भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
नामके परताप सेती कियो हरिपुर सीर ॥
अजामिल से पतित कामी वेश्यासों रति कीन ।
चढ़ि विमानै गयो सुरपुर नाम सुतहित लीन ॥
और बहुतै पतित तारे गिने कापै जाहिं ।
दान जप तप योग संयम नाम सम तुल नाहिं ॥
व्यास नारद शिव ब्रह्मादिक रटत जाकूं शेष ।
गुरू शुकदेव नाम को चरणदासकूं उपदेश ॥
कवित्त ॥
नामके प्रताप नन्दलाल आप भये प्रभु नामके प्रताप सुत दशरथ को कहायो है ।
नामके प्रताप पैज राखी प्रहलादजूकी नामके प्रताप दौरो द्वारका सूं धायो है ॥
नामके प्रतापकी न महिमा मोपै कहीजात नामके प्रताप सब सन्तन सहायो है ।
सोई नाम वास सब आस लगो चरणदास सोई नाम चारवेद विमल २ गायो है ॥
नामके प्रताप शबरी सुरन तैं सरस करी नामके प्रताप अधम लोककूं पठायो है ।
नामके प्रताप अजामीलकूं विमान आयो नामके प्रताप गज ग्राहसूं छुटायो है ॥
नामके प्रताप सब दीनन को दुख हरो नामको प्रताप शुकदेवजी दृढ़ायो है ।
सोई नाम वास अब आस लगो चरणदास सोई नाम चारवेद विमलं २ गायो है ॥
दो० नामअंगमहिमाअधिक, मोपै कही न जाय ।
पांच प्रेत अब कहत हूं, जाकूं सुनिचितलाय ॥
योग तपस्या भक्ति कूं, ज्ञान बिगाड़न पांच ।
जीवत दुखदै जगत में, मुये नरक दै आंच ॥
काम क्रोध मोह लोभसे, और पांचवां गर्व ।
राज करै वसुधा बिषे, इन वश कीने सर्व ॥
काम बली वर्णन करूं, जिन मारे बलवन्त ।
जाका बकसी नारि है, जीते गुणी महन्त ॥