भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
दो० यासों लगै समाधिही, निद्रा कहिये योग।
ध्याता होवै लीनही, रहै न त्रिपुटी रोग॥
सतवाँ कहाजु ध्यानहीं, अठवीं कहूँ समाधि।
ज्ञान ध्यान जहँ वीसरै, तहां न विद्यावाद॥
इति ध्यानाङ्गसम्पूर्णम्॥
अथ आठवां समाधि अङ्गवर्णन ॥
अष्टपदी छन्द ॥
अठवीं कहूँ समाधि लक्षण वर्णन करूं।
तोको सब समुझाय तेरी दुविधा हरूं॥
जबहीं लगै समाधि योगी आनन्द लहै।
योग भया सिध जानि क्रिया कोइ ना रहै॥
मिलि ध्याता अरु ध्यान एक होव जहां।
दूजारहै न भाव मुक्ति वर्तै जहां॥
निरउपाधि निर्खेद ऐसा वह देश है।
करम भरम अरु धरम नहीं कोइ लेश है॥
आपार है न कोय सकल आशागरै।
चिन्ताका दुख नाहिं वासना सब जरै॥
पंच विषय जहं नाहिं नहीं गुणतीनहीं।
होवै ब्रह्म स्वरूप जीवता क्षीनहीं॥
जाग्रत स्वप्न सुषोप्ति जहां होवै नहीं।
चौथे पद को पाय होय जहँ लीनहीं॥