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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 690 में से

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पृष्ठ 210

· भक्तिपदार्थवर्णन । १७५
चरणदास शुकदेव जनावै। सांचे गुणावाद जो गावै॥
दो० यह अस्तुति करतार की, जिन रचिया संसार।
अद्भुत कौतुक१ करि रह्यो, लीला अगम अपार ॥
उपजावै पालै विनशावै। अनगिन चन्द सूर दरशावै॥
कोटिक अंड पलकमें करै। जब चाहै जब कुछना रहै॥
जब फैले तब रूप अनेका। जब समिटै जब एकहि एका॥
बटक बीज का खेल निहारा। एक बीजका सकल पसारा॥
तामें बीज अनंतहि देखा। गिनूं कहांलों रहा न लेखा॥
ऐसे हरि आपा विस्तारा। कहत सुनत देखतहूँ हारा॥
अपरमपार पार नहिं पाऊं। अस्तुति करता मैं सकुचाऊं॥
समझिसमझि मनमें रहिजाऊं। चरणदास हो शीश नवाऊं॥
दो० लीला सिन्धु अगाधगति, मोपै कही न जाय।
चरणदास यों कहत है, सोचत गयो हिराय ॥
कोटिक ब्रह्मा अस्तुति करहीं। वेद कहत प्रभु परे परेहीं॥
कोटिक शम्भू करें समाधा। जानि परै नहिं रूप अगाधा ॥
कोटिक नारद से यश गावैं। गुण अगाध२ कछु अंत न पावैं ॥
कोटिक ध्यानी ध्यान लगावैं। हरिके सो कछु रूप न पावैं ॥
ज्ञानी कोटिक कथैं वह ज्ञाना। समझ थकी उनहूं नहिंजाना ॥
कोटिक शारद करें बिचारा। बुद्धि थकी जब कहा अपारा ॥
सुरनरमुनिवा भेद न लहिया। शोचिशोचिबकिबकिथकिरहिया॥
निरगुण सरगुण कहा न जावै। चरणदास शुकदेव सुनावै॥
दो० चरणदास वा रूप की, पटतर३ दई न जाहि।
राम सरीखे राम हैं, और बतावों काहि॥
वाकी अस्तुति कहा बखानूं। जैसा वह जैसा नहिं जानूं॥
१ तमाशा २ जिसका थाह न हो ३ बराबरी ॥
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