भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो गति भई जगत मैं जानी भलो कलंक लगायो ॥
श्रृङ्गी ऋषि वन में तप कीन्हों सुरपति देखि डरायो ।
रंभा¹ भेजि हरो सत जाको सबही तेज सिरायो ॥
दैंयत देवत नर जो हुये नारी देख लुभाये ।
ताको फल ऐसोही पायो अजहूं कुयश सुनाये ॥
चरणदास शुकदेव गुरूने दे उपदेश बचाये ।
यती सती कोइ हाथ न आयो कामी पकरि नचाये ॥
अरे नर परनारी मत तक रे ।
जिन जिन ओर तको डायनकी बहुतन कूं गई भखरे ॥
दूध आक² को पात कटइया झाल अँगनकी जानौ ।
सिंह मुखारे विष कारेको ऐसे ताहि पिछानौ ॥
खोनि नरककी अतिदुख दाई चौरासी भरमावै ।
जनम जनमकूं दाग लगावै हरिगुरु तुरत छुटावै ॥
जगमें फिटिफिटि महिमा खोवै राखै तन मन मैला ।
चरणदास शुकदेव चितावै सुमिरो राम सुहेला ॥
दो० नर नारी सब चेतियो, दीन्हो प्रकट दिखाय ।
परतिरिया परपुरुष हो, भोग नरकको जाय ॥
परनारी कै आपनी, दोनों बुरी बलाय ।
घर बाहर का आग ज्यों, देवै हाथ जलाय ॥
चटक मटक सब छोड़दे, देही रूप बिगार ।
देख न कोई रीझ हैं, ना होवै लगवार ॥
यही ढाल है जत्तकी, लगै न शस्तर काम ।
आठ अंग हैं काम के, तासूं रहु निष्काम ॥
काम कान में आय करि, फिर आवत है नैन ।
बहुरि हिये में आय करि, लगै बहुत दुख दैन ॥
१ अप्सरा २ मदार ॥