भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन ८७
ऐसे कहै शुकदेव सुनौ चर्णदासही।
यह निर्द्वन्द्व समाधि करौ जहां वासही॥
दो० जहां कछू गम ना रहे, विद्या वेद न वाद।
ऋधिसिधि मिटि आनंदलहै, ऐसी शून्य समाधि॥
अष्टपदी छन्द॥
तहां किये परवेश रहै न अकारही।
रूप नाम गुण क्रिया यही साकारही॥
पाप पुण्य सुख दुःख जहां नहिं पाइये।
सतमारग कुल धर्म न देत दिखाइये॥
भूख प्यास अरु उष्ण जहां नहिं शीत है।
हर्ष शोक नहिं नेक वैर नहिं प्रीत है॥
इन्द्री मन नहिं रहत गलत है जात है।
सिध साधक गुरु शिष्य न भाव रहात है॥
उडुगन चन्द्र न सूर न दिवस न रात है।
त्वंपद ईश्वर ब्रह्म न जान्यो जात है॥
जैसे जल में नीर क्षीर में क्षीरही।
असि पद में यों जीव नीर में नीरही॥
अहं मिटै मिटि जाय जु आपा थोकही।
ना परमातम आतम बंध न मोषही॥
ऐसे कह शुकदेव यों होय समाधि में।
वैसोही है जाय सोई था आदि में॥
दो० हुता आदि परमात्मा, बिचउठि लगा विकार।
मिलि समाधि निर्मल भवै, लहै रूप ततसार॥
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