भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । १८३
चरणदासकी श्याम बिन, कौन मिटावै पीर ॥
पीवविना ना जीवना, जगमें भारी जान ।
पिया मिलै तौ जीवना, नहीं तौ छूटै प्रान ॥
मुख पियरो सूखै अधर, आखैं खरी उदास ।
आहिजु निकसै दुख भरी, गहिरे लेत उसास ॥
वह बिरहिनि बौरी भई, जानत ना कोइ भेद ।
अगिनि बरै हियरा जर, भये कलेजे छेद ॥
अपने वश वह ना रही, फँसी बिरह के जाल ।
चरणदास रोवत रहै, सुमिरिसुमिरि गुणख्याल ॥
बातन को बिरहा लगो, ज्यों घुन लागो दारुँ ।
दिन दिन पीरी होतहै, पिया न बूझै सार ॥
वै नहिं बूझैं सारही, बिरहिनिकौन हवाल ।
जब सुधि आवै लालकी, चुभत कलेजे भाल ॥
पीव चहौ कै मत चहौ, वहतौ पीकी 'दास ।
पियके रँगराती रहै, जग सों होय उदास ॥
पीपी करते दिन गया, रैनि गई पिय ध्यान ।
बिरहिनिके सहज सधै, भक्तियोग अरु ज्ञान ॥
बिरहिनि एकैरामबिन, और न कोई मीत ।
आठ पहर साठौ घड़ी, पियामिलनकी चीत ॥
जाप करै तौ पीवका, ध्यान करै तौ पीव ।
पीव बिरहिनिका जीवहै, जीबिरहिनिका पीव ॥
१ ओँठ २ काष्ठ ॥