भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अनन्य¹ भक्त वहि जानिये, सुमिरण भूलै नाहिं ॥
आन धरम मानै नहीं, आन देव नहिं ध्यान ।
ऐसे भक्त अनन्य कूं, कोई पावै जान ॥
पतिव्रता वह जानिये, आज्ञा करै न भंग ।
पिय अपने के रँग रतौ, और न सून ढंग ॥
अपने पियकूं सेइये, आन पुरुष तजिदेह ।
परघर नेह निवारिये, रहिये अपने गेह ॥
आज्ञाकारी पीव की, रहै पिया के संग ।
तन मनसूं सेवा करै, और न दूजो रंग ॥
रंग होय तौ पीव को, आन पुरुष विषरूप ।
छाहँ बुरी परधर्मकी, अपनी भली जु धूप ॥
अपने घरका दुख भला, परघरका सुख छार ।
ऐसे जानै कुलवधू, सो सतव²न्ती नार ॥
पतिकी ओर निहारिये, औरन से कह काम ।
सबै देवता छोड़करि, जपिये हरिका नाम ॥
खसम तुम्हारो राम है, इत उत झख मत मारि ।
चरणदास यों कहत हैं, यही धारणा धारि ॥
यह शिर नवै तो रामकूं, नाहीं गिरियो टूट ।
आन देव नहिं परसिये, यह तन जावो छूट ॥
पतिव्रता को व्रत गहौ, व्यभिचारिणि अँगटार ।
पति पावै सब दुख नसै, पावै सुख अपार ॥
जब तू जानै पीवही, वह अपनी करि लेहि ।
परमधाम मैं राखि करि, बाँह पकरि सुख देहि ॥
यही सिखाये देतहूँ, धारो हिरदय माहिं ।
१ जो दूसरे को न जानै २ पतिव्रता ॥