भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चारौँयुगवर्णन ॥
कुंडलिया ॥
सत्युग सांचा बोलते परमहंस को ध्यान ।
सतवादी सत रखते सत नहिं देते जान ॥
सत नहिं देते जान प्रान जोपै तजि देही ।
निश्चय होती मुक्ति दरशते राम सनेही ॥
शुकदेव कहि चरणदाससों अवहीं सत्युगजान ।
सत बोलौ सतसों रहो सतकी गहिये आन ॥
त्रेता में तप साधते आसन संयम धार ।
पांचौ इन्द्री रोकते जब मन जाता हार ॥
जब मन जाता हार खैंचि अनहद में धरते ।
कै अपनीही इष्ट ध्यान ताही को करते ॥
आप विसर्जन होय मुक्ति निश्चय करि पाते ।
चरणदास शुकदेव तपस्या चाल दिखाते ॥
द्वापर पूजा बंदना प्रेम सहितजो होय ।
कहा राजसी मानसी पूजा कहिये दोय ॥
पूजा कहिये दोय जैसि जाके मन भावै ।
धरै नेम आचार अंत ना चित्त डुलावै ॥
हित करि पूजा कीजिये द्वापर को यह भेव ।
चरणदास निश्चय करौ कहिया श्रीशुकदेव ॥
कलियुग हरि गुण गाइये गुणावादही सार ।
भजनकरो मन मगन ह्वै भय अरु सकुच निवार ॥
भय अरु सकुचनिवार जाति कुल गर्व बहावो ।
साज बाज लै संग रामको गाय रिझावो ॥