भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
रागभैरवँ ॥
क्रोधभूतके चरित सुनाऊं । भिन्न भिन्न पैरगट दिखलाऊं ॥
क्रोध भूत जब तापर आवै । तन मनकी सब सुधि बिसरावै ॥
नैनालाल वदन सब कारो । रोम रोम व्यापै हत्यारो ॥
महाचण्डाल नीच अतिघोरी । अति विपरीत बुद्धि करिऔरी ॥
अपने हाथ आपको मारै । अपने कपड़े आपहि फारै ॥
मुहंड़े १ झाग मरोड़ै हाथा । कहै बहकती फूहड़ बाता ॥
हाफै बहुत आपको गाली । जेंवत आवै पटकै थाली ॥
कबहुँ शस्त्र सों मारन लागै । कवहूं कूंये पड़ने भागै ॥
भली कहै ताहि भोग सुनावै । बुरे भले पर ईंट चलावै ॥
सबल देख शीला हो जावै । निवल देखि बहु दुन्दि मचावै ॥
याका यतन करो मन भावै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
दो० जिहि घट आवै घूमरू, करै बहुतही खुमार ॥
पति खोवै बुद्धिकूं हनै, कहा पुरुष कह नारि ॥
वह बुद्धि भ्रष्ट करि डारै । वह मारहि मार पुकारै ॥
वह सब तन हिंसा छावै । कहिं दया न रहने पावै ॥
वह गुरु से बोलै बेंड़ा । साधों सूं डोलै ऐंडा ॥
वह हरसूं नेह छुटावै । वह नरक माहिं लेजावै ॥
वह आतमघाती जानौ । वह महामूढ़ पहिचानौ ॥
सोंटोंकी मार दिलावै । कबहुँ कै शीश कटावै ॥
वह नीच कमीना कहिये । ऐसे सूं डरता रहिये ॥
वह निकट न आवन दीजै । अरु क्षमा अंकै २ भर लीजै ॥
जब क्षमा आय किया थानौँ ३ । तब सबही क्रोध हिराना ॥
कहैं गुरु शुकदेव खिलारी । सुनु चरणदास उपकारी ॥
१ मुखको कहते हैं २ गोदी ३ मुकाम ॥