भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । १८६
ऐसा पौधा बोईये, ताकी बैठो छाहिं ॥
सतवादी संतसूं रहो, सतही मुखसूं बोल ।
एक ओर हरिनाम रख, एक ओर जग तोल ॥
सभी निचोरे कहतहूं, भक्ति करो निष्काम ।
कोटि तपस्या यही है, मुखसूं कहिये राम ॥
रामनाम मुखसूं कहै, रामनाम सुन कान ।
रोम रोम हरिकूं रटो, ऐसी गहिये बान ॥
विद्या माहीं वाद है, तपके माहीं ऋद्धि ।
राम नाम में मुक्त है, योगमाहिं यों सिद्धि ॥
ताते त्यागो वासना, राखो रामहिं नाम ।
कोटिबन्ध छुटि जायँगे, पहुँचो हरि के धाम ॥
राम नाम में ये सबै, ऋद्धि सिद्धि अरु मोक्ष ।
ऐसा इष्ट सँभारिये, चरणदास कहि सोच ॥
जाका कीया सब बना, सात द्वीप नवखण्ड ।
चरणदास यों कहत हैं, तीन लोक ब्रह्माण्ड ॥
तवकारण सब कुछ किया, नाना विधि सुख दीन ।
तैं वाकूं जाना नहीं, नाम न कबहूं लीन ॥
अबकै औसर फिरिबन्यो, पाई मानुष देह ।
चरणदास यों कहत हैं, राम नामहीं लेह ॥
राग केदारा ॥
सुनौ भाई नाम की महिमा ।
मुक्ति चारों सिद्धि आठों बसत हैं तहिमा ॥
बालमीकि सो बनके बासी किये थे जिन पाप ।
भयो है सब ऋषिशिरोमणि जपे उलटे जाप ॥
गणिका सी अति महापापी सो पढ़ावत कीर ।