भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
· भक्तिपदार्थवर्णन । १७५
चरणदास शुकदेव जनावै। सांचे गुणावाद जो गावै॥
दो० यह अस्तुति करतार की, जिन रचिया संसार।
अद्भुत कौतुक१ करि रह्यो, लीला अगम अपार ॥
उपजावै पालै विनशावै। अनगिन चन्द सूर दरशावै॥
कोटिक अंड पलकमें करै। जब चाहै जब कुछना रहै॥
जब फैले तब रूप अनेका। जब समिटै जब एकहि एका॥
बटक बीज का खेल निहारा। एक बीजका सकल पसारा॥
तामें बीज अनंतहि देखा। गिनूं कहांलों रहा न लेखा॥
ऐसे हरि आपा विस्तारा। कहत सुनत देखतहूँ हारा॥
अपरमपार पार नहिं पाऊं। अस्तुति करता मैं सकुचाऊं॥
समझिसमझि मनमें रहिजाऊं। चरणदास हो शीश नवाऊं॥
दो० लीला सिन्धु अगाधगति, मोपै कही न जाय।
चरणदास यों कहत है, सोचत गयो हिराय ॥
कोटिक ब्रह्मा अस्तुति करहीं। वेद कहत प्रभु परे परेहीं॥
कोटिक शम्भू करें समाधा। जानि परै नहिं रूप अगाधा ॥
कोटिक नारद से यश गावैं। गुण अगाध२ कछु अंत न पावैं ॥
कोटिक ध्यानी ध्यान लगावैं। हरिके सो कछु रूप न पावैं ॥
ज्ञानी कोटिक कथैं वह ज्ञाना। समझ थकी उनहूं नहिंजाना ॥
कोटिक शारद करें बिचारा। बुद्धि थकी जब कहा अपारा ॥
सुरनरमुनिवा भेद न लहिया। शोचिशोचिबकिबकिथकिरहिया॥
निरगुण सरगुण कहा न जावै। चरणदास शुकदेव सुनावै॥
दो० चरणदास वा रूप की, पटतर३ दई न जाहि।
राम सरीखे राम हैं, और बतावों काहि॥
वाकी अस्तुति कहा बखानूं। जैसा वह जैसा नहिं जानूं॥
१ तमाशा २ जिसका थाह न हो ३ बराबरी ॥
१४
१७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बुधि विचार करिहारा ज्ञाना । अनभै थकी नाहिं पहिंचाना ॥
आदि न अंत मध्य नहिं जाका । दहिना वावां पीठ न आगा ॥
हरा पीत श्वेत नहिं काला । नारी पुरुष न बूढ़ा बाला ॥
रूप न रंग मिहीं नहिं मोटा । नया पुराना बड़ा न छोटा ॥
नाम रूप किरियासूं न्यारा । नहिं हलका नहिं कहिये भारा ॥
वानी चार परै निरवाना । काहूविधि वह जाय न जाना ॥
पुहुप गंध नादनतैं झीना । गुरु शुकदेव सुनाय जु दीना ॥
दो० कौन लखै को कहि सकै, अचरज अलख अभेव ।
ज्ञान ध्यान पहुँचै नहीं, निर्विकार निर्लेव ॥
सुनत अचम्भा मोकूं आया । जाके बचनरूप नहिं काया १ ॥
निराकार २ नहिं ना आकारा । नहिं अडोल नहिं डोलनहारा ॥
पांचतत्त्व तिरगुण ते आगे । अद्भुत अचरज ध्यान न लागे ॥
नहिं परगट नहिं गूपन ठाऊं । समझसकौंनहिंथकिथकिजाऊं ॥
जैसो आगे मैं कहि आयो । फिर समझौ वैसो नहिं पायो ॥
जो कुछ कहिया नाहीं नाहीं । सो सब देखा वाके माहीं ॥
सकल सर्वदा हां पहिचानी । चरणदास शुकदेव बखानी ॥
दो० वामें गुण अनगिनत हैं, अपरमपार अगाध ।
देखौ परगटही भये, रूप नाम अरु नाद ॥
वृक्ष बीज का नाम बताऊं । भिन्न भिन्न परगट दिखलाऊं ॥
जो कोइ निराबीज कूं बूझै । ताकूं वह निरगुणही सूझै ॥
जब समझै तब सब गुणमाहीं । तामें डाल मूल ३ फल छाहीं ॥
ऐसे पूरणब्रह्म पिछानौ । निराकार निरगुण मत जानौ ॥
वै निरगुण सरगुण ते न्यारे । निरगुण सरगुण नाम विचारै ॥
अकथ कथा कछु कथिय न जाई । जो भाषूं सोई . . मुरखाई ॥
१ शरीर २ जिसका आकार नहीं ३ जड़ ४ जो कहने लायक न हो ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १७७
कोई कहौ सुनौ मन आनौ । वैसा नहिं निश्चय करि जानौ ॥
बड़बड़ ऋषि मुनि पण्डित भारे । चरणदास सब खोजत हारे ॥
दो० वहि निरगुंण सरगुंण वही, वहि दोनों से न्यार ।
जो था सो जाना नहीं, शोचा वारंवार ॥
अनंत¹ शक्ति लीला अनंत, गुण अनंत बहुभाव ।
कौतुक रूप अनंत हैं, चरणदास बलिजाव ॥
नाम भेद किरिया अनंत, अनंत धरे अवतार ।
बीस चार तिनमें अधिक, कहै शुकदेव विचार ॥
राम कृष्ण पूरण कला, चौबीसौ में दोय ।
निरगुण से सरगुण वही, भक्तों कारण होय ॥
रागबिलावल ॥
अलख² निरंजन अगम अपार ।
एक अनेक भेष बहु कीन्हे सुन्दर रचना रची सँवार ॥
निरगुण हरि सरगुण हो खेलौ अचरज लीला करि विस्तार
अपनो चरित आपही देखै ऐसो अद्भुत कौतुकधार ॥
रूप बराह पकरि हिरण्याक्षहि धरती लाये ताहि संहार ।
यज्ञपुरुष अरु दत्तात्रेयी अरु श्रीबद्रीपति हि विचार ॥
सनत्कुमार ऋषभदेव ध्रुव बर पृथू मच्छ कूर्म उदार ।
हयग्रीवा अरु हंसरूप ही महाबली नरसिंह बलधार ॥
हरि परगट ह्वै गजै छुटायौ बामन कपिल सरस गुणसार ।
मन्वन्तर धन्वतर प्रगटे परशुराम रामचन्द्र मुरार ॥
पूरण कला ईश तिहुंपुर को कृष्ण प्रगट हो कंस पछार ।
वेदव्यास अरु बोध कलंकी ये भये सब चौबीस अवतार ॥
युग युग माहिं आप परगट ह्वै दुष्ट दलन सन्तन रखवार ।
१ जिसका अन्त नहीं २ जो देखि न परै ॥
१७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी बाँकी गतिको वार न पार ॥
दो० एक एकसों आगरो, महिमा कही न जाय ।
अनंत रँगीले महल में, आपहि बैठे आय ॥
अनन्त रँगीले महल बनाये । तामें आप रामहीं आये ॥
नांव रूप गुण न्यारे न्यारे । गिनत शारदा गणपति हारे ॥
मन्दिर रूप बहुत छवि सोहै । जहां तहां मेरो मन मोहै ॥
हरे श्वेत पीत अरु लाले । पिसताकी ऊदे अरु काले ॥
बेलदार लहरा छवि बूटे । चीतमताले और तिखूटे ॥
बूंद बूंद अरु गंडे दारे । जानौ चित्तर हाथ सँवारे ॥
रँगा रंग बहु चित्तरकारी । कहूं कहाँलों मों बुधिहारी ॥
दो पाये अरु पुनि चौपाये । बहु पाये कछु कहे न जाये ॥
वृक्षरूप अरु पक्षीनाना । कीट१ पतंगा२ थिर३ चर४ जाना ॥
जलमें मीन५ बहुत परकारे । चरणदास शुकदेव विचारे ॥
दो० थावर जंगम चर अचर, बहुत छबीली भांति ॥
राजस तामससात्विकी, बहु अर्धान वहु क्रांति ॥
बानर नर असुरा सुरा, यक्षगण गन्ध्रब प्रेत ।
सबही महल बराबरी, सबही सेती हेत ॥
खिरकी नैन चावसों खोलै । मुख द्वारे नाना विधि बोलै ॥
बहुत भांति की नाना बानो । चतुर कूड भोली अरु यानी६ ॥
कहिं अबोल नहिं बोलन आवै । पै सब महलन वह दरशाव ॥
साक्षात हरिही कूं जानौ । भवन् भवनमें ताहि पिछानौ ॥
काया क्षेत्र ज्ञानी जानै । क्षेत्रग आतमरूप बखानै ॥
देही क्षर गीता में गायो । अक्षर जीव खोल दिखलायो ॥
१ किरवा २ पाखी ३ न चलनेवाले ४ चलनेवाले ५ मछली ६ न
जाननेवाली ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १७६
काया मन्दिर आप रमायो । ताते राम नाम धरवायो ॥
देह सँयोग राम कहलायो । चरणदास शुकदेव बतायो ॥
दो० सूरज चींटी आदि दै, लघु दीरघ के माहिं ।
सब में पोइ आतमा, बाहर कोई नाहिं ॥
छोटे भांडे१ में करै, छोटाही परकाश ।
बड़े जु भाँड़े में करै, जेता होय उकाश ॥
ज्ञानवन्त कूं मैं दियो, दीपक को दृष्टान्त ।
जो वह समझ चावसूँ, मिटै तिमिर२ अरु भ्रान्त ॥
जैसेही है पिण्ड में, जैसे ही ब्रह्मण्ड ।
भीतर बाहर रमिरह्यो, सात द्वीप नव खण्ड ॥
आप लखेते वाकूं पावै । जो पै सतगुरु भेद बतावै ॥
ज्ञान दृष्टि सेती दरशावै । आपा मिटै ब्रह्म ठहरावै ॥
ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय जहँ नाहीं । ध्याता ध्यान ध्येय मिटि जाहीं ॥
जबहो एक दूसरा नासे । बन्ध मुकत के रहैं न सांसे ॥
मृतक अवस्था जीवत आवै । करम रहित अस्थिर गति पावै ॥
तब कोइ मिन्तर वैरी नाहीं । पाप पुण्यकी परै न छाहीं ॥
हरष शोक सम होजा दोऊ । रक्षाकरो कि मारो कोऊ ॥
कोऊ हाथ में भोजन देजा । कोउ छीनकर योंहीं लेजा ॥
दोनों एक बराबर वाके । जगव्योहार कछू नहिं जाके ॥
हरि बिन और पिछान न कोई । तिनके इच्छा रही न दोई ॥
ज्ञान दशा ऐसे करि गाई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० ज्ञानदशा आवन कठिन, बिरला जानै कोय ।
ज्ञान दशा जब जानिये, जीवत मृतक होय ॥
वाचक३ ज्ञानी बहुतक देखे । लक्ष४ ज्ञानी कोइ लेखे लेखे ॥
१ बर्त्तनरूपी शरीर २ अँधेरा ३ कहनेवाले ४ हृदयान्तर से देखनेवाले ॥
१८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ज्ञानी बिगड़ै विषयी होई । कथै एक अरु चालै दोई ॥
बुरे करम औगुण चितलावै । भले करम गुण सब बिसरावै ॥
विषय वासना के रँगरातो । झूठ कपटछलबल मदमातो ॥
इन्द्री वश मन हाथ न आवै । पाप करन सों नाहिं डरावै ॥
ज्ञानकथै अरु वाद बढ़ावै । रहन गहन का भेद न पावै ॥
ब्रह्मब्रत्त का आवन भारी । चरणदास शुकदेव बिचारी ॥
दो० उनतीसौ लक्षण लिये, भक्त सहत हो ज्ञान ।
ज्ञान दशा जब आय है, करै आतमा ध्यान ॥
भक्तदशा अब कहत हौं, बिसरै आपा आप ।
चरणदास यों कहत हैं, छूटैं तीनों ताप१ ॥
अष्टपदी ॥
नवधा भक्ति सँभारि अंग नौ जानिले ।
शरवण चितवन और कीर्त्तन मानिले ॥
सुमिरण बन्दन ध्यान और पूजा करो ।
प्रभुसों प्रीति लगाय सुरति चरणन धरो ॥
होकरि दासहि भाव साध संगति रलो ।
भक्तन की कर सेव यही मत है भलो ॥
आपा अर्पण देय धीर्य्य दृढ़ता गहौ ।
क्षमा शील सन्तोष दया धारे रहौ ॥
यह जो मैंने कहा वेद का फूल है ।
योग ज्ञान वैराग्य संबन का मूल है ॥
प्रेम भक्ति का तात पात तीनों१ नसैं ।
अर्थ धर्म काम मोक्षसकल तामें बसैं ॥
जो राखै मंन माहिं विवेक विचारसों ।
१ दैहिक दैविक भौतिक ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । ३८१.
पावै पद निर्वाण बचै जग भारसों ॥
कहैं गुरू शुकदेव मयाके भाव सों ।
चरणहिं दासा होय सुनौ बहु चाव सों ॥
राग सोरठ व गौरी व आसावरी ॥
साधो नवधा भक्ति करौ रे ।
कलियुग में यह बड़ो पदारथ गहिगहि ताहि तरौरे
जेजे यासों भये शिरोमणि तिन को नाम सुनाऊं ।
बढ़ै कथा विस्तार कहूं तो याते सूक्ष्म गाऊं ॥
जन प्रहलाद तरो सुमिरण ते बन्दनसों अक्रूर ।
चरण कमल की सेवा सेती लक्ष्मी रहत हजूर ॥
चन्दन चर्चतहूं पृथुराजा उतरो भव जलपारा ।
बलि राजा तन अर्पण कीन्हों सदा रहैं हरि द्वारा ॥
परमदास हनुमतहू उबरो उत्तम पदवी पाई ।
सखा सुभाव तरो है अर्जुन ताकी महिमा गाई ॥
मुक्त भयो है परीक्षित राजा सुनि भागोत पुराना ।
श्रीशुकदेव मुनी से वक्ता हुये रूप भगवाना ॥
ज्ञान योग वैराग्य सबन सों प्रेम प्रीति है न्यारी ।
चरणदास ने गुरु किरपा सों सांची बात बिचारी ॥
दो० नवो अङ्ग के साधतैं, उपजै प्रेम अनूप ।
रणजीता यों जानिये, सब धर्मन का भूप ॥
सब मत अधिकी प्रेम बतावैं । योग युगत सूं बड़ा दिखावैं ॥
प्रेमहिंसूं उपजै वैराग । प्रेमहिंसूं उपजै त्याग ॥
प्रेम भक्तिसूं उपजै ज्ञाना । होय चांदना मिटै अज्ञाना ॥
दुरलभ प्रेम जु हाथ न आवै । हरि किरपा करिदै तौ पावै ॥
प्रेम प्रीतिके वश भगवाना । सकल शास्तर कियो बखाना ॥
:१८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
किसी भक्त हिये प्रेमजु जागे । तौ हरि दरशत रहै जु आगे ॥
प्रेमहिंसूं जग कूं उपजावै । निरगुन सरगुन हो हो आवै ॥
सकल शिरोमणि प्रेमहि जानौ । चरणदास निहचै मन आनौ ॥
दो० प्रेम बराबर योग ना, प्रेम बराबर ज्ञान ।
प्रेम भक्तिविन साधुवा, सबही थोथा ध्यान ॥
प्रेम छुटावै जगतकूं, प्रेम मिलावै राम ।
प्रेम करै गति औरही, लै पहुँचे हरिधाम ॥
अष्टपदी ॥
वह करै काग सूं हंसा । एकरहै पिया का संसा ॥
वह जात वरन कुल खोवै । अरु बीज बिरह का बोवै ॥
जो प्रेम तनक चित आवै । वह औगुण सबै नशावै ॥
प्रेमलता जब लहरै । मन बिना योगही ठहरै ॥
कोई चतुर खिलारी खेलै । वह प्रेम पियाला झेलै ॥
जो धड़ पै शीश न राखै । सोई प्रेम पियाला चाखै ॥
तन मन सूं जा बौराई । वह रहै ध्यान लौलाई ॥
वह पहुँचे हरिके पासा । यों कहैं चरण ही दासा ॥
दो० प्रेमीजन हरि आपहो, आपा निकसै नाहिं ।
गुरु शुकदेव दिखावई, समझ देखि मनमाहिं ॥
हिरदे माहीं प्रेम जो, नैनौं झलकै आय ।
सोइ छका हरिरस पगा, वा पग परसो धाय ॥
गदगद वाणी कंठमें, आंसू टपकैं नैन ।
वहतौ बिरहिनि रामकी, तलफत है दिनरैन ॥
हाय हाय करि कब मिलैं, छाती फाटी जाय ।
ऐसा दिन कब होंयगा, दरशन करैं अघाय ॥
बिन दरशन कल ना पडै, मनुआँ धरै न धीर ।
भक्तिपदार्थवर्णन । १८३
चरणदासकी श्याम बिन, कौन मिटावै पीर ॥
पीवविना ना जीवना, जगमें भारी जान ।
पिया मिलै तौ जीवना, नहीं तौ छूटै प्रान ॥
मुख पियरो सूखै अधर, आखैं खरी उदास ।
आहिजु निकसै दुख भरी, गहिरे लेत उसास ॥
वह बिरहिनि बौरी भई, जानत ना कोइ भेद ।
अगिनि बरै हियरा जर, भये कलेजे छेद ॥
अपने वश वह ना रही, फँसी बिरह के जाल ।
चरणदास रोवत रहै, सुमिरिसुमिरि गुणख्याल ॥
बातन को बिरहा लगो, ज्यों घुन लागो दारुँ ।
दिन दिन पीरी होतहै, पिया न बूझै सार ॥
वै नहिं बूझैं सारही, बिरहिनिकौन हवाल ।
जब सुधि आवै लालकी, चुभत कलेजे भाल ॥
पीव चहौ कै मत चहौ, वहतौ पीकी 'दास ।
पियके रँगराती रहै, जग सों होय उदास ॥
पीपी करते दिन गया, रैनि गई पिय ध्यान ।
बिरहिनिके सहज सधै, भक्तियोग अरु ज्ञान ॥
बिरहिनि एकैरामबिन, और न कोई मीत ।
आठ पहर साठौ घड़ी, पियामिलनकी चीत ॥
जाप करै तौ पीवका, ध्यान करै तौ पीव ।
पीव बिरहिनिका जीवहै, जीबिरहिनिका पीव ॥
१ ओँठ २ काष्ठ ॥
१८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चारौँयुगवर्णन ॥
कुंडलिया ॥
सत्युग सांचा बोलते परमहंस को ध्यान ।
सतवादी सत रखते सत नहिं देते जान ॥
सत नहिं देते जान प्रान जोपै तजि देही ।
निश्चय होती मुक्ति दरशते राम सनेही ॥
शुकदेव कहि चरणदाससों अवहीं सत्युगजान ।
सत बोलौ सतसों रहो सतकी गहिये आन ॥
त्रेता में तप साधते आसन संयम धार ।
पांचौ इन्द्री रोकते जब मन जाता हार ॥
जब मन जाता हार खैंचि अनहद में धरते ।
कै अपनीही इष्ट ध्यान ताही को करते ॥
आप विसर्जन होय मुक्ति निश्चय करि पाते ।
चरणदास शुकदेव तपस्या चाल दिखाते ॥
द्वापर पूजा बंदना प्रेम सहितजो होय ।
कहा राजसी मानसी पूजा कहिये दोय ॥
पूजा कहिये दोय जैसि जाके मन भावै ।
धरै नेम आचार अंत ना चित्त डुलावै ॥
हित करि पूजा कीजिये द्वापर को यह भेव ।
चरणदास निश्चय करौ कहिया श्रीशुकदेव ॥
कलियुग हरि गुण गाइये गुणावादही सार ।
भजनकरो मन मगन ह्वै भय अरु सकुच निवार ॥
भय अरु सकुचनिवार जाति कुल गर्व बहावो ।
साज बाज लै संग रामको गाय रिझावो ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १८५
कथा कीर्त्तन सों तरै कलियुगही के माहिं ।
शुकदेवकहिचरणदाससों तारौगहिगहिबांहिं ॥
इति श्रीचारौयुगसम्पूर्णम् ॥
अथ नाम अंग वर्णन ॥
दो० प्रणऊं¹ श्री शुकदेव कूं, वाणी कहूँ अगाध ।
महिमा गाऊं नाम की, सबमिलिसुनियोसाध ॥
ज्योंकी त्योंहीं कहत हूँ, कछू न राखूं भेद ।
निश्चय आवै नाम की, छूटै सबही खेद ॥
जनम मरनजम दंड के, गर्भवास की त्रास ।
नाम रटे सबही छुटै, लख चौरासी गाँस ॥
कई बार जो यज्ञ करि, योग करै चितलाय ।
चरणदास कहैं नाम बिन, सभी अफल होजाय ॥
आठ धात मैं गुण नहीं, जो पारस के माहिं ।
तप तीरथ व्रत साधना, राम नाम सम नाहिं ॥
ज्यों सेमर का सेवना, ज्यों लोभी का धर्म्म ।
अन्न बिना भुस कूटना, नाम बिना यों कर्म्म ॥
छोड़ै सबही वासना, हो बैठे निष्काम ।
चरण कमल मैं चित धरै, सुमिरै रामहिं राम ॥
ऐसा हो जब संत हो, तब रीझै करतार ।
दरशन दे अपना करै, कभी न छोड़ै लार ॥
चार वेद² किये ब्यास ने, अर्थ बिचार विचार ।
तामें निकसी भक्तिही, राम नाम ततसार ॥
जिन कहिया शुकदेव कूं, सुनिया प्रेम प्रतीति ।
१ नमस्कार २ ऋगवेद सामवेद यजुर्वेद अथर्वणवेद ॥
१८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तिनजगमेंपरगट कियो, जैसी चहिये रीति ॥
ब्रह्महत्या अरु नारि की, बालक हत्या होय ।
राम नाम जो मन बसै, सब कूं डारै खोय ॥
हियआवत जगदुख टरै, कंठ आय अघ जाय ।
मुख सूं बोलै आयकरि, ताकी कौन चलाय ॥
ऐसाही हरि नामहीं, मोहि रामकी सौहिं ।
जाकूं होवै परखही, सो समझैहां लौहिं ॥
बिन समझे पातक नशै, समझ जपै हो मुक्त ।
चरणदास यों कहत हैं, जो कोइ जानै युक्त ॥
नामहिं लैजल पीजिये, नामहिं लेकर खाह ।
नामहिं लेकर बैठिये, नामहिं लै चल राह ॥
जबलग जागैराम कहु, तन मन सूं यहिचीत ।
चरणदास यों कहत है, हरिविन और न मीत ॥
तेरा तौ कोइ है नहीं, मात पिता सुत नार ।
ताते सुमिरौ राम कूं, हे मन वारंबार ॥
जिहिकारण भटकतफिरै, घरघर करत सलाम ।
तेरे तौ वैहैं नहीं, ये मन सुमिरौ राम ॥
जीवतही स्वारथ लगै, मूये देह जराय ।
ऐ मन सुमिरौ राम कूं, धोखे काहि पराय ॥
हाथी घोड़े धन घना, चंदमुखी बहु नार ।
नाम बिना यमलोक में, पावे - दुःख अपार ॥
जबलग जीवै राम कहु, रामहिं सेती नेह ।
जीव मिलैगो राम में, पड़ी रहैगी देह ॥
अचरज साधन नामका, भक्तियोग का जीव ।
जैसे दूध जमाय कै, मथिकरिकाढ़ा घीव ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १८७
कुंडलिया ॥
आठ मास मुखसूं जपै सोलह मास कँठ जाप ।
बत्तिस मास हिरदै जपै तनमें रहै न पाप ॥
तनमें रहै न पाप भक्ति का उपजै पौधा ।
मन रुकजावै जहां अपरबल कहिये योधा ॥
शुकदेव कही चरणदास सूं यही भेद ततसार ।
बहुरु आवै नाभिमें ताका कहूं विचार ॥
दो० पांच बरष जप नाभिसों, रग रग बोलै राम ।
देह जीव निज भक्तहो, पहुँचै हरिके धाम ॥
त्रिकुटी में जप रामकूं, जहां उजाला होय ।
श्वासा माहीं जपेते, द्विविधा रहै न कोय ॥
गगन मँडलमें जापकरि, जितहै दशवांद्वार ।
चरणदास यों कहत हैं, सो पहुँचै हरिदरबार ॥
नासा अग्रे जापकरि, देखै नूर अगाध ।
बहुतक अचरज अरुखुलै, चरणदास कहेसाध ॥
नाम उठाकर नाभिसूं, गगन माहिं लैजाय ।
जहां होय परकाशही, शुकदेव दिया बताय ॥
मनही मनमें जापकरि, दरपण उज्ज्वल होय ।
दरशन होवै रामका, तिमिर¹ जाय सबखोय ॥
कूककूक-कर नाम जप, छुटै सात अरु पांच ।
जासों मन ठहरा रहै, चरणदास कहैं सांच ॥
सुरत माहि जो जप करै, तन सूं न्यारा जौन ।
मिलै सच्चिदानन्द में, गहे रहै जो मौन ॥
सकल शिरोमणि नामहै, सब धर्मन के माहिं ।
१-अँधेरा ॥
१८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अनन्य¹ भक्त वहि जानिये, सुमिरण भूलै नाहिं ॥
आन धरम मानै नहीं, आन देव नहिं ध्यान ।
ऐसे भक्त अनन्य कूं, कोई पावै जान ॥
पतिव्रता वह जानिये, आज्ञा करै न भंग ।
पिय अपने के रँग रतौ, और न सून ढंग ॥
अपने पियकूं सेइये, आन पुरुष तजिदेह ।
परघर नेह निवारिये, रहिये अपने गेह ॥
आज्ञाकारी पीव की, रहै पिया के संग ।
तन मनसूं सेवा करै, और न दूजो रंग ॥
रंग होय तौ पीव को, आन पुरुष विषरूप ।
छाहँ बुरी परधर्मकी, अपनी भली जु धूप ॥
अपने घरका दुख भला, परघरका सुख छार ।
ऐसे जानै कुलवधू, सो सतव²न्ती नार ॥
पतिकी ओर निहारिये, औरन से कह काम ।
सबै देवता छोड़करि, जपिये हरिका नाम ॥
खसम तुम्हारो राम है, इत उत झख मत मारि ।
चरणदास यों कहत हैं, यही धारणा धारि ॥
यह शिर नवै तो रामकूं, नाहीं गिरियो टूट ।
आन देव नहिं परसिये, यह तन जावो छूट ॥
पतिव्रता को व्रत गहौ, व्यभिचारिणि अँगटार ।
पति पावै सब दुख नसै, पावै सुख अपार ॥
जब तू जानै पीवही, वह अपनी करि लेहि ।
परमधाम मैं राखि करि, बाँह पकरि सुख देहि ॥
यही सिखाये देतहूँ, धारो हिरदय माहिं ।
१ जो दूसरे को न जानै २ पतिव्रता ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १८६
ऐसा पौधा बोईये, ताकी बैठो छाहिं ॥
सतवादी संतसूं रहो, सतही मुखसूं बोल ।
एक ओर हरिनाम रख, एक ओर जग तोल ॥
सभी निचोरे कहतहूं, भक्ति करो निष्काम ।
कोटि तपस्या यही है, मुखसूं कहिये राम ॥
रामनाम मुखसूं कहै, रामनाम सुन कान ।
रोम रोम हरिकूं रटो, ऐसी गहिये बान ॥
विद्या माहीं वाद है, तपके माहीं ऋद्धि ।
राम नाम में मुक्त है, योगमाहिं यों सिद्धि ॥
ताते त्यागो वासना, राखो रामहिं नाम ।
कोटिबन्ध छुटि जायँगे, पहुँचो हरि के धाम ॥
राम नाम में ये सबै, ऋद्धि सिद्धि अरु मोक्ष ।
ऐसा इष्ट सँभारिये, चरणदास कहि सोच ॥
जाका कीया सब बना, सात द्वीप नवखण्ड ।
चरणदास यों कहत हैं, तीन लोक ब्रह्माण्ड ॥
तवकारण सब कुछ किया, नाना विधि सुख दीन ।
तैं वाकूं जाना नहीं, नाम न कबहूं लीन ॥
अबकै औसर फिरिबन्यो, पाई मानुष देह ।
चरणदास यों कहत हैं, राम नामहीं लेह ॥
राग केदारा ॥
सुनौ भाई नाम की महिमा ।
मुक्ति चारों सिद्धि आठों बसत हैं तहिमा ॥
बालमीकि सो बनके बासी किये थे जिन पाप ।
भयो है सब ऋषिशिरोमणि जपे उलटे जाप ॥
गणिका सी अति महापापी सो पढ़ावत कीर ।
१६० श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
नामके परताप सेती कियो हरिपुर सीर ॥
अजामिल से पतित कामी वेश्यासों रति कीन ।
चढ़ि विमानै गयो सुरपुर नाम सुतहित लीन ॥
और बहुतै पतित तारे गिने कापै जाहिं ।
दान जप तप योग संयम नाम सम तुल नाहिं ॥
व्यास नारद शिव ब्रह्मादिक रटत जाकूं शेष ।
गुरू शुकदेव नाम को चरणदासकूं उपदेश ॥
कवित्त ॥
नामके प्रताप नन्दलाल आप भये प्रभु नामके प्रताप सुत दशरथ को कहायो है ।
नामके प्रताप पैज राखी प्रहलादजूकी नामके प्रताप दौरो द्वारका सूं धायो है ॥
नामके प्रतापकी न महिमा मोपै कहीजात नामके प्रताप सब सन्तन सहायो है ।
सोई नाम वास सब आस लगो चरणदास सोई नाम चारवेद विमल २ गायो है ॥
नामके प्रताप शबरी सुरन तैं सरस करी नामके प्रताप अधम लोककूं पठायो है ।
नामके प्रताप अजामीलकूं विमान आयो नामके प्रताप गज ग्राहसूं छुटायो है ॥
नामके प्रताप सब दीनन को दुख हरो नामको प्रताप शुकदेवजी दृढ़ायो है ।
सोई नाम वास अब आस लगो चरणदास सोई नाम चारवेद विमलं २ गायो है ॥
दो० नामअंगमहिमाअधिक, मोपै कही न जाय ।
पांच प्रेत अब कहत हूं, जाकूं सुनिचितलाय ॥
योग तपस्या भक्ति कूं, ज्ञान बिगाड़न पांच ।
जीवत दुखदै जगत में, मुये नरक दै आंच ॥
काम क्रोध मोह लोभसे, और पांचवां गर्व ।
राज करै वसुधा बिषे, इन वश कीने सर्व ॥
काम बली वर्णन करूं, जिन मारे बलवन्त ।
जाका बकसी नारि है, जीते गुणी महन्त ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६१
राग सोरठ ॥
साधो नारि सबलरे भाई । नहिं मान राम दुहाई ॥
बांदर ज्यों पकरि नचावै । हरिजी सूं नेह छुटावै ॥
दया धर्म सब खोवै । जब नैनकजल भरि जोवै ॥
जिनका चित चोरा रांड़ी । तिनकी जग थू थू भांडी ॥
उन सबही सरवस खोया । नरशीशपकरि करि रोया ॥
जनम पदारथ छीना । स्याही का टीका दीना ॥
दोनों मुखसों खाया । फिर फिरकै गरभ दिखाया ॥
काम कटक में सूरी । वह सांवत कहिये पूरी ॥
बड़े बड़े योधा मारे । अरु बहुतक शूर पछारे ॥
गुरु शुकदेव बतावै । बटमारन तोहिं दिखावै ॥
चरणदास कहे जानौ । तुम छलवल कला पिछानौ ।
नारी ने हरि सुमिरण सूं खोये ।
राजा परजा मुंडत चुंडत नैनकटाक्षन मोहे ॥
राती चूनर चटक मटकले भूषण काजल साधै ।
मुड़ मुसकावै मधुरी वाणी प्यार प्रीतकर बांधै ॥
बहुतनको उन योग छुटाया बहुतनकोतप छीन्हों ।
बहुतनकी उन भक्ति बिगारी अंग विषयरस दीन्हों ॥
बंधुवां करि बहु नाच नचायो फंदा मोह लगायो ।
याते सावधानही रहियो मैं तुमकूं समुझायो ॥
गुरु शुकदेव बतावै साधो निश्चय ठगिनी जानौ ।
चरणदास कहैं हाथ न आवो नीकै ताहि पिछानौ ॥
साधौ परतिरिया सूं डरियो ।
जाके दरश परशके कीये जीवत नरकमें परियो ॥
गौतम घर¹नीसुन्दरि सुनिकै इन्द्रासन तजिआयो ।
१ स्त्री ॥
१६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो गति भई जगत मैं जानी भलो कलंक लगायो ॥
श्रृङ्गी ऋषि वन में तप कीन्हों सुरपति देखि डरायो ।
रंभा¹ भेजि हरो सत जाको सबही तेज सिरायो ॥
दैंयत देवत नर जो हुये नारी देख लुभाये ।
ताको फल ऐसोही पायो अजहूं कुयश सुनाये ॥
चरणदास शुकदेव गुरूने दे उपदेश बचाये ।
यती सती कोइ हाथ न आयो कामी पकरि नचाये ॥
अरे नर परनारी मत तक रे ।
जिन जिन ओर तको डायनकी बहुतन कूं गई भखरे ॥
दूध आक² को पात कटइया झाल अँगनकी जानौ ।
सिंह मुखारे विष कारेको ऐसे ताहि पिछानौ ॥
खोनि नरककी अतिदुख दाई चौरासी भरमावै ।
जनम जनमकूं दाग लगावै हरिगुरु तुरत छुटावै ॥
जगमें फिटिफिटि महिमा खोवै राखै तन मन मैला ।
चरणदास शुकदेव चितावै सुमिरो राम सुहेला ॥
दो० नर नारी सब चेतियो, दीन्हो प्रकट दिखाय ।
परतिरिया परपुरुष हो, भोग नरकको जाय ॥
परनारी कै आपनी, दोनों बुरी बलाय ।
घर बाहर का आग ज्यों, देवै हाथ जलाय ॥
चटक मटक सब छोड़दे, देही रूप बिगार ।
देख न कोई रीझ हैं, ना होवै लगवार ॥
यही ढाल है जत्तकी, लगै न शस्तर काम ।
आठ अंग हैं काम के, तासूं रहु निष्काम ॥
काम कान में आय करि, फिर आवत है नैन ।
बहुरि हिये में आय करि, लगै बहुत दुख दैन ॥
१ अप्सरा २ मदार ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १४३
वह काम बुरारे भाई । सब देवै तन बौराई ॥
पंचों में नाक कटावै । वह जूती मार दिलावै ॥
मुँह काला गधे चढ़ावै । बहुलोग तमाशे आवै ॥
झिड़का ज्यों डोलै कूता । सबही के मन सूं ऊता ॥
कोई नीके मुख नहिं बोलै । शरमिंदा¹ जग में डोलै ॥
वह जीवत नरक मँझारी । सुन चेतौ नर अरु नारी ॥
काम अंग तजि दीजै । सतसंगतिही करि लीजै ॥
कहैं चरणहीं दासा । हरि भक्तन में कर वासा ॥
दो० तन मन जारै कामहीं, चित करै डावांडोल ।
धरम करम सब खोय कै, रहै आप हिय खोल ॥
वह दया क्षमा को मारै । जत सतको पकरि पछारै ॥
शुचि² नेमको दूरि कढ़ाबै । मुख ऊपर धूरि उड़ावै ॥
जग भीतर महिमा खोवै । पापों की माला पोवै ॥
वह धीरज नाहीं राखै । वह मुखसों झूठी भाखै ॥
वह चाल चले विपरीता³ । करि विषय भोगकी चीता ॥
काम बली जहँ आवै । अरु बहुतक औगुण लावै ॥
यह मैनखोट का पूरा । कोइ जीतै गुरुमुख शूरा ॥
साधु भक्ति वह गुनियां । जिन कामदुष्ट को हनियां ॥
चेत कही शुकदेवा । सब चरणदास सुनिलेवा ॥
दो० सुनिकै जो चित में धरै, फेरि चलै वह चाल ।
खांड़ा पकरे शीलका, काम हनै ततकाल ॥
अथ क्रोध अंग ॥
क्रोध महाचण्डाल है, जानत है सब कोय ।
जांके अँग वरणन करूं, सुनियो सुरतिसमोय ॥
- १ लज्जित २ पवित्र ३ उलटी ॥
१६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
रागभैरवँ ॥
क्रोधभूतके चरित सुनाऊं । भिन्न भिन्न पैरगट दिखलाऊं ॥
क्रोध भूत जब तापर आवै । तन मनकी सब सुधि बिसरावै ॥
नैनालाल वदन सब कारो । रोम रोम व्यापै हत्यारो ॥
महाचण्डाल नीच अतिघोरी । अति विपरीत बुद्धि करिऔरी ॥
अपने हाथ आपको मारै । अपने कपड़े आपहि फारै ॥
मुहंड़े १ झाग मरोड़ै हाथा । कहै बहकती फूहड़ बाता ॥
हाफै बहुत आपको गाली । जेंवत आवै पटकै थाली ॥
कबहुँ शस्त्र सों मारन लागै । कवहूं कूंये पड़ने भागै ॥
भली कहै ताहि भोग सुनावै । बुरे भले पर ईंट चलावै ॥
सबल देख शीला हो जावै । निवल देखि बहु दुन्दि मचावै ॥
याका यतन करो मन भावै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
दो० जिहि घट आवै घूमरू, करै बहुतही खुमार ॥
पति खोवै बुद्धिकूं हनै, कहा पुरुष कह नारि ॥
वह बुद्धि भ्रष्ट करि डारै । वह मारहि मार पुकारै ॥
वह सब तन हिंसा छावै । कहिं दया न रहने पावै ॥
वह गुरु से बोलै बेंड़ा । साधों सूं डोलै ऐंडा ॥
वह हरसूं नेह छुटावै । वह नरक माहिं लेजावै ॥
वह आतमघाती जानौ । वह महामूढ़ पहिचानौ ॥
सोंटोंकी मार दिलावै । कबहुँ कै शीश कटावै ॥
वह नीच कमीना कहिये । ऐसे सूं डरता रहिये ॥
वह निकट न आवन दीजै । अरु क्षमा अंकै २ भर लीजै ॥
जब क्षमा आय किया थानौँ ३ । तब सबही क्रोध हिराना ॥
कहैं गुरु शुकदेव खिलारी । सुनु चरणदास उपकारी ॥
१ मुखको कहते हैं २ गोदी ३ मुकाम ॥