भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । १८५
कथा कीर्त्तन सों तरै कलियुगही के माहिं ।
शुकदेवकहिचरणदाससों तारौगहिगहिबांहिं ॥
इति श्रीचारौयुगसम्पूर्णम् ॥
अथ नाम अंग वर्णन ॥
दो० प्रणऊं¹ श्री शुकदेव कूं, वाणी कहूँ अगाध ।
महिमा गाऊं नाम की, सबमिलिसुनियोसाध ॥
ज्योंकी त्योंहीं कहत हूँ, कछू न राखूं भेद ।
निश्चय आवै नाम की, छूटै सबही खेद ॥
जनम मरनजम दंड के, गर्भवास की त्रास ।
नाम रटे सबही छुटै, लख चौरासी गाँस ॥
कई बार जो यज्ञ करि, योग करै चितलाय ।
चरणदास कहैं नाम बिन, सभी अफल होजाय ॥
आठ धात मैं गुण नहीं, जो पारस के माहिं ।
तप तीरथ व्रत साधना, राम नाम सम नाहिं ॥
ज्यों सेमर का सेवना, ज्यों लोभी का धर्म्म ।
अन्न बिना भुस कूटना, नाम बिना यों कर्म्म ॥
छोड़ै सबही वासना, हो बैठे निष्काम ।
चरण कमल मैं चित धरै, सुमिरै रामहिं राम ॥
ऐसा हो जब संत हो, तब रीझै करतार ।
दरशन दे अपना करै, कभी न छोड़ै लार ॥
चार वेद² किये ब्यास ने, अर्थ बिचार विचार ।
तामें निकसी भक्तिही, राम नाम ततसार ॥
जिन कहिया शुकदेव कूं, सुनिया प्रेम प्रतीति ।
१ नमस्कार २ ऋगवेद सामवेद यजुर्वेद अथर्वणवेद ॥