भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी बाँकी गतिको वार न पार ॥
दो० एक एकसों आगरो, महिमा कही न जाय ।
अनंत रँगीले महल में, आपहि बैठे आय ॥
अनन्त रँगीले महल बनाये । तामें आप रामहीं आये ॥
नांव रूप गुण न्यारे न्यारे । गिनत शारदा गणपति हारे ॥
मन्दिर रूप बहुत छवि सोहै । जहां तहां मेरो मन मोहै ॥
हरे श्वेत पीत अरु लाले । पिसताकी ऊदे अरु काले ॥
बेलदार लहरा छवि बूटे । चीतमताले और तिखूटे ॥
बूंद बूंद अरु गंडे दारे । जानौ चित्तर हाथ सँवारे ॥
रँगा रंग बहु चित्तरकारी । कहूं कहाँलों मों बुधिहारी ॥
दो पाये अरु पुनि चौपाये । बहु पाये कछु कहे न जाये ॥
वृक्षरूप अरु पक्षीनाना । कीट१ पतंगा२ थिर३ चर४ जाना ॥
जलमें मीन५ बहुत परकारे । चरणदास शुकदेव विचारे ॥
दो० थावर जंगम चर अचर, बहुत छबीली भांति ॥
राजस तामससात्विकी, बहु अर्धान वहु क्रांति ॥
बानर नर असुरा सुरा, यक्षगण गन्ध्रब प्रेत ।
सबही महल बराबरी, सबही सेती हेत ॥
खिरकी नैन चावसों खोलै । मुख द्वारे नाना विधि बोलै ॥
बहुत भांति की नाना बानो । चतुर कूड भोली अरु यानी६ ॥
कहिं अबोल नहिं बोलन आवै । पै सब महलन वह दरशाव ॥
साक्षात हरिही कूं जानौ । भवन् भवनमें ताहि पिछानौ ॥
काया क्षेत्र ज्ञानी जानै । क्षेत्रग आतमरूप बखानै ॥
देही क्षर गीता में गायो । अक्षर जीव खोल दिखलायो ॥
१ किरवा २ पाखी ३ न चलनेवाले ४ चलनेवाले ५ मछली ६ न
जाननेवाली ॥