भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 217, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें:१८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
किसी भक्त हिये प्रेमजु जागे । तौ हरि दरशत रहै जु आगे ॥
प्रेमहिंसूं जग कूं उपजावै । निरगुन सरगुन हो हो आवै ॥
सकल शिरोमणि प्रेमहि जानौ । चरणदास निहचै मन आनौ ॥
दो० प्रेम बराबर योग ना, प्रेम बराबर ज्ञान ।
प्रेम भक्तिविन साधुवा, सबही थोथा ध्यान ॥
प्रेम छुटावै जगतकूं, प्रेम मिलावै राम ।
प्रेम करै गति औरही, लै पहुँचे हरिधाम ॥
अष्टपदी ॥
वह करै काग सूं हंसा । एकरहै पिया का संसा ॥
वह जात वरन कुल खोवै । अरु बीज बिरह का बोवै ॥
जो प्रेम तनक चित आवै । वह औगुण सबै नशावै ॥
प्रेमलता जब लहरै । मन बिना योगही ठहरै ॥
कोई चतुर खिलारी खेलै । वह प्रेम पियाला झेलै ॥
जो धड़ पै शीश न राखै । सोई प्रेम पियाला चाखै ॥
तन मन सूं जा बौराई । वह रहै ध्यान लौलाई ॥
वह पहुँचे हरिके पासा । यों कहैं चरण ही दासा ॥
दो० प्रेमीजन हरि आपहो, आपा निकसै नाहिं ।
गुरु शुकदेव दिखावई, समझ देखि मनमाहिं ॥
हिरदे माहीं प्रेम जो, नैनौं झलकै आय ।
सोइ छका हरिरस पगा, वा पग परसो धाय ॥
गदगद वाणी कंठमें, आंसू टपकैं नैन ।
वहतौ बिरहिनि रामकी, तलफत है दिनरैन ॥
हाय हाय करि कब मिलैं, छाती फाटी जाय ।
ऐसा दिन कब होंयगा, दरशन करैं अघाय ॥
बिन दरशन कल ना पडै, मनुआँ धरै न धीर ।