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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 690 में से

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पृष्ठ 212

भक्तिपदार्थवर्णन । १७७
कोई कहौ सुनौ मन आनौ । वैसा नहिं निश्चय करि जानौ ॥
बड़बड़ ऋषि मुनि पण्डित भारे । चरणदास सब खोजत हारे ॥
दो० वहि निरगुंण सरगुंण वही, वहि दोनों से न्यार ।
जो था सो जाना नहीं, शोचा वारंवार ॥
अनंत¹ शक्ति लीला अनंत, गुण अनंत बहुभाव ।
कौतुक रूप अनंत हैं, चरणदास बलिजाव ॥
नाम भेद किरिया अनंत, अनंत धरे अवतार ।
बीस चार तिनमें अधिक, कहै शुकदेव विचार ॥
राम कृष्ण पूरण कला, चौबीसौ में दोय ।
निरगुण से सरगुण वही, भक्तों कारण होय ॥
रागबिलावल ॥
अलख² निरंजन अगम अपार ।
एक अनेक भेष बहु कीन्हे सुन्दर रचना रची सँवार ॥
निरगुण हरि सरगुण हो खेलौ अचरज लीला करि विस्तार
अपनो चरित आपही देखै ऐसो अद्भुत कौतुकधार ॥
रूप बराह पकरि हिरण्याक्षहि धरती लाये ताहि संहार ।
यज्ञपुरुष अरु दत्तात्रेयी अरु श्रीबद्रीपति हि विचार ॥
सनत्कुमार ऋषभदेव ध्रुव बर पृथू मच्छ कूर्म उदार ।
हयग्रीवा अरु हंसरूप ही महाबली नरसिंह बलधार ॥
हरि परगट ह्वै गजै छुटायौ बामन कपिल सरस गुणसार ।
मन्वन्तर धन्वतर प्रगटे परशुराम रामचन्द्र मुरार ॥
पूरण कला ईश तिहुंपुर को कृष्ण प्रगट हो कंस पछार ।
वेदव्यास अरु बोध कलंकी ये भये सब चौबीस अवतार ॥
युग युग माहिं आप परगट ह्वै दुष्ट दलन सन्तन रखवार ।
१ जिसका अन्त नहीं २ जो देखि न परै ॥