भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 126, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ६१
अथ वर्मस्तीक
तीजे वस्ती कर्महीं, कहौं सुनौ चितलाय ।
क्रिया करै गन्नेसही, कुंजी तहां लगाय ॥
कुंजी तहां लगाय, मूल को धोवन कीजै ।
पसारन संकोच सुरति दै यह करि लीजै ॥
नीर गुदासों खैंच करि, थाँभै उदर मंझार ।
कछू डोल अस बैठकर, फिरि दे ताहि उतार ॥
दो० यही जु वस्ती कर्म है, गुरु बिन पावै नाहिं ।
लिंगगुदा के रोग जो, गर्मी के नशिजाहिं ॥
अथ गजकर्म
गज कर्म याही जानिये, पिये पेट भरि नीर ।
फेरि युक्ति सों काढ़िये, रोग न होय शरीर ॥
अथ न्योलीकर्म
न्योली पदमासन सों करै । दोनों कर घुटनों पर धरै ॥
पेटरु पीठ बराबर होंय । दहने बायें नले बिलोय ॥
मैल पेटमें रहन न पावै । अपान वायु तासों वश आवै ॥
तापतिली अरु गोला शूल । हौन न पावैं नेक न मूल ॥
जो गुरु करिकै ताहि दिखावै । न्यौली कर्म सुगम करि पावै ॥
और उदर के रोग कहावै । सोभी वै रहने नहिं पावै ॥
अथ त्राटककर्म ॥
त्राटक कर्म टकटकों लागै । पलक पलक सों मिलै न ताकै ॥
नन उघारेही नित रहै । होंय दृष्टि थिर शुकदेव कहै ॥
आँख उलटि त्रिकुटीमें आनो । यह भी त्राटक कर्म्म पछानो ॥
जेते ध्यान नैन के होई । चरणदास पूरण हो सोई ॥