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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 690 में से

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पृष्ठ 128

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६३
यह सब साधन कठिन गुरूसे पाइये ॥
दो अँगुली कूंवीसूं करि मेलना ।
जिह्वा उलटी राख जु नितप्रति खेलना ॥
यह उपाय षट मास करै तजिमानही ।
रसना यों बँधिजाय चढ़ै अस्थानही ॥
दो० चार काज यासूं सरैं, फलदायक बहुभांति ।
योग माहिं बड़ भूपहै,अधिकीजाकीकांति ॥
अष्टपदी ॥
एक जु प्राणायाम जीभसूं कीजिये ।
दूजे बन्ध उड्यान यहीसूं दीजिये ॥
तीजे करि करि ध्यान निरखि जहूँ ज्योतही ।
चौथे अमृत पिवै खुलै तहँ सोतही ॥
खैंचे त्रिकुटी पाट सहज अरु फेरिये ।
द्रवै सुधा१ रसनीर जहां मन घेरिये ॥
अमृतही के स्वादको कौन बखानई ।
जो कोइ अँचवै हंस सोइ पुनि जानई ॥
दिन दिन पलटै देह रक्त दूधाभवै ।
बीसबरस अरु चार माहिं ऐसा हवै ॥
इच्छाचारी होय बरस छत्तीसमैं ।
सब लोकन में जाय अपनी शक्ति ते ॥
दो० जेते विष व्यापै नहिं, रोग न दहै शरीर ।
जो कोइ पीवै युक्तिसूं, कामधेनु को क्षीर ॥
भूख प्यास अरु नींद के, रहै न तीनौ लेव ।
नाद बिन्दु गुटका बँधै, कहै यही शुकदेव ॥
१ अमृत ॥