भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । १७६
काया मन्दिर आप रमायो । ताते राम नाम धरवायो ॥
देह सँयोग राम कहलायो । चरणदास शुकदेव बतायो ॥
दो० सूरज चींटी आदि दै, लघु दीरघ के माहिं ।
सब में पोइ आतमा, बाहर कोई नाहिं ॥
छोटे भांडे१ में करै, छोटाही परकाश ।
बड़े जु भाँड़े में करै, जेता होय उकाश ॥
ज्ञानवन्त कूं मैं दियो, दीपक को दृष्टान्त ।
जो वह समझ चावसूँ, मिटै तिमिर२ अरु भ्रान्त ॥
जैसेही है पिण्ड में, जैसे ही ब्रह्मण्ड ।
भीतर बाहर रमिरह्यो, सात द्वीप नव खण्ड ॥
आप लखेते वाकूं पावै । जो पै सतगुरु भेद बतावै ॥
ज्ञान दृष्टि सेती दरशावै । आपा मिटै ब्रह्म ठहरावै ॥
ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय जहँ नाहीं । ध्याता ध्यान ध्येय मिटि जाहीं ॥
जबहो एक दूसरा नासे । बन्ध मुकत के रहैं न सांसे ॥
मृतक अवस्था जीवत आवै । करम रहित अस्थिर गति पावै ॥
तब कोइ मिन्तर वैरी नाहीं । पाप पुण्यकी परै न छाहीं ॥
हरष शोक सम होजा दोऊ । रक्षाकरो कि मारो कोऊ ॥
कोऊ हाथ में भोजन देजा । कोउ छीनकर योंहीं लेजा ॥
दोनों एक बराबर वाके । जगव्योहार कछू नहिं जाके ॥
हरि बिन और पिछान न कोई । तिनके इच्छा रही न दोई ॥
ज्ञान दशा ऐसे करि गाई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० ज्ञानदशा आवन कठिन, बिरला जानै कोय ।
ज्ञान दशा जब जानिये, जीवत मृतक होय ॥
वाचक३ ज्ञानी बहुतक देखे । लक्ष४ ज्ञानी कोइ लेखे लेखे ॥
१ बर्त्तनरूपी शरीर २ अँधेरा ३ कहनेवाले ४ हृदयान्तर से देखनेवाले ॥