भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ज्ञानी बिगड़ै विषयी होई । कथै एक अरु चालै दोई ॥
बुरे करम औगुण चितलावै । भले करम गुण सब बिसरावै ॥
विषय वासना के रँगरातो । झूठ कपटछलबल मदमातो ॥
इन्द्री वश मन हाथ न आवै । पाप करन सों नाहिं डरावै ॥
ज्ञानकथै अरु वाद बढ़ावै । रहन गहन का भेद न पावै ॥
ब्रह्मब्रत्त का आवन भारी । चरणदास शुकदेव बिचारी ॥
दो० उनतीसौ लक्षण लिये, भक्त सहत हो ज्ञान ।
ज्ञान दशा जब आय है, करै आतमा ध्यान ॥
भक्तदशा अब कहत हौं, बिसरै आपा आप ।
चरणदास यों कहत हैं, छूटैं तीनों ताप१ ॥
अष्टपदी ॥
नवधा भक्ति सँभारि अंग नौ जानिले ।
शरवण चितवन और कीर्त्तन मानिले ॥
सुमिरण बन्दन ध्यान और पूजा करो ।
प्रभुसों प्रीति लगाय सुरति चरणन धरो ॥
होकरि दासहि भाव साध संगति रलो ।
भक्तन की कर सेव यही मत है भलो ॥
आपा अर्पण देय धीर्य्य दृढ़ता गहौ ।
क्षमा शील सन्तोष दया धारे रहौ ॥
यह जो मैंने कहा वेद का फूल है ।
योग ज्ञान वैराग्य संबन का मूल है ॥
प्रेम भक्ति का तात पात तीनों१ नसैं ।
अर्थ धर्म काम मोक्षसकल तामें बसैं ॥
जो राखै मंन माहिं विवेक विचारसों ।
१ दैहिक दैविक भौतिक ॥