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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 690 में से

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पृष्ठ 226

भक्तिपदार्थवर्णन । १६१
राग सोरठ ॥
साधो नारि सबलरे भाई । नहिं मान राम दुहाई ॥
बांदर ज्यों पकरि नचावै । हरिजी सूं नेह छुटावै ॥
दया धर्म सब खोवै । जब नैनकजल भरि जोवै ॥
जिनका चित चोरा रांड़ी । तिनकी जग थू थू भांडी ॥
उन सबही सरवस खोया । नरशीशपकरि करि रोया ॥
जनम पदारथ छीना । स्याही का टीका दीना ॥
दोनों मुखसों खाया । फिर फिरकै गरभ दिखाया ॥
काम कटक में सूरी । वह सांवत कहिये पूरी ॥
बड़े बड़े योधा मारे । अरु बहुतक शूर पछारे ॥
गुरु शुकदेव बतावै । बटमारन तोहिं दिखावै ॥
चरणदास कहे जानौ । तुम छलवल कला पिछानौ ।
नारी ने हरि सुमिरण सूं खोये ।
राजा परजा मुंडत चुंडत नैनकटाक्षन मोहे ॥
राती चूनर चटक मटकले भूषण काजल साधै ।
मुड़ मुसकावै मधुरी वाणी प्यार प्रीतकर बांधै ॥
बहुतनको उन योग छुटाया बहुतनकोतप छीन्हों ।
बहुतनकी उन भक्ति बिगारी अंग विषयरस दीन्हों ॥
बंधुवां करि बहु नाच नचायो फंदा मोह लगायो ।
याते सावधानही रहियो मैं तुमकूं समुझायो ॥
गुरु शुकदेव बतावै साधो निश्चय ठगिनी जानौ ।
चरणदास कहैं हाथ न आवो नीकै ताहि पिछानौ ॥
साधौ परतिरिया सूं डरियो ।
जाके दरश परशके कीये जीवत नरकमें परियो ॥
गौतम घर¹नीसुन्दरि सुनिकै इन्द्रासन तजिआयो ।
१ स्त्री ॥