भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बुधि विचार करिहारा ज्ञाना । अनभै थकी नाहिं पहिंचाना ॥
आदि न अंत मध्य नहिं जाका । दहिना वावां पीठ न आगा ॥
हरा पीत श्वेत नहिं काला । नारी पुरुष न बूढ़ा बाला ॥
रूप न रंग मिहीं नहिं मोटा । नया पुराना बड़ा न छोटा ॥
नाम रूप किरियासूं न्यारा । नहिं हलका नहिं कहिये भारा ॥
वानी चार परै निरवाना । काहूविधि वह जाय न जाना ॥
पुहुप गंध नादनतैं झीना । गुरु शुकदेव सुनाय जु दीना ॥
दो० कौन लखै को कहि सकै, अचरज अलख अभेव ।
ज्ञान ध्यान पहुँचै नहीं, निर्विकार निर्लेव ॥
सुनत अचम्भा मोकूं आया । जाके बचनरूप नहिं काया १ ॥
निराकार २ नहिं ना आकारा । नहिं अडोल नहिं डोलनहारा ॥
पांचतत्त्व तिरगुण ते आगे । अद्भुत अचरज ध्यान न लागे ॥
नहिं परगट नहिं गूपन ठाऊं । समझसकौंनहिंथकिथकिजाऊं ॥
जैसो आगे मैं कहि आयो । फिर समझौ वैसो नहिं पायो ॥
जो कुछ कहिया नाहीं नाहीं । सो सब देखा वाके माहीं ॥
सकल सर्वदा हां पहिचानी । चरणदास शुकदेव बखानी ॥
दो० वामें गुण अनगिनत हैं, अपरमपार अगाध ।
देखौ परगटही भये, रूप नाम अरु नाद ॥
वृक्ष बीज का नाम बताऊं । भिन्न भिन्न परगट दिखलाऊं ॥
जो कोइ निराबीज कूं बूझै । ताकूं वह निरगुणही सूझै ॥
जब समझै तब सब गुणमाहीं । तामें डाल मूल ३ फल छाहीं ॥
ऐसे पूरणब्रह्म पिछानौ । निराकार निरगुण मत जानौ ॥
वै निरगुण सरगुण ते न्यारे । निरगुण सरगुण नाम विचारै ॥
अकथ कथा कछु कथिय न जाई । जो भाषूं सोई . . मुरखाई ॥
१ शरीर २ जिसका आकार नहीं ३ जड़ ४ जो कहने लायक न हो ॥