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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 690 में से

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पृष्ठ 117

८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चन्दफांक अरु श्वेत अकारो । हृषीकेश तहँ देव निहारो ॥
ह्यां हूं पांच घरी अस्थापै । प्राणलीन करि चितदै आपै ॥
व्यापैना विष काहू विधिको । शुकदेवकहैंफलजलकेसिधिको ॥
दो० कण्ठसे ऊपर तालुका, लो पावक अस्थान ।
लालरंग तिरकोन है, रुद्र देवता मान ॥
तहां लीन करि प्राणको, पांच घड़ी परमान ।
भय व्यापै नहिं ज्वालको, अग्निधारणा जान ॥
जाके आगे वायु है, भृकुटीलौं मर्य्याद ।
मेघ बरण षटकोन है, ईश्वर देवत साध ॥
प्राणलीन तहँ कीजिये, पांच घड़ी रे तात ।
पैहै खेचर सिद्धिही, तत पदही ह्वै जात ॥
ब्रह्मरंध्र आकाश है, बड़ा जु तत्त्व न माहिं ।
श्याम बरण ब्रह्म देवता, योगी जहां सिराहिं ॥
प्राण लीन घटि पांचकरि, पावै मुक्ति अनूप ।
व्योमतत्त्व की धारणा, जहां छाँह नहिं धूप ॥
पृथ्वी संग लकारही, जल के संग बकार ।
पावक संग रकार है, मारुत संग मकार ॥
पंचम तत्त्व आकाश ही, सब के ऊपर जान ।
अक्षर जहां हकारही, शुकदेव कहै बखान ॥
पहिलिं धारणा थंभनी, दूजी द्रावण होय ।
तीजी दहनी जानिये, चौथी आमनी सोय ॥
पँचवीं नाम जु शंखिनी, इनको लेवो जान ।
शुकदेवा अब कहत है, आगे और विधान ॥
गुरु की प्रथम धारणा लीजै । अपना रूप उन्हीं सा कीजै ॥