भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८६
अथ योगसमाधि ॥
आसन प्राणायाम करि, पवन पंथगहिलेहि ।
षट चक्र को छेद करि, ध्यान शून्य मन देहि ॥
आपा विसरै ध्यान में, रहै सुरति नहिं नाद ।
लीन होय किरिया रहित, लागै योग समाध ॥
अथ ज्ञानसमाधि ॥
जबलग तत्त्व विचारि करि, कहैं एक अरु दोय ।
ब्रह्मव्रत बांधे रहै, ह्वाँलग ध्यानहिं होय ॥
मैं तू यह वह भूलि करि, रहै जू सहज स्वभाव ।
आपा देहि उठाय करि, ज्ञान समाधि लगाय ॥
ज्ञान रहित ज्ञाता रहित, रहित ज्ञेय अरु जान ।
लगी कभी छूटै नहीं, यह समाधि विज्ञान ॥
पूछे आठों अंग तें, योग पंथ की बात ।
शुकदेव कहै तामें चलौ, गुरू कृपा लै साथ ॥
इति समाधिअङ्गसम्पूर्णम् ॥
अथ छहौकर्महठयोग वर्णन ।
शिष्यवचन ॥
दो० अष्टांग योग वर्णन कियो, मोको भई पहिंचान ।
छहौकर्म हठयोग के, बरणौ कृपानिधान ॥