भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 221, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तिनजगमेंपरगट कियो, जैसी चहिये रीति ॥
ब्रह्महत्या अरु नारि की, बालक हत्या होय ।
राम नाम जो मन बसै, सब कूं डारै खोय ॥
हियआवत जगदुख टरै, कंठ आय अघ जाय ।
मुख सूं बोलै आयकरि, ताकी कौन चलाय ॥
ऐसाही हरि नामहीं, मोहि रामकी सौहिं ।
जाकूं होवै परखही, सो समझैहां लौहिं ॥
बिन समझे पातक नशै, समझ जपै हो मुक्त ।
चरणदास यों कहत हैं, जो कोइ जानै युक्त ॥
नामहिं लैजल पीजिये, नामहिं लेकर खाह ।
नामहिं लेकर बैठिये, नामहिं लै चल राह ॥
जबलग जागैराम कहु, तन मन सूं यहिचीत ।
चरणदास यों कहत है, हरिविन और न मीत ॥
तेरा तौ कोइ है नहीं, मात पिता सुत नार ।
ताते सुमिरौ राम कूं, हे मन वारंबार ॥
जिहिकारण भटकतफिरै, घरघर करत सलाम ।
तेरे तौ वैहैं नहीं, ये मन सुमिरौ राम ॥
जीवतही स्वारथ लगै, मूये देह जराय ।
ऐ मन सुमिरौ राम कूं, धोखे काहि पराय ॥
हाथी घोड़े धन घना, चंदमुखी बहु नार ।
नाम बिना यमलोक में, पावे - दुःख अपार ॥
जबलग जीवै राम कहु, रामहिं सेती नेह ।
जीव मिलैगो राम में, पड़ी रहैगी देह ॥
अचरज साधन नामका, भक्तियोग का जीव ।
जैसे दूध जमाय कै, मथिकरिकाढ़ा घीव ॥