भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । १८७
कुंडलिया ॥
आठ मास मुखसूं जपै सोलह मास कँठ जाप ।
बत्तिस मास हिरदै जपै तनमें रहै न पाप ॥
तनमें रहै न पाप भक्ति का उपजै पौधा ।
मन रुकजावै जहां अपरबल कहिये योधा ॥
शुकदेव कही चरणदास सूं यही भेद ततसार ।
बहुरु आवै नाभिमें ताका कहूं विचार ॥
दो० पांच बरष जप नाभिसों, रग रग बोलै राम ।
देह जीव निज भक्तहो, पहुँचै हरिके धाम ॥
त्रिकुटी में जप रामकूं, जहां उजाला होय ।
श्वासा माहीं जपेते, द्विविधा रहै न कोय ॥
गगन मँडलमें जापकरि, जितहै दशवांद्वार ।
चरणदास यों कहत हैं, सो पहुँचै हरिदरबार ॥
नासा अग्रे जापकरि, देखै नूर अगाध ।
बहुतक अचरज अरुखुलै, चरणदास कहेसाध ॥
नाम उठाकर नाभिसूं, गगन माहिं लैजाय ।
जहां होय परकाशही, शुकदेव दिया बताय ॥
मनही मनमें जापकरि, दरपण उज्ज्वल होय ।
दरशन होवै रामका, तिमिर¹ जाय सबखोय ॥
कूककूक-कर नाम जप, छुटै सात अरु पांच ।
जासों मन ठहरा रहै, चरणदास कहैं सांच ॥
सुरत माहि जो जप करै, तन सूं न्यारा जौन ।
मिलै सच्चिदानन्द में, गहे रहै जो मौन ॥
सकल शिरोमणि नामहै, सब धर्मन के माहिं ।
१-अँधेरा ॥