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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 690 में से

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पृष्ठ 123

८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी छन्द
जहँ आतमदेव अभेव सेव्य नहिं सेवैहै ।
स्वामीजी ह्वां नाहिं पूजा नहिं देव है ॥
नौधा¹ नेम न प्रेम ज्ञान नहिं ध्यान है ॥
जड़ चेतन कछु नाहिं सुरति नहिं ज्ञान है ॥
विधि निषेध नहिं भेद अन्वैवितरेकना ।
निश्चय अरु व्यवहार कछू तामें न ह्वा ॥
उत्तम मध्यम भाव न शुभ ना अशुभहै ।
सिंह सर्प डरनाहिं औ शस्तर कोन मै ॥
पावक दग्ध न करै बहावै जल नहीं ।
ह्वां नहिं पहुँचे काल न ज्वालाहै तहीं ॥
ऐसा भवन समाधि भाग्य सों पाइये ।
तजि कै जक्त उपाधि तहां मठ छाइये ॥
यतन करै लख माहिं और सब भेषही ।
कोटिनमें कोइ होय समाधी एकही ॥
ह्वांतक पहुंचै जाय सोई सिध साध है ।
कहै शुकदेव पुकारि जु 'कठिन समाधि है ॥
दो० भक्ति योग अरु ज्ञान की, त्रैविधि कहूँ समाधि ।
गुरू मिलै तौ सुगमहै, नाहीं कठिन अगाधि ॥
अथ भक्तिसमाधि ॥
सब इंद्रिन को रोंकिकै, करि हरि चरणन ध्यान ।
बुद्धि रहै सुरत रहै, तौ समाधि मत मान ॥
ध्याता बिसरै ध्यान में, ध्यान होय लय ध्येह ।
बुद्धि लीन सुरत न रहै, पद समाधि लखिलेह ॥
१ श्रवण कीर्तन स्मरण पादसेवन अर्चन वंदन दास्य सख्य आत्मनिवेदन ॥