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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७५
कुम्भक राखै सबतन माहीं । ढीला गात रमावै ह्वाहीँ ॥
नासा सेती रेचक कीजै । एकमास सिधिहो सुखलीजै ॥
पीजै पवन जीभको मोड़े । सहजै छोड़ै नासा ओड़े ॥
दोनों रंध्रसे तजि दीजै । यों अभ्यास पूर करलीजै ॥
ताप तिली गोला ज्वर होई । वाके तनमें रहै न कोई ॥
देह पुरानी नूतन होय । तीनि वरष साधै जो कोय ॥
जैसे सांप केंचुली भौंहिं । श्वेत बाल तजि काले होहिं ॥
काहू भांतिका दुख नहिं व्यापै । भूख प्यास तिसभाजै आपै ॥
अथ भस्त्रिका ॥
दो० अबकहूँकुम्भकभस्त्रिका, पित कफ वायु नशाय ॥
अगिनि बढ़ै अभ्याससों, तीनि गांठि खुलिजाय ॥
आसनपद्म सुयाविधि करै । बामजंघ दहिनो पग धरै ॥
बावों पग दहिनी पर लावै । जांघनसों दोउहाथ मिलावै ॥
ग्रीवा पेट बराबर राखै । आगे सुनु शुकदेवा भाखै ॥
मुख मूदै रेचै नासासूं । पूरक चपल करै श्वासासूं ॥
रेचक पूरक ऐसे कीजै । वारंवार तजै अरु लीजै ॥
जैसे खाल लोहारा भरै । रेचक पूरक आतुर करै ॥
करत करत जबहिं थकिजावै । नेक ठहरि दूजी विधि लावै ॥
फिरि पूरक सूरजसों करै । पवन उदरके माहीं भरै ॥
तर्जनि अँगुली सों दृढ़ रोकै । नासामध्य धारकरि जोखै ॥
दो० कुम्भक पिछली भांतिकरि, रेच इड़ासों वाय ।
कफ पित वायु नशायकै, लेवै अग्नि बढ़ाय ॥
कुण्डलिनी देवैजगा, यह कुम्भक सुखदाय ।
करै जुहित व्रत धारिकै, चरणदास चितलाय ॥
कुण्डलिनी सरकायकै, बेधै तीनों गांठ ।

७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसी पँचवीं भस्त्रिका, रहै न कोई आंठ ॥
ब्रह्मनाड़िका के छिद्र माहीं। रोंकिरही मुखदेरहि ह्नाहीं ॥
लाय लपेटै नाभी ठाहीं। दृढ़है बैठी सरकै नाहीं ॥
सवा बिलस्त कि जाकीदेही। तामें अस्थित जीव सनेही ॥
शक्ति नांगिनी यही जु कहिये। याके भेद गुरूंसों लहिये ॥
महा अपरबल जागै नाहीं। ताते नर सब मरिमरि जाहीं ॥
कोइ इक योगी ताहि डुलावै। सुपमन बाट गगन लैजावै ॥
ब्रह्मरंध्र में जाय समावै। लगै समाधि बहुत सुखपावै ॥
जो कछु होय सो कहा न जावै। चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० शिव शक्ति भेलाभ वय, रहै न द्वितिया भाव ।
कुण्डलिनी परबोधका, जो कोइ करै उपाव ॥
शिष्यवचन ॥
व्यास पुत्र शुकदेवजी, किरिपाकरी दयाल ।
चरणदास आधीनही, समझो भयो निहाल ॥
एकबार फिरि खोलिकै, कुण्डलिनी समुझाव ।
याके सबही भेद को, सुनबेको अतिचाव ॥
गुरुवचन ॥
फिरभी तोसों कहतहौं, कुण्डलिनी विस्तार ।
ताके सगरे भेदही, सुनिकै हियमें धार ॥
नाभिस्थान नागिनि रहै, कुण्डल शशी अकार ।
प्राण पियारा वही है, आगे सुनो विचार ॥
कुंभक कर्म कोई करै, देवै शक्ति जगाय ।
जैसे लागी लष्टिका, नागन शीश उठाय ॥
सीखी गुरूंसों कुंभक साधै। नीकी विधि ताको अवराधै

पवन ठवकलग ताहि जगावै । तब ऊरध¹ को शीश उठावै ॥
नाभि ठौर ताका है वासा । पद्मराग मणि ज्यों परकासा ॥
सात लपेटे बाई जानौ । ताते शक्र कुण्डली मानौ ॥
नाड़ी सहस लगी हैं वाको । सोपर छुटी जानिको ताको ॥
जिनमें तीन नारि अधिकाई । इड़ा पिंगला सुषमन गाई ॥
तिनके माहिं शिरोमणिसुषमन । नालकमल जानतयोगी जन ॥
जायपहुंचि ब्रह्मरंधर ताहीं । ऊरध कमल सातवें माहीं ॥
आवन जोन पवन की बाटा । सकत चढ़न ऊरधका घाटा ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । आगे कहूं जुहो परकासा ॥
दो० नागिनि सूक्ष्म जानिये, बाल सहस वा भाग ।
शुकदेव कहैं अँकारही, रक्त बरण ज्यों नाग ॥
कुंभक हो अत्यन्त जब, तब ऊरधको जाय ।
ब्रह्मरंध्र में आयकर, घड़ी दोय ठहराय ।
अमृत का करि पानही, पूरण हो अभ्यास ।
उड़ते देखै सिद्धि तब, वाको माहिं अकास ॥
पै देखत है नैन विनाहीं । चहै करै लीला उन माहीं ॥
खेचर मिलि खेचर है जावै । यह भी शक्ति उड़नकी पावै ॥
अधिकी ठहरै लगै समाधा । यह तौ कहिये खेल अगाधा ॥
शिवशक्ती जहाँ मेला होई । होय लीन मन उनमन सोई ॥
योग युक्ति करि याको पावै । परासक्त अपने बल लावै ॥
चाहै अर्द्ध ठौर लैआवै । जब चाहै ऊरध लैजावै ॥
कबहूं हिरदयके मधि आनै । याही को आपनपौ जानै ॥
इच्छा करै सिद्धि की जैसी । होय प्राप्त सो वेगिहि तैसी ॥
चहै अस्थूल सूक्ष्म तन धारूं । वैसाही होय जाय सबारूं ॥


१ ऊपर ॥

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति सटीक लिप्यंतरण (transcription) प्रस्तुत है:

कहि शुकदेव सुन चरणहिंदासै। जो कुंडलिनी हृदयप्रकासै ॥
दो० कुण्डलिनी परकाशही, भौंरा एक अनूप ।
सोउ प्रकाशत है तहां, सुवरण कोसो रूप ॥
हिरदयमें उजियारही, होत चपल यहि भांति।
जैसे धूमर मेघमें, बिजलीही दमकाति ॥
कहि शुकदेव चरणदास बताऊं। और अनूठी सिद्धि सुनाऊं ॥
चाहै परदेही में बरूं। अपनी कायाको परिहरूूं ॥
रेकच प्राणायाम प्रतापै। कुण्डलिनी जो अपनी आपै ॥
रेचक किये बाहरे आवै। परकायामें जाय समावै ॥
अस्थिर होय जाय ज्यों जानो। सदा विराजत ऐसे मानो ॥
ऐसे पहिली देह गिरावै। ज्यों मणिको डोरा ,तजिजावै ॥
जब चाहै अपने घट माहीं। परासक्तही आवै छाही ॥
काया पलट कहत है याको। कोइक योगी जानत ताको ॥
दो० चाहै तनको छोड़ करि, देह कलप धरि और ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७६

अथ मूर्च्छा ॥
सतवीं कुम्भक मूरछा, पूरक ऐसे होय ।
खैंचत होवै सोरसा, मेघधार ज्यों जोय ॥
बन्ध जलन्धर दीजिये, सहज कण्ठ तल ताज ।
रेचित वाई मूरछित, होय यही पहिंचान ॥
सुखदायी सुखवृधि करन, कही सोइ शुकदेव ।
केवल कुम्भक आठवीं, गुरुसों पावै भेव ॥
पूरक रेचकही सहित, ये कुम्भक करि लेहि ।
केवल कुम्भकनामधै, जबलग ह्यां चित देहि ॥
केवल कुम्भक आशधरि, येहू साधत लोग ।
बलपावै वशपौन हो, और भजैं तन रोग ॥
अथ केवल कुम्भक ॥
आयु बढ़ावै सिद्धिदे, लागै और समाधि ।
केवल कुम्भक गुण भरी, बिन परमाण अगाधि ॥
केवल कुम्भक जब सधै, तब ये सब रहि जाहिं ।
जैसे सूरज उद्यते, तारे सब लुकि जाहिं ॥
केवल कुम्भक योग में, ज्यों नगरी में भूप ।
रेचक पूरक के विना, जैसे बँधा जु कूप ॥
सो तुम सों पहिले कही, विधिगति सब समुझाय ।
सो सुनि तुम हिरदयधरी, देहौना बिसराय ॥
प्राणायाम बड़ातप सोई । प्राणायाम सों बल नहिं कोई ॥
प्राण वायुको यह वश लावै । मनको निश्चल करि ठहरावै ॥
आयुर्दायको यही बढ़ावै । तनमें रोग रहन नहिं पावै ॥
पाप जलावै निर्मल करै । उपजै ज्ञान तिमिर सब हरै ॥
योग युक्ति की जड़ यह जानो । याहि टेकगहि करना ठानो ॥

८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
अड़ि आसनसों याको कीजै। नवो द्वार पटनीके दीजै॥
पांचौ इन्द्रीके रस पेलौ। इड़ा पिंगला सुपमन खेलौ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा। प्रत्याहार सुनि विषै निरासा॥
इति चौथाप्राणायामअंग सम्पूर्णम् ॥
अथ पांचवां प्रत्याहारअंग वर्णन॥
दो०-प्रत्याहार जो पांचवां, समझाऊं चर्णदास।
शुकदेव कहकहूँ खोलकरि, नीके समझौ तास॥
प्रत्याहार पांचवां कहिये। सो योगीको निश्चय चहिये॥
विषय ओर इन्द्री जो जावै। अपने स्वादन को ललचावै॥
तिनकी ओर न जाने देई। प्रत्याहार कहावै एई॥
रोंकिरोंकि इन्द्रिनको लावै। ध्यान आतमा माहिं लगावै॥
जैसे कछुआ अंग समेटै। रंक शीतकाला में लेटै॥
जैसे माता पूत खिलावै। बालक वस्तू कों ललचावै॥
सरप आग अरु शस्तर कोई। कछू और दुखदायी होई॥
तिनको बालक नाहीं जानै। पकड़नको दौड़ै मन आनै॥
दो०-बालक जानत है नहीं, दुखदायी सब एह।
जो पकरूंगा हाथ से, दुख पावैगी देह॥
माता जानत है सबै, खोंटी खरी विकार।
राखै सुतको खैंचिकरि, वारंवार निहार॥
ऐसेही बुधि ज्ञान सों, पांचौ इन्द्री रोक।
विषय ओरसों फेरिये, लहै न अपना भोग॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८१
ज्यों ज्यों इनको भोगदै, परबल हाती जाहिं ।
विना भोग होहीं नहीं, वह बल रहै जुनाहिं ॥
नैन जु भोगैं रूप को, और गन्ध को घ्रान ।
षटरस भोगै जीभही, शब्दहि भोगै कान ॥
त्वचा भोगि अस्पर्शको, बाढ़ै अधिक विकार ।
पांचौ इन्द्री जानिले, इनका यही अहार ॥
इनसेमिलिमिलि मनबिगड़ि, होयगया कछुऔर ।
इन्द्री रोकै मन रुकै, रहै जु अपनी ठौर ॥
ज्यों ज्यो होवै प्राणवश, त्यों त्यों मनवश होय ।
ज्यों ज्यों इन्द्री थिररहें, विषयजाय सब खोय ॥
ताते प्राणायाम करि, प्राणायामहिं सार ।
पहिले प्राणायामकर, पीछे प्रत्याहार ॥
इति प्रत्याहारअंगसम्पूर्णम् ॥
अथ षष्ठधारणाअंग वर्णन ॥
दो० तत्त्वनकी कहुँ धारणा, तिनमें करै प्रवेश ।
शनैःशनैः साधिकरि, पहुँचे निर्भयदेश ॥
पहिले भूमि धारणा कीजै । ठौर कालजेमें चितदीजै ॥
पीतवरण चौकोर अकारो । विधि दैवत है तहां विचारो ॥
प्राण लीनकरि पांचघड़ीहीं । चित अस्थिर होवैगा जबहीं ॥
यासों पृथिवीको वश करिये । यही धारणा जो चित धरिये ॥
हिरदै से ऊपर जल जानो । कण्ठतईं ताको पहिंचानो ॥

८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चन्दफांक अरु श्वेत अकारो । हृषीकेश तहँ देव निहारो ॥
ह्यां हूं पांच घरी अस्थापै । प्राणलीन करि चितदै आपै ॥
व्यापैना विष काहू विधिको । शुकदेवकहैंफलजलकेसिधिको ॥
दो० कण्ठसे ऊपर तालुका, लो पावक अस्थान ।
लालरंग तिरकोन है, रुद्र देवता मान ॥
तहां लीन करि प्राणको, पांच घड़ी परमान ।
भय व्यापै नहिं ज्वालको, अग्निधारणा जान ॥
जाके आगे वायु है, भृकुटीलौं मर्य्याद ।
मेघ बरण षटकोन है, ईश्वर देवत साध ॥
प्राणलीन तहँ कीजिये, पांच घड़ी रे तात ।
पैहै खेचर सिद्धिही, तत पदही ह्वै जात ॥
ब्रह्मरंध्र आकाश है, बड़ा जु तत्त्व न माहिं ।
श्याम बरण ब्रह्म देवता, योगी जहां सिराहिं ॥
प्राण लीन घटि पांचकरि, पावै मुक्ति अनूप ।
व्योमतत्त्व की धारणा, जहां छाँह नहिं धूप ॥
पृथ्वी संग लकारही, जल के संग बकार ।
पावक संग रकार है, मारुत संग मकार ॥
पंचम तत्त्व आकाश ही, सब के ऊपर जान ।
अक्षर जहां हकारही, शुकदेव कहै बखान ॥
पहिलिं धारणा थंभनी, दूजी द्रावण होय ।
तीजी दहनी जानिये, चौथी आमनी सोय ॥
पँचवीं नाम जु शंखिनी, इनको लेवो जान ।
शुकदेवा अब कहत है, आगे और विधान ॥
गुरु की प्रथम धारणा लीजै । अपना रूप उन्हीं सा कीजै ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८३
ऐसे ध्यान सभी सुधि पावै । जैसी धारै सो होयजावै ॥
वेगिहि सब साधन सधि आवै । आलस कायरता भजिजावै ॥
लोक परलोक सभी सुख लेवै । जो गुरु को ऐसो व्रत सेवै ॥
दूजे परमातम की धारण । मुक्तिदेन अरु बंध निवारण ॥
धारनसों चित घना लगावै । सिमिटि सभी ओरनसों आवै ॥
जो कछु होय सो आगेहि आगै । टेक पकरि मारग में लागै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । सती शूरमा ज्यों मन लावै ॥
दो० प्राण वायुकी धारणा, परमेश्वर पहिंचान ।
परमातम ह्वै जात है, जोपै रोके प्रान ॥
बारह मात्रा सों चढ़ै, ह्वां तक पहुँचै जाय ।
बारह सै अरु छानवे, कुम्भक में ठहराय ॥
यही धारणा अंग है, शनै शनै कर ध्याव ।
याते दुगुनी ध्यान में, प्राण वायु परचाव ॥
दूजा जानि समाधि लो, ध्यानहिं सेती एहु ।
पांच सहस अरु एकसौ, चौरासी गिनिलेहु ॥
इति धारणांगसम्पूर्णम् ॥
अथ सातवांअंग वर्णन ॥
शिष्यवचन ॥
दो० अंग धारणा का कहा, सो धारा चितमाहिं ।
ध्यान अंग बरणन करौं, मैं रहुँ चरणन छाहिं ॥

८४
श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।

गुरुवचन ॥
चरणदास अब ध्यान सुन, कहूं तोहिं समुझाय ।
कहिशुकदेवसोसुनिसमुझि, करौ ताहि चितलाय ॥
ध्यान जु चारि प्रकार के, कहूं जु उनकी रीत ।
पदस्थ पिंड रूपस्थ है, चौथा रूपातीत ॥
अथ पदस्थध्यान ॥
हिय पदपंकज ध्यानकरि, फिरि करि सारी देह ।
नखशिखलौं छविनिरखिकै, चरणन में चितदेह ॥
कै कुंभकही कीजिये, ह्वां प्रणव का जाप ।
मन निश्चल हो सहजमें, भाजैं त्रैविधि ताप ॥
पदस्थ ध्यान याको कहैं, करै सो जानै भेव ।
पिंडस्थ ध्यान वर्णन करें, खोलि खोलि शुकदेव ॥
अथ पिंडस्थध्यान ॥
ब्रह्म सोई यह पिंड है, यामें करि करि वास ।
कमलन के लखि देवता, लहो परापत तास ॥
सोधे सिगरे पिंडको, षट चक्रहु को ध्यान ।
शोधत शोधत आचढ़ै, भवँर गुफा अस्थान ॥
तिरवेणी संगम बहै, ज्योति जहां दरशाय ।
सातजन्म सुधि होय जब, ध्यान करै मनलाय ॥
आगे कमल हजार दल, सतगुरु ध्यान प्रधान ।
अमृत द्रवे बहिचलै, हंस करै जहँ न्हान ॥
ऊपर तेजहि पुंज है, कोटि भानु परकास ।
शून्य शिखर ताऊपरै, योगी करै विलांस ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८५
अथ रूपस्थध्यान ॥
रूपस्थ ध्यानको भेद सुनि, कीजै मन ठहराय ।
देखै त्रिकुटी मध्य है, निश्चल दृष्टि लगाय ॥
ध्यान किये पहिले जहाँ, अगन फूल दृष्टाय ।
केते द्योसन माहिंहीं, दीप ज्योति प्रकटाय ॥
शनै शनै आगे जहां, दीपमाल दरशाय ।
फिरि तारों की मालसो, दामिनि बहु दमकाय ॥
बहुत चन्द सूरज घने, देखे कोटि अनन्त ।
अणुज्यों करि सूभर भरे, ध्यान माहिं दरशन्त ॥
झिलमिल झिलमिल तेजमय, भासै सब संसार ।
तन मन उपजै सुखघना, आनन्द अधिक अपार ॥
जल अथाह में डूबज्यों, देखै दृष्टि उघार ।
जो दीखै तौ नीरही, दश दिशि अपरम्पार ॥
यही ध्यान प्रत्यक्ष है, गुरू कृपासों होय ।
कहि शुकदेव वर्णदासकरि, तन मन आलस खोय ॥
अथ रूपातीतध्यान ॥
रूपातित शून्यध्यानहिंजानो । शून्यहि को परब्रह्म पिछानो ॥
त्रिकुटी परै शून्य अस्थान । सो वह कहिये पद निर्वान ॥
चिदानन्द ताकी हिय आनो । वाही में मनहीं को सानो ॥
आठपहर जहं चित्त लगावो । याके कीन्हे सों लयपावो ॥
ज्यों अकाश में पक्षी धावै । धावत धावत दृष्टि न आवै ॥
बहुरि अचानक दीखै आई । वह ध्यानी ऐसा ह्वै जाई ॥
इसपरमशून्यकाअधिकीध्याना । सब ध्यानन में है परधाना ॥
सो योगी यह लहै ठिकाना । सायुज्यमुक्तिहोइ जायनिदाना ॥

योगसार एवं अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि)

८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
दो० यासों लगै समाधिही, निद्रा कहिये योग।
ध्याता होवै लीनही, रहै न त्रिपुटी रोग॥
सतवाँ कहाजु ध्यानहीं, अठवीं कहूँ समाधि।
ज्ञान ध्यान जहँ वीसरै, तहां न विद्यावाद॥
इति ध्यानाङ्गसम्पूर्णम्॥
अथ आठवां समाधि अङ्गवर्णन ॥
अष्टपदी छन्द ॥
अठवीं कहूँ समाधि लक्षण वर्णन करूं।
तोको सब समुझाय तेरी दुविधा हरूं॥
जबहीं लगै समाधि योगी आनन्द लहै।
योग भया सिध जानि क्रिया कोइ ना रहै॥
मिलि ध्याता अरु ध्यान एक होव जहां।
दूजारहै न भाव मुक्ति वर्तै जहां॥
निरउपाधि निर्खेद ऐसा वह देश है।
करम भरम अरु धरम नहीं कोइ लेश है॥
आपार है न कोय सकल आशागरै।
चिन्ताका दुख नाहिं वासना सब जरै॥
पंच विषय जहं नाहिं नहीं गुणतीनहीं।
होवै ब्रह्म स्वरूप जीवता क्षीनहीं॥
जाग्रत स्वप्न सुषोप्ति जहां होवै नहीं।
चौथे पद को पाय होय जहँ लीनहीं॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन ८७
ऐसे कहै शुकदेव सुनौ चर्णदासही।
यह निर्द्वन्द्व समाधि करौ जहां वासही॥
दो० जहां कछू गम ना रहे, विद्या वेद न वाद।
ऋधिसिधि मिटि आनंदलहै, ऐसी शून्य समाधि॥
अष्टपदी छन्द॥
तहां किये परवेश रहै न अकारही।
रूप नाम गुण क्रिया यही साकारही॥
पाप पुण्य सुख दुःख जहां नहिं पाइये।
सतमारग कुल धर्म न देत दिखाइये॥
भूख प्यास अरु उष्ण जहां नहिं शीत है।
हर्ष शोक नहिं नेक वैर नहिं प्रीत है॥
इन्द्री मन नहिं रहत गलत है जात है।
सिध साधक गुरु शिष्य न भाव रहात है॥
उडुगन चन्द्र न सूर न दिवस न रात है।
त्वंपद ईश्वर ब्रह्म न जान्यो जात है॥
जैसे जल में नीर क्षीर में क्षीरही।
असि पद में यों जीव नीर में नीरही॥
अहं मिटै मिटि जाय जु आपा थोकही।
ना परमातम आतम बंध न मोषही॥
ऐसे कह शुकदेव यों होय समाधि में।
वैसोही है जाय सोई था आदि में॥
दो० हुता आदि परमात्मा, बिचउठि लगा विकार।
मिलि समाधि निर्मल भवै, लहै रूप ततसार॥
७

८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी छन्द
जहँ आतमदेव अभेव सेव्य नहिं सेवैहै ।
स्वामीजी ह्वां नाहिं पूजा नहिं देव है ॥
नौधा¹ नेम न प्रेम ज्ञान नहिं ध्यान है ॥
जड़ चेतन कछु नाहिं सुरति नहिं ज्ञान है ॥
विधि निषेध नहिं भेद अन्वैवितरेकना ।
निश्चय अरु व्यवहार कछू तामें न ह्वा ॥
उत्तम मध्यम भाव न शुभ ना अशुभहै ।
सिंह सर्प डरनाहिं औ शस्तर कोन मै ॥
पावक दग्ध न करै बहावै जल नहीं ।
ह्वां नहिं पहुँचे काल न ज्वालाहै तहीं ॥
ऐसा भवन समाधि भाग्य सों पाइये ।
तजि कै जक्त उपाधि तहां मठ छाइये ॥
यतन करै लख माहिं और सब भेषही ।
कोटिनमें कोइ होय समाधी एकही ॥
ह्वांतक पहुंचै जाय सोई सिध साध है ।
कहै शुकदेव पुकारि जु 'कठिन समाधि है ॥
दो० भक्ति योग अरु ज्ञान की, त्रैविधि कहूँ समाधि ।
गुरू मिलै तौ सुगमहै, नाहीं कठिन अगाधि ॥
अथ भक्तिसमाधि ॥
सब इंद्रिन को रोंकिकै, करि हरि चरणन ध्यान ।
बुद्धि रहै सुरत रहै, तौ समाधि मत मान ॥
ध्याता बिसरै ध्यान में, ध्यान होय लय ध्येह ।
बुद्धि लीन सुरत न रहै, पद समाधि लखिलेह ॥
१ श्रवण कीर्तन स्मरण पादसेवन अर्चन वंदन दास्य सख्य आत्मनिवेदन ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८६
अथ योगसमाधि ॥
आसन प्राणायाम करि, पवन पंथगहिलेहि ।
षट चक्र को छेद करि, ध्यान शून्य मन देहि ॥
आपा विसरै ध्यान में, रहै सुरति नहिं नाद ।
लीन होय किरिया रहित, लागै योग समाध ॥
अथ ज्ञानसमाधि ॥
जबलग तत्त्व विचारि करि, कहैं एक अरु दोय ।
ब्रह्मव्रत बांधे रहै, ह्वाँलग ध्यानहिं होय ॥
मैं तू यह वह भूलि करि, रहै जू सहज स्वभाव ।
आपा देहि उठाय करि, ज्ञान समाधि लगाय ॥
ज्ञान रहित ज्ञाता रहित, रहित ज्ञेय अरु जान ।
लगी कभी छूटै नहीं, यह समाधि विज्ञान ॥
पूछे आठों अंग तें, योग पंथ की बात ।
शुकदेव कहै तामें चलौ, गुरू कृपा लै साथ ॥
इति समाधिअङ्गसम्पूर्णम् ॥
अथ छहौकर्महठयोग वर्णन ।
शिष्यवचन ॥
दो० अष्टांग योग वर्णन कियो, मोको भई पहिंचान ।
छहौकर्म हठयोग के, बरणौ कृपानिधान ॥

६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
पहिले ये सब साधिये, काया होवै शुद्धि ।
रोग न लागै देह को, उज्ज्वल होवै बुद्धि ॥
अरु साधा षटकर्म बताऊं । तिनके तोंको नाम सुनाऊं ॥
नेती धोती वसती करिये । कुंजर करम रोग सब हरिये ॥
न्योली किये भजै तन बाधा । देखिदेखि जिन गुरु सों साधा ॥
त्राटक कर्म दृष्टि ठहरावै । पलक पलक सों लगन न पावै
अथ नेतीकर्म ॥
कुं० मिही जु सूत मँगाय कै, मोटी बाटै डोर ।
ऊपर मोम रमाय कै, साधै उठकर भोर ॥
साधै उठकर भोर, डेढ़ बालिशत की कीजै ।
ताको सीधी करै, हाथ अपने में लीजै ॥
नासा रंध्र में मेल कर, खींचै अँगुली दोय ।
फेरि विलोवन कीजिये, नेती कहिये सोय ॥
दो० कान नाक अरु दांत को, रोग न व्यापै कोय ।
उज्ज्वल होवै नैनही, नित नेती करि सोय ॥
अथ धोतीकर्म ॥
धोती कर्म यासों कहैं, पट्टी सोलह हाथ ।
कोढ़ अठारह नाभवैं, करै जु नित परभात ॥
कुं० चौड़ी अंगुल चारिकी, मिही वस्त्र की होय ।
जलमें भेय निचोय करि, निगल कंठ सों सोय ॥
निगल कंठ सों सोय, सिरा बाहर रहि जावै ।
फेरि निकालै ताहि, पित्त कफ दोऊ लावै ॥
काया होवै शुद्धही, भजै पित्त कफ रोग ।
शुकदेव कहै धोती करम, साधै योगी लोग ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६१
अथ वर्मस्तीक
तीजे वस्ती कर्महीं, कहौं सुनौ चितलाय ।
क्रिया करै गन्नेसही, कुंजी तहां लगाय ॥
कुंजी तहां लगाय, मूल को धोवन कीजै ।
पसारन संकोच सुरति दै यह करि लीजै ॥
नीर गुदासों खैंच करि, थाँभै उदर मंझार ।
कछू डोल अस बैठकर, फिरि दे ताहि उतार ॥
दो० यही जु वस्ती कर्म है, गुरु बिन पावै नाहिं ।
लिंगगुदा के रोग जो, गर्मी के नशिजाहिं ॥
अथ गजकर्म
गज कर्म याही जानिये, पिये पेट भरि नीर ।
फेरि युक्ति सों काढ़िये, रोग न होय शरीर ॥
अथ न्योलीकर्म
न्योली पदमासन सों करै । दोनों कर घुटनों पर धरै ॥
पेटरु पीठ बराबर होंय । दहने बायें नले बिलोय ॥
मैल पेटमें रहन न पावै । अपान वायु तासों वश आवै ॥
तापतिली अरु गोला शूल । हौन न पावैं नेक न मूल ॥
जो गुरु करिकै ताहि दिखावै । न्यौली कर्म सुगम करि पावै ॥
और उदर के रोग कहावै । सोभी वै रहने नहिं पावै ॥
अथ त्राटककर्म ॥
त्राटक कर्म टकटकों लागै । पलक पलक सों मिलै न ताकै ॥
नन उघारेही नित रहै । होंय दृष्टि थिर शुकदेव कहै ॥
आँख उलटि त्रिकुटीमें आनो । यह भी त्राटक कर्म्म पछानो ॥
जेते ध्यान नैन के होई । चरणदास पूरण हो सोई ॥

६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० कपाल भांति अरु धौंकनी, बाघी शंख पखाल ।
चारि कर्म ये औरहैं, इनहिं छहों के नाल ॥
इति त्राटककर्म ॥
अथ खेचरीमुद्रा ॥
शिष्यवचन
दो० एक बार फिरभी कहौ, मुद्रा पांच दयाल ।
मोसे रंक अधीनपर, होकर बहुत कृपाल ॥
गुरुवचन ॥
अष्टपदी ॥
आगे मुद्रा तोहिं कही समुझाइया ।
फिरभि कहूँ अब खोलि सुनौ वितलाइया ॥
पहिले मुद्राखेचरी को साधन भनूं ।
जैसे आगे करी सबी ऋषि मुनिजनूं ॥
ताते जलके कुरले करि जुबगाइये ।
तापाछे चौबस्त को चूर्ण लाइये ॥
जिह्वा हाथमें पकरि मर्दन छीलनकरै ।
दोहनताननकरै बहुरि दशनन धरै ॥
फिरि करि छीलन ताहि छेदनहिं कीजिये ।
तोतू ज्यों कटिजाय यत्न सोइ लीजिये ॥
ब्रह्मरंध्र को धोयकै मैल निवारिये ।
बायें अँगूठे ऊपर कागको धारिये ॥
सहज सहज सरकायकै आगे लाइये ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६३
यह सब साधन कठिन गुरूसे पाइये ॥
दो अँगुली कूंवीसूं करि मेलना ।
जिह्वा उलटी राख जु नितप्रति खेलना ॥
यह उपाय षट मास करै तजिमानही ।
रसना यों बँधिजाय चढ़ै अस्थानही ॥
दो० चार काज यासूं सरैं, फलदायक बहुभांति ।
योग माहिं बड़ भूपहै,अधिकीजाकीकांति ॥
अष्टपदी ॥
एक जु प्राणायाम जीभसूं कीजिये ।
दूजे बन्ध उड्यान यहीसूं दीजिये ॥
तीजे करि करि ध्यान निरखि जहूँ ज्योतही ।
चौथे अमृत पिवै खुलै तहँ सोतही ॥
खैंचे त्रिकुटी पाट सहज अरु फेरिये ।
द्रवै सुधा१ रसनीर जहां मन घेरिये ॥
अमृतही के स्वादको कौन बखानई ।
जो कोइ अँचवै हंस सोइ पुनि जानई ॥
दिन दिन पलटै देह रक्त दूधाभवै ।
बीसबरस अरु चार माहिं ऐसा हवै ॥
इच्छाचारी होय बरस छत्तीसमैं ।
सब लोकन में जाय अपनी शक्ति ते ॥
दो० जेते विष व्यापै नहिं, रोग न दहै शरीर ।
जो कोइ पीवै युक्तिसूं, कामधेनु को क्षीर ॥
भूख प्यास अरु नींद के, रहै न तीनौ लेव ।
नाद बिन्दु गुटका बँधै, कहै यही शुकदेव ॥
१ अमृत ॥

६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तीन महीने चार का, बालक गोदी माय ।
ना वह पीवै नीरहीं, अन्न नही वह खाय ॥
वह तौ जीवै दूधसूं, वाकूं वही जुकाम ।
लगो रहै माताकुचन, निसरै एक न याम ॥
अमृत पीवै योगिया, ऐसे चरणहि दास ।
पहरहु यह छांड़ै नहीं, कामधेनु' को पास ॥
ऐसे धारै तौ बनै, सुधा रसाला संत ।
दिविकायाहोजायजब, धनिकहै कमलाकांत ॥
आठ पहर लागारहै, पीवै कै कै ध्यान ।
मैं कहा जैसाही बनै, परसै पद निरवान ॥
भेद गुरूसे ये लहै, और छिपावै वाहि ।
जोजोफलयाकेअधिक, होय परापति तांहि ॥
योगेश्वर अरु देवता, मुनी 'ऋषीश्वर जान ।
रखवारे वाके घने, करन न देवैं ध्यान ॥
टेक गहै सो जापियै, और करै ह्यां ध्यान ।
यति सती अरु गुरुमुखी, जाकी ऐसीआन ॥
बड़ी जु मुद्रा खेचरी, मुख में याका वास ।
जो कहिमें शुकदेवजी, जानलेहु चरणदास ॥
अथ भूचरी मुद्रा ॥
दूजी मुद्रा भूचरी, नासा जाको वास ।
प्राण अपान जुदी जुदी, एक करै चरणदास ॥
जितकीतितरखप्राणको, वा घरलाय अपान ।
ताहि मिलावै युक्तिसूं, करि करि संयम ध्यान ॥
जब वह जीतै पवनकूं, मन चंचल ठहराय ।
• १ इन्द्रकी गौ ॥