भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
चरणदास अब ध्यान सुन, कहूं तोहिं समुझाय ।
कहिशुकदेवसोसुनिसमुझि, करौ ताहि चितलाय ॥
ध्यान जु चारि प्रकार के, कहूं जु उनकी रीत ।
पदस्थ पिंड रूपस्थ है, चौथा रूपातीत ॥
अथ पदस्थध्यान ॥
हिय पदपंकज ध्यानकरि, फिरि करि सारी देह ।
नखशिखलौं छविनिरखिकै, चरणन में चितदेह ॥
कै कुंभकही कीजिये, ह्वां प्रणव का जाप ।
मन निश्चल हो सहजमें, भाजैं त्रैविधि ताप ॥
पदस्थ ध्यान याको कहैं, करै सो जानै भेव ।
पिंडस्थ ध्यान वर्णन करें, खोलि खोलि शुकदेव ॥
अथ पिंडस्थध्यान ॥
ब्रह्म सोई यह पिंड है, यामें करि करि वास ।
कमलन के लखि देवता, लहो परापत तास ॥
सोधे सिगरे पिंडको, षट चक्रहु को ध्यान ।
शोधत शोधत आचढ़ै, भवँर गुफा अस्थान ॥
तिरवेणी संगम बहै, ज्योति जहां दरशाय ।
सातजन्म सुधि होय जब, ध्यान करै मनलाय ॥
आगे कमल हजार दल, सतगुरु ध्यान प्रधान ।
अमृत द्रवे बहिचलै, हंस करै जहँ न्हान ॥
ऊपर तेजहि पुंज है, कोटि भानु परकास ।
शून्य शिखर ताऊपरै, योगी करै विलांस ॥