भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 125, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
पहिले ये सब साधिये, काया होवै शुद्धि ।
रोग न लागै देह को, उज्ज्वल होवै बुद्धि ॥
अरु साधा षटकर्म बताऊं । तिनके तोंको नाम सुनाऊं ॥
नेती धोती वसती करिये । कुंजर करम रोग सब हरिये ॥
न्योली किये भजै तन बाधा । देखिदेखि जिन गुरु सों साधा ॥
त्राटक कर्म दृष्टि ठहरावै । पलक पलक सों लगन न पावै
अथ नेतीकर्म ॥
कुं० मिही जु सूत मँगाय कै, मोटी बाटै डोर ।
ऊपर मोम रमाय कै, साधै उठकर भोर ॥
साधै उठकर भोर, डेढ़ बालिशत की कीजै ।
ताको सीधी करै, हाथ अपने में लीजै ॥
नासा रंध्र में मेल कर, खींचै अँगुली दोय ।
फेरि विलोवन कीजिये, नेती कहिये सोय ॥
दो० कान नाक अरु दांत को, रोग न व्यापै कोय ।
उज्ज्वल होवै नैनही, नित नेती करि सोय ॥
अथ धोतीकर्म ॥
धोती कर्म यासों कहैं, पट्टी सोलह हाथ ।
कोढ़ अठारह नाभवैं, करै जु नित परभात ॥
कुं० चौड़ी अंगुल चारिकी, मिही वस्त्र की होय ।
जलमें भेय निचोय करि, निगल कंठ सों सोय ॥
निगल कंठ सों सोय, सिरा बाहर रहि जावै ।
फेरि निकालै ताहि, पित्त कफ दोऊ लावै ॥
काया होवै शुद्धही, भजै पित्त कफ रोग ।
शुकदेव कहै धोती करम, साधै योगी लोग ॥