्यों, जैसे पिण्डं में जीव ॥
सब तीरथ जगमें बड़े, जिनहूँ में हैं ईश ।
उन तीरथ फलकामना, इहि सेवन जगदीश ॥
बीस कोस के फेर में, वृन्दावन कूं जान ।
कुंजगली अति सोहनी, द्रुमंवेली पहिंचान ॥
कंचनकी जहाँ भूमि है, धरे सतोगुण भेष ।
चरणदास बलिबलि गयो, दिव्यदृष्टि करि देख ॥
फूल जु फूले ऋतु विना, नाना छवि बहुरंग ।
अलि मलकतगुञ्जत फिरें, भँवरी सुतलै संग ॥
ऋतुवसन्त जहँ नितरहत, विहरत नन्दकिशोर
कुहुँकत कोयल मगन होय, बोलत दादुर मोर ॥
तिहिमधि वृन्दावन महा, निज वृन्दावन जान ।
तिरकोणी वर्णन कियो, जोजेंन है प्रमान ॥
१ नारद, वशिष्ठ, भृगु, अंगिरा, कश्यप, विश्वामित्र, पुलस्त्य २ देह ३ लता
४ अमर ५ चारि कोसका नाम ॥
प्रथमपाठ ❀ इन्द्र कुबेर आदि विज्ञानी ॥
६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाकी महिमा सबहुन गाई । रास करें जहाँ कुँवर कन्हाई ॥
जमुना जहाँ परिक्रमा दीन्ही । गुप्तपिया की लीला चीन्ही ॥
गोपसुता जहाँ नित उठि न्हाई । वर पूरण पायो कुँवर कन्हाई ॥
श्यामरङ्ग निर्मल जल गहरी । वृन्दावनके ढिगढिग लहरी ॥
आसा मनसाकरि कोइ न्हावै । सहस सुरसुरी को फल पावै ॥
दिव्य वृन्दावन दिव्य कलिन्द्री । देखे सो जीतै मन इन्द्री ॥
किनार निकट वृक्षनकी छाहीं । आयपरी जमुनाजल माहीं ॥
दो० भक्ति बिना पावै नहीं, वृन्दावन की संध ।
बिन पाये निन्दा करै, भोंदू मूरुख अंध ॥
मिलमिल शुभकी उठत तरंगा । बोलत दादुर अरु सुरभंगा ॥
कालीदह महिमा सुनु भ्राता । सहस गंगके फलकी दाता ॥
विहार* घाट बसि भजन करीजै । जेहिसेवन जमजवाब न दीजै ॥
वंशीवट बसि हठ इमि कीजै । तजै देह जब दर्शन लीजै ॥
अब सुनु वृन्दावन की बतियां । शीतल करी हमारी छतियां ॥
वनघन कुञ्जलता छबिछाई । झुक टहनी धरणी पर आई ॥
करत मंद समीर पयाना । बसत सुगन्ध सबै अरघाना ॥
बरसत अमृत फूही सुहाई । निकसत कोमल गोभगुहाई ॥
दो० वृन्दावन में रहत हैं, ज्ञानी गुणी अतीत ।
वृन्दावन को ना मिलें, कोऊ लहत जगजीत ॥
नित बसन्त जहँ सुगन्ध सुरारी । चलतमन्द जहाँ पवनसुखारी ॥
पुहुप विकसि रहे रङ्ग बिरङ्गा । लेत वास गुंजत सुरभृङ्गा ॥
बोलत भँवर महाध्वनि गाजें । मानो अनहदकी गति साजें ॥
जुगुनू दमकि चमकि चक्रावैं । समय जानिकर हर्ष बढ़ावैं ॥
प्रथमपाठ * विहर ।
ब्रजचरित्रवर्णन । ७
नाचत मोर करत चतुराई । पंख पसारि मुदित मगनाई ॥
कैइक' उचक वोल निज बोलैं । कैइक कुञ्जन ऊपर डोलैं ॥
जुगल नामलैं कीर पुकारैं । बार बार वनओर निहारैं ॥
वृन्दावन चारौ जुग¹ माहीं । गोपरहैं शुकदेव बताहीं ॥
दो० वृन्दावनकी साधुगति, कापै वरणी जाय ।
जैसी जाकूं दृष्टि है, जैसोही दरशाय ॥
जैसे हरि मथुरा गये, सबन विलोको आय ।
काल कंसकी दृष्टि में, साधुन प्रभू लखाय ॥
मथुरा में जोधा बड़े, जिन्हें मल्ल दरशाय ।
नारिन दरशै कामसम, प्रीतिरीति अधिकाय ॥
वृन्दावन सोइ देखिहै, जिन देख्यो हरि रूप ।
दुर्लभ देवन कूं भयो, महागूप' ² सों गूप ॥
वृन्दावन सेवन करै, अमरलोक कूं जाय ।
इन्द्रीजीते हरि भजैं, प्रेम प्रीति के भाय ॥
रसिककेलि वृन्दावन माहीं । अमरलोक की भांति कराहीं ॥
अमरलोक तिहुँलोकसों न्यारो । मथुरामण्डल अंश विचारो ॥
अमरलोक विचहै निजधामा । जाको अंश वृन्दावन नामा ॥
पुरुषोत्तम निज धामा माहीं । कारण प्रेमरहै ब्रज आई ॥
पुरुषोत्तम प्रभु लीला धारी । वृन्दावन में सदा विहारी ॥
निजधामा की कहियत शोभा । वृन्दावन में रहें अलोपा ॥
दिव्य दृष्टि बिन दृष्टि न आवै । सकल पुराण वेद यों गावै ॥
गोल चौतरो निज वृन्दावन । तापरवारौं अपनो तनमन ॥
रहो चौतरो छिपि वहिठाहीं । जैसे अग्नि काष्ठके माहीं ॥
१ सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग २ छिपाहुआ
३
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गले धुकधुकी सुन्दर झमकै । तामधिकौस्तुभमणिअतिदमकै ॥ - yes, the headline is completely unbroken!
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अधिक सुघर पहिरे हिमचौकी । वनमाला कहियत नौनिधिकी ॥ -
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गोल भुजनपर बाजू सोहैं । पहुँची कड़ा कनक करिदोहैं ॥
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पहुंचीढिग पहिरे जहाँगीरी । रतन चौक छविलगीजँजीरी ॥
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Thenपहिरे जहाँगीरी ।
Then `रतन चौक छविलगीजँजी
ब्रजचरित्रवर्णन । ६
रतन चौकहै पीठ हथेली । लगी जँजीर मुँदरियन भेली ॥
सोहैं छाप छला अरु मुँदरी । नुहसत पहिरे सुन्दर अंगुरी ॥
इकीस चिह्न चरणनमें धारे । झुनुक झुनुक पैंजनिझनकारे ॥
मन्द मन्द विहँसत मुसकाई । रणजीत* मीतछविकहीनजाई ॥
नितकिशोर अरुनित्तकिशोरी । द्वादश वरष अवस्था भोरी ॥
राधे भूषण छवि कह गाऊं । नाव लेत मनमें शरमाऊं ॥
हूं मैं दास नाव रणजीत । भक्तिदान मोहिं दीजैरीत ॥
बहुत सखी जिनके निजसंगा । रासकेलि खेलें बहुरंगा ॥
वनके चौंसठि खम्भे माहीं । होत अखण्ड रास वहि ठाहीं ॥
झुनुक झुनुक सखियन पगबाजैं । घुँघुरू अधिकमहाध्वनिगाजैं ॥
दिव्य भूषण पहिरे पियप्यारी । शशिव१दनी तिरगुणते न्यारी ॥
नवल किशोरी गोरी सारी । सुघर सयानी चतुर नारी ॥
दिव्यवस्त्र अरु मधुर शरीरा । अधिक रूप छवि गहर गंभीरा ॥
कजरारी कच२ लटकैं बेनी । अंजन नैन सैन पियदेनी ॥
चूड़ामणि गहनो छवि नीको । शीशफूल अरु वेनीटीको ॥
नथबुलाक अरु बन्दी झलकें । घूंघुरवाली लटकैं अलकैं ॥
मुखऊपर अलकैं छवि ऐसी । चन्दचढ़ी दो नागिनि जैसी ॥
करणफूल सँग झुमके मलकें । सब सखियनके भूषण झलकें ॥
चम्पाकली नौलड़ी माला । चन्दनहार सुपहिरे वाला ॥
कठुला जैसे गले जनेऊ । अरु हिय चौकी महा अभेऊ ॥
फूलमाल सखियां सब पहिरे । गुंजनकी माला हिय लहिरे ॥
बांहन में बाजूबंद बांधे । वंकबला बांहन पर साधे ॥
सदा सुहागिनि पहिरे चूरी । सुवक पछैली वँगरी रूरी ॥
१ चन्द्रमाकासा वदन २ बाल ॥
प्रथम पाठ * रणजित मित ॥
१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
॰कँगनी अरु पहिरे जहँगीरी। रतनन चौक आरसी धीरी॥
छाप छला अरु पहिरे गूंठी। नुहसत पहिरे अजब अनूठी॥
पांवनमें पग वेवर बाजैं। नखशिखलों आभूषण साजैं॥
झुनुक झुनुक नाचै अरु गावैं। ठुमुक ठुमुक निरतैं अरु धावैं॥
कबहूं थइथइ थइथइ करें। कबहुँ कर ऊपर कर धरैं॥
कबहूं घिनन घिनन अँग मोरैं। भाव बताय तान बहु तोरैं॥
कबहूं कर उठाय गति चालैं। साँग उपांग¹ बतावत हालैं॥
हो अनुराग राग बहु गावैं। घुँघुरूकीगतिअधिक बजावैं॥
कोइ नाचै कोई गावै। कोइमृदंग कोइ ताल बजावै॥
बैन सरू काहू कर राजै। कोउ तँबूरा नारी साजै॥
उपँग लिये कर कोउ सहेली। अमृत कुण्डली² कोउअलबेली॥
कोइ बीन कोइ लिये मुहचङ्गा। मगनरूप सबही निज सङ्गा॥
दो० कहा बुद्धि कहा कहसकूं, रासकेलि को साज।
बाजे हैं बहुभांति के, वर्णत आवै लाज॥
कबहूं करसों कर मिला, नृत्यत श्रीगोपाल॥
कबहुं बैठे सांवरो, नृत्यत सुन्दरबाल॥
कबहूं हँसिकरि निकट बुलावैं। कबहूं फूलमाल पहिरावैं॥
कबहूं मन्द मन्द मुसकावैं। बैन सैन दै नृत्य बतावैं॥
वृन्दावन में ऐसी लीला। चरणदासको जहां वसीला॥
जो कोइ इनको ध्यान लगावै। अमर लोक निहचै करिपावै॥
सिमिटो मन कबहूं नहिं फूटै। सोवत जागत ध्यान न छूटै॥
जो कोइ इनको ध्यान न करिहै। भरमि भरमि चौरासी परिहै॥
सुरनर मुनिसबही मिलि ध्यावैं। शिव ब्रह्मादिक अन्त न पावैं॥
वेद विना यह भेद न पावै। आप भरमि अरु जग भरमावै॥
१ सब विधियों सहित २ द्वारा॥
ब्रजचरित्रवर्णन । ११
वेद पुराण संहिता गावैं । चारोंयुग हरिभक्ति बतावैं ॥
दो० इत उत भटको जग फिरै, कीन्हों नाहिं विचार ।
सत्य पुरुष जानों नहीं, कैसे उतरै पार ॥
द्वापर बीतो कलियुग आयो । राजाको शुकदेव सुनायो ॥
कलियुगकी दुर्बुद्धि बताऊं । सुनहुपरीक्षित कहि समुझाऊं ॥
ओछी बुद्धि मनुज की होगी । सकलविकल अरु मनके रोगी ॥
सूक्ष्म ज्ञान महाअभिमानी । नहीं मानिहैं वेद पुरानी ॥
परमेश्वर की निन्दा करि हैं । भूत मसानी चित में धरि हैं ॥
खेतरपाल १ भूमिया मानैं । कुत्रिमको कर्ता करिजानैं ॥
परमेश्वर की बात न भावै । एसो उत्तर तुरत बतावै ॥
कहैं राम् कहां है भाई । हमहूँ को तु देहु दिखाई ॥
दो० चहूँओर हरिको विभव, सातद्वीप नौखण्ड ।
चरणदास* कहैं सुन अधिर, किन रच्यो ब्रह्माण्ड ॥
भक्ति विना दीखै नहीं, इन नयनन हरिरूप ।
साधुन को परगट भयो, विना भक्ति हरिरूप ॥
साधुसन्तकी निन्दा करिहैं । भजन करै तासों वहु अरि हैं ॥
करि अभिमान आपमें जरिहैं । गुरुको कहो नेक नहिं करिहैं ॥
पंथ खड़े करि हैं छत्तीसा २ । भरमपूजि तजिहैं हरि ईसा ॥
दम्भ झूठ की सेवा करिहैं । झूठे पंथन में जा लरिहैं ॥
गऊ ब्राह्मण भ्रष्टल होई । बाप पूत में परिहै दोई ॥
विद्या दान कपट व्यवहारा । राजा दुष्ट दुखित संसारा ॥
वेद पढ़े करि हैं अभिमाना । हम पंडित अरु सब अज्ञाना ॥
१गांव का चौकीदार २ छत्तीस प्रकारके पंथ ॥
प्रथमपाठ * चरण दाससुन