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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८३
ऐसे ध्यान सभी सुधि पावै । जैसी धारै सो होयजावै ॥
वेगिहि सब साधन सधि आवै । आलस कायरता भजिजावै ॥
लोक परलोक सभी सुख लेवै । जो गुरु को ऐसो व्रत सेवै ॥
दूजे परमातम की धारण । मुक्तिदेन अरु बंध निवारण ॥
धारनसों चित घना लगावै । सिमिटि सभी ओरनसों आवै ॥
जो कछु होय सो आगेहि आगै । टेक पकरि मारग में लागै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । सती शूरमा ज्यों मन लावै ॥
दो० प्राण वायुकी धारणा, परमेश्वर पहिंचान ।
परमातम ह्वै जात है, जोपै रोके प्रान ॥
बारह मात्रा सों चढ़ै, ह्वां तक पहुँचै जाय ।
बारह सै अरु छानवे, कुम्भक में ठहराय ॥
यही धारणा अंग है, शनै शनै कर ध्याव ।
याते दुगुनी ध्यान में, प्राण वायु परचाव ॥
दूजा जानि समाधि लो, ध्यानहिं सेती एहु ।
पांच सहस अरु एकसौ, चौरासी गिनिलेहु ॥
इति धारणांगसम्पूर्णम् ॥
अथ सातवांअंग वर्णन ॥
शिष्यवचन ॥
दो० अंग धारणा का कहा, सो धारा चितमाहिं ।
ध्यान अंग बरणन करौं, मैं रहुँ चरणन छाहिं ॥